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कुम्हारों के घरों में रोशनी कब फैलेगी ?

Updated: मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017 (14:57 IST)
लखनऊ। जहां दीवाली त्योहार के आते ही कुम्हारों के चाक की रफ्तार तेज हो जाती है और कुम्हार परिवार के लोग दिन रात एक कर मिट्टी के बर्तन व दीया और मूर्तियां बनाने में लग जाते हैं। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी इस काम में हाथ बंटाते है। लेकिन मिट्टी के दीयों की चमक अब दिवाली पर्व पर धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
 
अब प्लास्टिक व झालर की लडियों ने इनकी जगह ले ली है। हालांकि परंपरा निभाने के लिए इनका प्रयोग जरूर किया जा रहा है। लेकिन जैसे जैसी समय बदल रहा है तो प्राचीन परंपरा पर आधुनिकता हावी हो रही है। इसका असर कुम्हार चाक की रफ्तार व परिवारों पर पड़ रहा है। उन्हें धीरे-धीरे अब रोजी-रोटी की चिंता सताने लगी है।
 
चूंकि बाजार में आकर्षक वस्तुओं की मांग ज्यादा है, जिसके चलते उनके द्वारा निर्मित मिट्टी के पात्रों को खरीदने में लोग रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
 
उत्तर प्रदेश के कानपुर व कानपुर देहात में लगभग 150 कुम्हार परिवार रहते हैं, जो मिट्टी के बर्तन व दीया और मूर्तियां बनाकर बेचने का व्यवसाय करते हैं। यहां एक कुम्हार परिवार करीब चार-पांच हजार मिट्टी के बर्तन व दीया और मूर्तियां का निर्माण करता है।
 
इस हिसाब से ये परिवार अब लगभग पांच लाख मिट्टी के बर्तन व दीया और मूर्तियां का ही निर्माण करते हैं। और वे इसे कानपुर नगर व कानपुर देहात के आस पास में बेचते हैं। बावजूद इसके, बहुत सारे दीये व अन्य मिट्टी के सामना बच जाते हैं। जिसके कारण इन लोगो को काफी नुकसान उठाना पड़ता है जिसके चलते कानपुर व कानपुर देहात के कुम्हारों को अब अपने रोजगार की चिंता सताने लगी है इन लोगो का कहना है की अब लोगो पर आधुनिकता हावी हो रहा है।
 
बाजार में अन्य आइटम देख लोग उसेी चमक पर लुभा जाते हैं। उनके रहन-सहन में भी कई बदलाव आए। अब लोगों ने मिट्टी के बर्तनों की जगह क्रॉकरी जैसी चीजों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि मिट्टी के घड़े, दीया और मूर्तियां बनाने वाले कुम्हार कठिन हालातों से गुजर रहे हैं।
 
इसका प्रभाव उनके व्यवसाय पर पड़ रहा है और मूर्तियां बनाने वाले कुम्हार कठिन हालातों से गुजर रहे हैं। जब की कुम्हार जाति का इतिहास आज से नहीं बल्कि द्वापर युग से ही देखने को मिलता है कि जब भगवान कृष्ण गोपियों की मिट्टी से बने घड़े को गुलेल से फोड़ा करते थे, लेकिन आज ये कुम्हार जाति अपने हाड़ तोड़ मेहनत के बाद बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी अपने परिवार के लिए जुटा पाती है।
 
अब यह सवाल उठता है की  इन कलाकारों के घरों में रौशनी कब फैलेगी इसका जवाब हमारी सरकारों को आखिर ढूंढना पड़ेगा। स्थिति अगर यथावत बनी रही तो इस कला के अंत होने के साथ-साथ एक ऐसी जाति का भी अंत हो जाएगा जो पर्यावरण को सुरक्षित बनाये रखने के लिए एक मिसाल के रूप में सबके सामने हैं।
 
क्या बोले कुम्हार-
 
कुम्हार अनिल ने बताया कि मूर्ति बनाना और बेचना उसका पुस्तैनी धंधा है। नौवीं तक पढ़े अनिल ने बताया कि उनके परिवार के सभी सदस्य मूर्ति बनाने में सहयोग करते हैं। दिवाली के लिए उन्होंने 6000 दीए बनाए हैं। वह कानपुर देहात व कानपुर शहर में दीया बेचते हैं। लेकिन हर साल अभी तक उनके कुछ दीए छोड़ के और सारे बिकी जाते थे लेकिन इस बार अभी तक वे मात्रा २०० दीए ही बेच पाया है और उन्हें अब डर लग रहा है की उनके दीये बिक पाएगे की नहीं। अनिल का मानना है की अब आधुनिक सुविधाओं की वजह से लोग परंपराओं को भी भूल चुके हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उनकी जिंदगी पर पड़ा, जो इसी के जरिए रोजी-रोटी कमा रहे थे। 
 
कुम्हार राम भरोसे ने बताया कि एक समय था, जब लोग कुम्हार के हाथों से बने दीयों को भगवान के सामने जलाकर घरों को रोशन करते थे। लेकिन, अब आधुनिक सुविधाओं की वजह से लोग परंपराओं को भी भूल चुके हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उनकी जिंदगी पर पड़ा, जो इसी के जरिए रोजी-रोटी कमा रहे थे। हालात यह है कि आज कुम्हार गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर है। 
 
कुम्हार सुखी लाल बताते हैं कि अगर ऐसे ही हालात रहे तो वह वक्त ज्यादा दूर नहीं है, जब कुम्हार विलुप्त हो जाएंगे। उनके बच्चों ने भी पुश्तैनी काम छोड़कर दूसरा धंधा करना शुरू कर दिया है। क्योंकि पिछले साल 40 रुपए के 100 दीपक और 10 रुपए में एक करवा बिका था। उनकी जितनी लागत और मेहनत लगती है, उस हिसाब से सामान का दाम नहीं मिलता है। ऐसे में मुनाफा न मिलने के कारण भी लोगों ने ये काम बंद कर दिया है। पूरी बस्ती में कुछ ही गिने-चुने कुम्हार हैं। वहीं, इनमें से सिर्फ तीन-चार ही हाथ से चलने वाले चाक बचे हैं।
 
कुम्हार शिवनाथ कहते हैं कि कुम्हार हमेशा से पर्यावरण को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं और इसिलिए हम मिट्टी को ही चाक पर अलग-अलग रूप देकर दीपक, बर्तन आदि तैयार करते हैं, लेकिन प्लास्टिक के बर्तन हमारी इस कला की हत्या कर रहे हैं। हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या चाइनीज बल्बों के झालर हैं क्योंकि यह सस्ते दामों पर बाजार में उपलब्ध हैं और दीपावली पर लोग इसे अपने घरों में लगाने के शौकीन होते जा रहे हैं।
 
इससे अथक प्रयास करने के बाद भी हम जितने दीपक आदि तैयार करते हैं, वह पूरे बिक नहीं पाते और हमें हमारी मेहनत का पारिश्रमिक तक नहीं मिल पाता। लेकिन अब यह सिर्फ देवी व देवताओं के होने वाले पूजा में प्रयोग होने तक ही सीमित हो गया है। आने वाली पीढ़ी इन मिट्टी के दीपकों से मुंह मोड़ती नजर आ रही है। इसी कारण हमारी यह कला अब दम तोड़ती नजर आ रही है।
लेखक के बारे में
अवनीश कुमार
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