Ground Report : गुजरात के गांवों में भी फैला Corona, सरकारी दावों की खुली पोल

Last Updated: मंगलवार, 11 मई 2021 (19:47 IST)
-हेतल कर्नल, से
देशभर में कोरोना के कहर का दूसरा दौर जारी है। इस दूसरी लहर में बीमारी से लड़ने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए गए, इसकी भी पोल खुल गई है। एक तरह से सरकार इस मामले में पूरी तरह फेल साबित हुई है। कोरोना ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि हर ओर ऑक्सीजन और दवाओं की कमी है।
अस्पतालों के बाहर एंबुलेंस की आवाजाही और अपनों को खोने वाले लोगों के रुदन का दृश्य आम हो गया है। कोरोना की दूसरी लहर में सबसे ज्यादा असर गुजरात के गांवों में देखने को मिल रहा है। गांवों में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। कुछ गांव ऐसे हैं, जहां रोजाना 5 से 7 लोगों की मौत हो रही है।

ऐसे हैं शहरों के कोविड सेंटर : कोविड आइसोलेशन सेंटर्स की गुजरात में अलग पहचान है जो हर शहर में बने हैं। इन सेंटर्स पर ऑक्सीजन, दवाई से लेकर जो भी जरूरी सामान है, वह सब फ्री मिल रहा है। मरीज गंभीर होने पर तत्काल हॉस्पिटल में भर्ती किया जाता है। इन सेंटर्स पर इलाज के साथ साइकोलॉजिकल ट्रीटमेंट भी दिया जा रहा है। कुछ में योगा कराया जाता है तो कुछ में पढ़ने को बुक्स दी जाती हैं।

ग्रामीण इलाकों के हालात : 1 मई, गुजरात स्थापना दिवस पर सरकार ने ‘मेरा गांव कोरोना मुक्त गांव’ अभियान शुरू किया है। साथ ही सरकारी प्रयासों से आइसोलेशन सेंटर शुरू किए गए। सच्चाई यह है कि गांवों में बनाए गए इन कोविड सेंटर्स पर सुविधाएं नहीं हैं। इसके चलते ये खाली पड़े हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि लोगों में जागरूकता की कमी के चलते ये खाली हैं। ज्यादार ग्रामीण खांसी, बुखार होने पर लापरवाही बरतते हैं। अस्पताल जाने के बजाय दवाई खरीदकर घर में ही इलाज लेते हैं। ऐसे में यदि कोरोना हुआ तो मरीज की हालत बिगड़ती है और मौत हो जाती है। घर में ही इलाज के कारण संक्रमण परिवार के अन्य लोगों तक पहुंच जाता है। यह भी एक कारण है कि सरकारी कोविड सेंटर्स खाली पड़े हैं।

गांवोंमें इसलिए फैल रहा है : बुखार आने पर पैरासिटामॉल जैसी दवाई ली जाती है। अब तो इस दवाई की भी कालाबाजारी शुरू हो चुकी है। सरकार का इस ओर ध्यान नहीं है। गांवों के अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ नाम मात्र के लिए है, इसलिए लोग अस्पताल नहीं जाते। झोलाछाप डॉक्टर खूब इलाज कर रहे हैं। गांवों में कोरोना फैलने के ऐसे अनेक कारण हैं उधर, ग्रामीणों का मानना है कि वे शुद्ध हवा में पौष्टिक आहार के साथ खूब मेहनत करते हैं, इसलिए उन्हें कोरोना नहीं हो सकता। ग्रामीणों का कहना है कि यह शहर की बीमारी है।

ऐसे रोक सकते हैं : इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के डायरेक्टर डॉ. दिलीप मावलंकर कहते हैं कि कोरोना से लड़ने के लिए हमारे प्रयास कम नहीं थे। यदि ग्रामीणों में जागरूकता फैलाएं, मरीजों को आइसोलेशन सेंटर पर भेजने के लिए राजी कर लें तो इन क्षेत्रों में संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। वैक्सीनेशन के लिए जागरूकता फैलाना भी जरूरी है।

सौराष्ट्र में संक्रमण पर सर्वे : सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी के विज्ञान भवन द्वारा एक सर्वे किया गया था, जिसमें ग्रामीण महिलाओं के ज्यादा संक्रमित होने का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में जागरूकता की कमी है। इनमें पांच मुख्य कारण सामने आए, जैसे- अभी भी मास्क नहीं पहनकर साड़ी के पल्लू से मुंह ढंकना। किराना, सब्जी लेते समय महिलाओं का जमा होना। ग्रुप में बतियाते हुए पानी भरने जाना। किसी घर में गमी हो जाए तो वहां झुंड में पहुंच जाना। इसके अलावा महिलाएं अस्पताल जाने से डरती हैं और घरेलू उपचार करने लगती हैं।

सरकार की तैयारी : प्रदेश सरकार ने अनेक गांवों में सरपंचों के सहयोग से आइसोलेशन सेंटर बनाए हैं। यहां दवाई, चाय, नाश्ता और भोजन देने की व्यवस्था है। कुछ गांवों में जाति और समाज के अनुसार युवाओं की टीम बनाई गई है। यह टीम घर-घर जाकर कोरोना से बचाव के लिए संदेश देती है। साथ ही एक किट दी जा रही है, इसमें मास्क, डेटॉल, साबुन, सैनिटाइजर की बॉटल होती है। यह टीम ग्रामीणों को बताती है कि इसका उपयोग कब और कैसे करना है।



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