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Sindhara Dooj: क्यों मनाते हैं सिंधारा दूज, पूजा विधि, कथा सहित खास जानकारी

Updated: गुरुवार, 17 अगस्त 2023 (10:38 IST)
Sindhara Dooj: धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रावण मास में हरियाली अमावस्या से महिलाओं के व्रत प्रारंभ हो जाते हैं तो हरतालिका तीज तक चलते हैं। इस क्रम में श्रावण शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन सिंधारा दूज का पर्व मनाया जाता है। 
 
इसके दूसरे दिन सुहागिनें हरियाली तीज रखती है और फिर भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज का पर्व आता है। 
 
आइए जानते हैं सिंधारा दूज के बारे में खास जानकारी- 
 
कब है सिंधारा दूज 2023 में: अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस बार 18 अगस्त 2023, शुक्रवार के दिन यह व्रत रखा जाएगा। सिंधारा दूज को सौभाग्य दूज, गौरी द्वितिया या स्थान्य वृद्धि के रूप में भी जाना जाता है।
 
कैसे मनाते हैं सिंधारा दूज : मुख्य रूप से यह बहुओं का त्योहार है। इस दिन सास अपनी बहुओं को भव्य उपहार प्रस्तुत करती हैं, जो अपने माता-पिता के घर में इन उपहारों के साथ आते हैं। सिंधारा दूज के दिन, बहूएं अपने माता-पिता द्वारा दिए गए 'बाया' लेकर अपने ससुराल वापस आ जाती हैं। 'बाया' में फल, व्यंजन और मिठाई और धन शामिल होता है। 
 
शाम को गौर माता या देवी पार्वती की पूजा करने के बाद, वह अपनी सास को यह 'बाया' भेंट करती हैं। सिंधारा दूज के दिन लड़कियां अपने मायके जाती हैं और इस दिन बेटियां मायके से ससुराल भी आती हैं। मायके से बाया लेकर बेटियां ससुराल आती हैं। तीज के दिन शाम को देवी पार्वती की पूजा करने के बाद बाया को सास को दे दिया जाता है। कुछ महिलाएं इस दिन उपवास करती है तो कुछ पूजा नियमों का पालन करती हैं।
 
किसकी होती है पूजा : इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की भी पूजा की जाती है। शाम के समय देवी को मिठाई और फूल अर्पण कर श्रद्धा के साथ गौरी पूजा की जाती है।
 
सिंधारा दूज की पूजा कैसे होती है : 
 
1. इस दिन मां ब्रह्मचारिणी को मिठाई और फूल अर्पण कर उनकी षोडशोपचार पूजा की जाती है।
2. महिलाएं देवी की मूर्ति की पूजा करती हैं और धूप, दीपक, चावल, फूल और मिठाई के रूप में कई प्रसाद चढ़ाती हैं।
3. पूजा के बाद, बहुओं को अपनी सास को ‘बाया’ भेंट करती हैं।
4. शाम को, गौर माता की पूजा पूरी भक्ति के साथ की जाती है। 
 
सिंधारा दूज की कथा : इस दिन चंचुला देवी ने मां पार्वती को सुंदर वस्त्र आभूषण चुनरी चढ़ाई थी, जिससे प्रसन्न होकर मां ने उन्हें अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान दिया था।  
 
श्रृंगार और झूला उत्सव कैसे मनाते हैं : 
 
1. इस दिन व्रतधारी महिलाएं पारंपरिक पोशाक भी पहनती हैं। 
2. हाथों में मेहंदी लगाती हैं और आभूषण पहनती हैं।
3. इस दिन महिलाएं एक-दूसरे के साथ उपहारों का आदान-प्रदान करती हैं। 
4. चूडि़यां इस उत्सव का खास अंग है। वास्तव में, नई चूडि़यां खरीदना और अन्य महिलाओं को चूडि़यां का उपहार देना भी इस उत्सव की एक दिलचस्प परंपरा है।
5. सिंधारा दूज के दिन ही सावन के झूले भी पड़ते हैं। महिलाएं झूले झूलते हुए गाने गाती हैं।
 
क्यों मनाते हैं : मान्यता के अनुसार यह त्योहार सभी बहुओं को समर्पित होता है। इस दिन महिलाएं उपवास रखकर अपने परिवार और पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। अपने जीवन में वैवाहिक सुख एवं मांगल्य की कामना करती हैं।
 
कहां मनाते हैं पर्व : यह पर्व खासकर उत्तर भारतीय महिलाओं में प्रचलित है परंतु तमिलनाडु और केरल में, महेश्वरी सप्तमत्रिका पूजा सिंधारा दूज के दिन की जाती है।
 
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