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सवर्ण आरक्षण मोदी सरकार के लिए लोकसभा चुनाव में 'गेम चेंजर' साबित होगा या फिर चुनावी जुमला...

Updated: सोमवार, 7 जनवरी 2019 (21:50 IST)
लोकसभा चुनाव 2019 से पहले केन्द्र की मोदी सरकार ने सवर्ण आरक्षण का का दांव चलकर विपक्ष को चारों खाने चित तो कर दिया है, लेकिन इसको लेकर सरकार की नीयत पर भी अंगुलियां उठने लगी हैं। खासकर इसके टाइमिंग को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
 
जानकारों का मानना है कि सरकार ने इसकी घोषणा कर वाहवाही तो लूट ली, लेकिन इसे धरातल पर लाना उतना आसान नहीं होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण किसी भी सूरत में नहीं दिया जा सकता। अत: सरकार को इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करना होगा। इसके पहले भी कुछ राज्य सरकारों ने 50 फीसदी आरक्षण की सीमा से बाहर जाकर आरक्षण देने की कोशिश की थी, मगर उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी। 
 
पहली बात तो यह कि कल यानी मंगलवार को मौजूद सत्र का आखिरी दिन है। इसलिए यह संभव नहीं कि विधेयक (संशोधन) को दोनों सदनों में पारित किया जा सके। दूसरी बात राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है, अत: यह विधेयक वहां लटक सकता है। जानकारों की मानें तो यह घोषणा मोदी सरकार के लिए एक और 'जुमला' साबित हो सकती है। 
 
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि केन्द्र सरकार यह दांव आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। विपक्ष चाहते हुए भी इसका खुलकर विरोध नहीं कर पाएगा। साथ ही यदि संशोधन विधेयक चुनाव से पहले कानून की शक्ल ले लेता है, तो निश्चित रूप से भाजपा को इसका फायदा मिलेगा। 
 
यही कारण है कि विपक्षी नेताओं ने दबी जुबान में सरकार के फैसले का यह कहकर विरोध शुरू कर दिया कि भाजपा सरकार को साढ़े चार साल तक सवर्ण समुदाय की याद नहीं आई। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा है कि उसे पांच वर्ष के शासनकाल के अंत में जाकर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की याद आई है।  
 
गौरतलब है कि अभी सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए कुल 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय की हुई है। मंगलवार को संसद का अंतिम दिन होने के कारण इस सत्र में दोनों सदनों में इस विधेयक के पारित होने की संभावना नगण्य है,      विशेषकर यह देखते हुए कि राज्यसभा में सत्ता पक्ष के पास जरूरी बहुमत नहीं है। संविधान संशोधन विधेयक होने के नाते इसके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
 
चुनावी वर्ष होने के कारण सरकार के इस फैसले से अभी से राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछ गई है। वर्षों से गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग देश में चल रही है। मोदी सरकार ने यह फैसला लेकर एक नया राजनीतिक दांव खेला है। हालांकि सरकार का यह दांव कितना कारगर साबित होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन सरकार के इस दांव से विपक्षी खेमे में बेचैनी साफ देखी जा रही है। 
 

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