प्रभु श्रीराम ने रावण का इस अद्भुत अस्त्र से किया था वध, वर्ना नहीं मरता दशानन

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020 (19:12 IST)
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राम और रावण का युद्ध अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रारंभ हुआ था और दशमी को यह युद्ध समाप्त हुआ था। लेकिन युद्ध तो उससे पहले ही जारी था। कुल मिलाकर युद्ध 32 दिन चला था। रामजी लंका में कुल 111 दिन रहे थे। राम ने जब रावण का वध किया तो दो तरह के धनुष की बात कही जाती है।

पहला कोदंड : बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि के धनुष का नाम कोदंड था इसीलिए प्रभु को कोदंड ( Kodanda ) कहा जाता था। 'कोदंड' का अर्थ होता है बांस से निर्मित। कोदंड एक चमत्कारिक धनुष था जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता था। कोदंड नाम से भिलाई में एक राम मंदिर भी है जिसे 'कोदंड रामालयम मंदिर' कहा जाता है। भगवान श्रीराम दंडकारण्य में 10 वर्ष तक भील और आदिवासियों के बीच रहे थे। कोदंड एक ऐसा धनुष था जिसका छोड़ा गया बाण लक्ष्य को भेदकर ही वापस आता था।


दूसरा ​ब्रह्मास्त्र: दरअसल, जब रावण किसी भी अस्त्र शस्त्र से नहीं मर रहा था तब विभिषण ने राम के कान में कहा कि ब्रह्मा ने रावण को एक ब्रह्मास्त्र दिया था और उसे केवल उसी अस्त्र से मारा जा सकता है। वह अस्त्र मंदोदरी के कक्ष में छिपाया हुआ है और उसके बिना यह युद्ध अनंतकाल तक चलता रहेगा। हनुमान तुरंत वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके मंदोदरी के समक्ष पहुंच गए। वह ब्राह्मण को देखकर प्रसन्न हो गई। वह उसका सत्कार करने लगी। तभी ब्राह्मणवेशधारी हनुमान ने मंदोदरी से कहा कि विभिषण ने राम को यह भेद बता दिया है कि रावण आपके कक्ष में रखे दिव्यास्त्र से ही मारा जाएगा। हनुमान ने कहा कि माते आप उस अस्त्र को कहीं और छिपा दें। यह सुनकर मंदोदरी घबरागई और वह तुरंत दौड़ते हुए वहां पहुंची जहां उसने अस्त्र छिपाकर रखा था। तभी हनुमानजी अपने असली रूप में आ गए और वे मंदोदरी से वह दिव्यास्त्र छीनकर मंदोदरी को रोता हुए छोड़कर उड़ चले।

1. एक बार समुद्र पार करने का जब कोई मार्ग नहीं समझ में आया तो भगवान श्रीराम ने समुद्र को अपने तीर से सुखाने की सोची और उन्होंने तरकश से अपना तीर निकाला ही था और प्रत्यंचा पर चढ़ाया ही था कि समुद्र के देवता प्रकट हो गए और उनसे प्रार्थना करने लगे थे। भगवान श्रीराम को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। हालांकि उन्होंने अपने धनुष और बाण का उपयोग बहुत ‍मुश्किल वक्त में ही किया।

देखि राम रिपु दल चलि आवा। बिहसी कठिन कोदण्ड चढ़ावा।।
अर्थात शत्रुओं की सेना को निकट आते देखकर श्रीरामचंद्रजी ने हंसकर कठिन धनुष कोदंड को चढ़ाया।


चूंकि कोदंड के तरकश बाण निकल कर प्रत्यंचा चढ़ चुका था तो प्रभु श्रीराम ने समुद्र देव से कहा कि मेरा यह बाण पुन: में तरकश में नहीं रख सकता। अत: तुम्हीं बताओं की मैं अब इसे किस दिशा में छोड़ूं? तब समुद्र देव कहते हैं कि पश्‍चिम दिशान में एक नगर है वहां पर एक राक्षस ने आतंक मचा रखा है आप उधरी ही इसे छोड़ दें। प्रभु ने ऐसा ही किया।

2. एक बार की बात है कि देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत ने श्रीराम की शक्ति को चुनौती देने के उद्देश्य से अहंकारवश कौवे का रूप धारण किया व सीताजी को पैर में चोंच मारकर लहू बहाकर भागने लगा। तुलसीदासजी लिखते हैं कि जैसे मंदबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो उसी प्रकार से उसका अहंकार बढ़ गया था और इस अहंकार के कारण वह-


।।सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा।।
।।चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना।।


वह मूढ़ मंदबुद्धि जयंत कौवे के रूप में सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भाग गया। जब रक्त बह चला तो रघुनाथजी ने जाना और धनुष पर तीर चढ़ाकर संधान किया। अब तो जयंत जान बचाने के लिए भागने लगा। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर इन्द्र ने भी उसे श्रीराम का विरोधी जानकर अपने पास नहीं रखा। तब उसके हृदय में निराशा से भय उत्पन्न हो गया और वह भयभीत होकर भागता फिरा, लेकिन किसी ने भी उसको शरण नहीं दी, क्योंकि रामजी के द्रोही को कौन हाथ लगाए? जब नारदजी ने जयंत को भयभीत और व्याकुल देखा तो उन्होंने कहा कि अब तो तुम्हें प्रभु श्रीराम ही बचा सकते हैं। उन्हीं की शरण में जाओ। तब जयंत ने पुकारकर कहा- 'हे शरणागत के हितकारी, मेरी रक्षा कीजिए प्रभु श्रीराम।' और कोदंड का बाण वहीं रुक गया।



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