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Ram navami Katha 2024 : रामनवमी की कथा कहानी

श्रीराम जी की पवित्र जन्म कथा

Written By WD Feature Desk
Updated: शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024 (14:25 IST)
HIGHLIGHTS
• रामनवमी की कथा क्या है।
• राम जन्म कथा के बारे में जानें।
• श्री राम नवमी 2024 पर जानें रामजन्म की कहानी।

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Ram Navami Story : रामायण और रामचरित मानस हमारे पवित्र ग्रंथ हैं। तुलसीदास जी ने श्री राम को ईश्वर मान कर रामचरितमानस की रचना की है किंतु आदिकवि वाल्मीकि ने अपने रामायण में श्री राम को मनुष्य ही माना है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को राम के राज्यभिषेक के बाद समाप्त कर दिया है, वहीं आदिकवि श्री वाल्मीकि ने अपने रामायण में कथा को आगे श्री राम के महाप्रयाण तक वर्णित किया है। 
 
आइए जानते हैं यहां श्रीराम की पवित्र जन्म कथा- 
 
श्रीराम जी की पवित्र जन्म कथा के अनुसार महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पंडितों को यज्ञ संपन्न कराने के लिए बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मंडप में पधारे। 
 
इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। संपूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगंध से महकने लगा। समस्त पंडितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा (खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया।
 
जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, बृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यंत तेजोमय, परम कांतिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे।
 
इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। संपूर्ण राज्य में आनंद मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गंधर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। 
 
पुरस्कार में प्रजाजनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम रामचंद्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ रामचंद्र गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। 
 
श्री राम में अत्यंत विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरूप अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरंतर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी, उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देखकर गर्व और आनंद से भर उठता था।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार त्रेतायुग में भगवान राम जन्म चैत्र शुक्ल नवमी के दिन हुआ था, जिसे श्री राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य रावण के अत्याचारों का खात्मा तथा अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करना था। 
 
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