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हरियाली तीज पर विशेष

रिश्तों को मजबूत बनाने वाली हरियाली

Written By ND
Updated: मंगलवार, 14 अगस्त 2007 (15:45 IST)
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- अनुपम मिश् र
भारतीय जनजीवन का प्रकृति से गहरा और आत्मीय संबंध है। हमारी परंपरा और संस्कृति में कुदरत के विविध रंग बिखरे पड़े हैं। वेदों, पुराणों में पेड़-पौधों और समूचे परिवेश के महत्व को रेखांकित किया गया है।

प्रकृति से जीवंत रिश्ता बनाए रखने के लि ए भारतीय परंपरा में कई उत्सवों की कल्पना समाहित है। हम हरियाली अमावस्या, हरियाली तीज, आँवला नवमी जैसी अनेक तिथियों पर विशेष आयोजनों के जरिए सृष्टि से अपने-आपको जोड़ते हैं।

आज की परिभाषा में देखें, तो नए लोगों को हरियाली तीज का पर्यावरण से खास संबंध नहीं दिखाई देगा। यों भी हमारे सारे त्योहार किसान के कलेंडर से जुड़कर चलते थे। उस ढंग से देखें, तो सावन की तीज पर बनने वाला यह त्योहार पूरा हरा रंग लेकर ही सामने आता है।इसलिए इसके नाम में हरियाली शब्द भी जोड़ दिया गया था।

इस त्योहार को मनाने के बाकी सभी प्रसंग फिलहाल हम भूल भी जाएँ, तो इसकी सबसे बड़ी बात बस इतनी ही याद रखनी चाहिए कि इस दिन पेड़ पर झूले डलते हैं। इन झूलों में पूरा गाँव और शहर भी सजधजकर पींग बढ़ाता है। निःसंदेह बड़ा हिस्सा तो बहनों का होता है। ये बहनें भी न सिर्फ अपने घर से बल्कि ससुराल से भी इस दिन तक अपने गाँव/ घर लौट आती हैं और तब वहाँ पर उनका रहना रक्षाबंधन तक चलता है।

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इस तरह से देखें तो हरियाली तीज रिश्तों का त्योहार है, लेकिन रिश्ते अपने व्यापक अर्थों में देखे जाने चाहिए। यह केवल भाई-बहन के रिश्तों का त्योहार नहीं है, इसका रिश्ता समाज से है। पेड़ से है, हरियाली से है और इस त्योहार को मनाने के पीछे बड़ी भावना यह है कि इन सब रिश्तों को मजबूत बनाने वाली हरियाली टिकी रहे।

यह हरियाली हमारे गाँव में हो, हमारे खेत में हो, हमारे घर में हो, घर के आँगन में हो। घर के बाहर, पीपल, नीम व आम के पेड़ लगे हों, जिसमें इस दिन की तैयारी में सुंदर झूले डाले जा सकें। यही बातशहरों में भी लागू होती रही है।

लेकिन अब हरियाली पर झूले का यह झूलता त्योहार थोड़ा थमता जा रहा है। कितने घरों के आगे पेड़ बचे हैं। कितने घरों के आँगन में पेड़ बचाकर रखे गए हैं। ऐसे घर ही कहाँ मिल पाएँगे जिनमें आँगन बचा हो। पहले जब घरों में यह सुविधा नहीं थी, तो लोग गाँव या शहर के तालाब के पास खड़े पेड़ों पर झूले डालते थे, बड़े शहरों में चौराहों पर या पास में पुराने नीम, बरगद, पीपल मिल ही जाते थे।

लेकिन अब पिछले दौर में हमने अपने तालाबों को भी कहाँ बचाया है, जिसकी पाल पर कोई पेड़ खड़ा मिले। शहर के चौराहों का हाल तो इससे भी बुरा है। देखते-देखते पिछले 5-10 बरस में विकास के नाम पर सड़कें चौड़ी हो गई हैं और इसमें उसके किनारे खड़े पेड़ों की बलि सबसे पहले चढ़ा दी गई है। बाद में किसी नगर पालक ने रही-सही कसर पूरी करने के लिए प्लास्टिक के पेड़ रोप दिए हैं।

हरियाली तीज मनाने वाले समाज पर यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वह कम से कम इस त्योहार को अपने बाकी त्योहारों की तरह बाजार को न सौंपे। इसके कार्ड न छापे, न बेचे, न खरीदे। वह अपनी सारी शक्ति को तेजी से समाज से गायब होती हुई हरियाली को वापस लाने में लगाए, तभी बहनों के झूलें पेंग ले सकेंगे।

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