यहां 'खलनायक' नहीं 'संकट मोचक' है रावण

पुनः संशोधित शनिवार, 5 अक्टूबर 2019 (13:42 IST)
इटावा। देशभर में आयोजित रामलीलाओं में खलनायक की भूमिका में नजर आने वाला रावण उत्तर प्रदेश में इटावा के में संकट मोचक की भूमिका में पूजा जाता है। यहां रामलीला के समापन में रावण के पुतले को दहन करने के बजाय उसकी लकड़ियों को घर ले जाकर रखा जाता है ताकि सालभर उनके घर में विघ्न-बाधा उत्पन्न न हो सके।
जसवंतनगर की रामलीला पर पुस्तक लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार वेदव्रत गुप्ता बताया कि यहां रावण की न केवल पूजा की जाती है बल्कि पूरे शहरभर में उसकी आरती उतारी जाती है, सिर्फ इतना ही नहीं रावण के पुतले को जलाया नहीं जाता है। लोग पुतले की लकड़ियों को अपने-अपने घरों में ले जाकर रखते हैं ताकि वे सालभर हर संकट से दूर रह सकें। कुल मिलाकर रावण यहां संकट मोचक की भूमिका निभाता चला आया है। जसवंतनगर में आज तक रामलीला के वक्त भारी हुजूम के बावजूद कोई फसाद न होना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

साल 2010 में यूनेस्को की ओर से रामलीलाओं के बारे में जारी की गई रिपोर्ट में इस विलक्षण रामलीला को जगह दी जा चुकी है। करीब 164 साल से हर साल मनाई जाने वाली इस रामलीला का आयोजन दक्षिण भारतीय तर्ज पर मुखौटा लगाकर खुले मैदान में किया जाता है। त्रिडिनाड की शोधार्थी इंद्रानी रामप्रसाद करीब 400 से अधिक रामलीलाओं पर शोध कर चुकी हैं लेकिन उनको जसवंतनगर जैसी होने वाली रामलीला कहीं पर भी देखने को नहीं मिली है।

यहां की रामलीला में रावण की आरती उतारी जाती है और उसकी पूजा होती है। हालांकि ये परंपरा दक्षिण भारत की है, लेकिन फिर भी उत्तर भारत के कस्बे जसवंतनगर ने इसे खुद में क्यों समेटा हुआ है ये अपने आप में ही एक अनोखा प्रश्न है। जानकार बताते हैं कि रामलीला की शुरुआत यहां 1855 में हुई थी लेकिन 1857 के ग़दर ने इसको रोका, फिर 1859 से यह लगातार जारी है।

यहां रावण, मेघनाथ, कुम्भकरण ताम्बे, पीतल और लोह धातु से निर्मित मुखौटे पहनकर मैदान में लीलाएं करते हैं। शिवजी के त्रिपुंड का टीका भी इनके चेहरे पर लगा होता है। जसवंतनगर के रामलीला मैदान में रावण का लगभग 15 फीट ऊंचा रावण का पुतला नवरात्र की सप्तमी को लग जाता है। दशहरे वाले दिन रावण की पूरे शहर में आरती उतारकर पूजा की जाती है और जलाने की बजाय उसके पुतले को मार-मारकर उसके टुकड़े कर दिए जाते हैं और फिर वहां मौजूद लोग रावण के उन टुकड़ों को उठाकर घर ले जाते हैं। जसवंतनगर में रावण की तेरहवीं भी की जाती है।

दशहरे पर जब रावण अपनी सेना के साथ युद्ध करने को निकलता है तब यहां उसकी धूप-कपूर से आरती होती है और जय-जयकार भी होती है। दशहरे के दिन शाम से ही और रावण के बीच युद्ध शुरू हो जाता है जो कि डोलों पर सवार होकर लड़ा जाता है। रात 10 बजे के आसपास पंचक मुहूर्त में रावण के स्वरूप का वध होता है, पुतला नीचे गिर जाता है। एक और खास बात यहां देखने को मिलती है जब लोग पुतले की बांस की खप्पची, कपड़े और उसके अंदर के अन्य सामान नोंच-नोंचकर घर ले जाते हैं। उन लोगों का मानना है कि घर में इन लकड़ियों और सामान को रखने से भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं होता।

जसवंतनगर की रामलीला में लंकापति रावण के वध के बाद पुतले का दहन नहीं होता है, बल्कि उस पर पत्थर बरसाकर और लाठियों से पीटकर धराशायी कर देते हैं। इसके बाद रावण के पुतले की लकड़ियां बीन-बीन कर घरों में ले जाकर रखते हैं। लोगों की मान्यता है कि इस लकड़ी को घर में रखने से विद्वता आती है और धन में बरकत होती है। इस लोक मान्यता का असर यह है कि रावण वध के बाद पुतले की लकड़ी के नाम पर मैदान में कुछ नहीं बचता है। दूसरी खास बात यह है कि यहां रावण की तेरहवीं भी मनाई जाती है, जिसमें कस्बे के लोगों को आमंत्रित किया जाता है।
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विश्व धरोहर में शामिल जमीनी रामलीला के पात्रों से लेकर उनकी वेशभूषा तक सभी के लिए आकर्षक का केन्द्र होती है। भाव-भंगिमाओं के साथ प्रदर्शित होने वाली देश की एकमात्र अनूठी रामलीला में कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले मुखौटे प्राचीन तथा देखने में अत्यंत आकर्षक प्रतीत होते हैं। इनमें रावण का मुखौटा सबसे बड़ा होता है तथा उसमें 10 सिर जुड़े होते हैं। ये मुखौटे विभिन्न धातुओं के बने होते हैं तथा इन्हें लगाकर पात्र मैदान में युद्ध लीला का प्रदर्शन करते हैं। इनकी विशेष बात यह है कि इन्हें धातुओं से निर्मित किया जाता है तथा इनको प्राकृतिक रंगों से रंगा गया है। सैकड़ों वर्षों बाद भी इनकी चमक और इनका आकर्षण लोगों को आकर्षित करता है।

समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू का कहना है कि यहां की रामलीला पहले सिर्फ दिन में हुआ करती थी, लेकिन जैसे-जैसे प्रकाश का इंतजाम बेहतर होता गया तो इसको रात को भी कराया जाने लगा। यह हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि यहां की रामलीला को यूनेस्को की रिपोर्ट में जगह मिली है। उनके पूर्वज सौराष्ट्र के रहने वाले थे लेकिन आजादी से पहले आए संकट के चलते भागकर यहां तक पहुंचे फिर यही के हो लिए उसके बाद रामलीला की शुरुआत हुई।

रामलीला समिति के सह प्रबंधक अजेंद्र गौर का कहना है कि यहां की रामलीला अनोखी इसलिए होती है क्योंकि रामलीला का प्रदर्शन खुले मैदान में होता है। दक्षिण भारतीय शैली में हो रही इस रामलीला में असल पात्रो को बनाए जाने के लिए उनके पास पूरे परंपरागत कपड़े और मुखौटों के अलावा पूरे शस्त्र देखने के लिए मिलते हैं।

32 साल तक रावण का किरदार निभाने वाले विपिन बिहारी पाठक का बेटा धीरज पाठक अपने पिता की मौत के बाद पिछले 12 सालों से अपने पिता की तरह ही रावण का पात्र बखूबी अदा कर रहा है। वे कहते हैं कि उनको रावण के पात्र में आनंद आता है क्योंकि राम के हाथों मारे जाने का सौभाग्य जो हासिल होता है, वह अपने आप में मन को सुकून देने वाला होता है।



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