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दशावतार व्रत: भगवान विष्णु के 10 दिव्य स्वरूपों की साधना और अनंत पुण्य की प्राप्ति

Updated: शनिवार, 19 सितम्बर 2026 (15:10 IST)
21 सितंबर 2026 सोमवार को दशावतार का व्रत रखा जाएगा। भगवान विष्णु के 10 अवतारों की अनुकंपा पाने का महापर्व 'दशावतार व्रत' हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में यह दिन केवल एक साधारण व्रत नहीं, बल्कि जीवन के सभी पापों और कष्टों को मिटाकर मोक्ष की ओर ले जाने वाला एक सिद्ध अवसर माना गया है।
 

तिथि और शुभ मुहूर्त (वर्ष 2026)

दशमी तिथि की शुरुआत: 20 सितंबर 2026 को शाम 05:51 बजे से
दशमी तिथि का समापन: 21 सितंबर 2026 को रात 08:00 बजे तक
 

चार 'महादशमियों' में से एक है यह पावन दिन

सनातन परंपरा में चार दशमी तिथियों को अलौकिक और अत्यंत फलदायी माना गया है, जिन्हें महादशमी कहा जाता है:
  1. गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी)
  2. आशा दशमी (आषाढ़ शुक्ल दशमी)
  3. दशावतार व्रत (भाद्रपद शुक्ल दशमी)
  4. विजया दशमी/दशहरा (आश्विन शुक्ल दशमी)

दशावतार व्रत का महत्व:

'भविष्य पुराण', 'व्रतराज' और 'व्रत परिचय' जैसे प्रमुख धर्मग्रंथों में दशावतार व्रत का विशेष महात्म्य मिलता है। ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत का अनुष्ठान लगातार 10 वर्षों तक नियमपूर्वक करना चाहिए और उसके बाद इसका विधिवत् उद्यापन किया जाता है।
 

दशावतार पूजन का दुर्लभ फल

इस पावन दिन पर जो भी भक्त मत्स्य, कूर्मादि श्रीहरि के 10 अवतारों का स्मरण व पूजन करता है, उसे जीवन में कई अलौकिक सुख प्राप्त होते हैं:
पुरुषों के लिए: दस दिशाओं में यश, मान-सम्मान और सुख की प्राप्ति होती है। जीवन के अंत में भव-बंधन से मुक्ति मिलती है और विष्णुलोक का मार्ग प्रशस्त होता है। (भगवान विष्णु द्वारा 'मुर' नामक दैत्य का संहार करने के कारण ही उन्हें 'मुरारि' भी कहा जाता है।)
 
महिलाओं के लिए: घर धन-धान्य और समृद्धि से भरा रहता है, संतान का अटूट प्रेम मिलता है तथा इस लोक में संपूर्ण सुख भोगने के पश्चात विष्णुलोक में स्थान प्राप्त होता है।
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सरल एवं प्रामाणिक पूजा विधि

स्नान व संकल्प: व्रत वाले दिन किसी पवित्र नदी, सरोवर या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके बाद देवों और पितरों के नाम से तर्पण करें।
विशेष नैवेद्य (भोग): अनाज के आटे को शुद्ध घी में सेककर प्रसाद तैयार किया जाता है। ग्रंथों (भविष्य पुराण, व्रतराज आदि) के अनुसार, 10 वर्षों तक हर साल श्रीहरि को अलग-अलग पारंपरिक मिष्ठान/पक्वान्न (जैसे—अपूप/मालपुआ, घेवर, मोदक, शकरपारे, सुहाल आदि) का भोग लगाने का विधान है।
 

प्रसाद का वितरण:

आधा हिस्सा (50%): भगवान विष्णु को अर्पित करें।
एक-चौथाई हिस्सा (25%): किसी योग्य ब्राह्मण को दान करें।
शेष एक-चौथाई हिस्सा (25%): स्वयं प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
पूजन व दान: श्रीहरि का पवित्र जल से अभिषेक कर उन्हें धूप, दीप, गंध और ताजे पुष्प अर्पित करें। अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य अनुसार इस दिन गोदान या अन्न-वस्त्र दान का भी विशेष महत्व है।
 

समर्पण और प्रार्थना का पावन मंत्र

पूजा के अंत में हाथ जोड़कर संपूर्ण श्रद्धा से भगवान मुरारि के सामने यह प्रार्थना करें:
गातोऽस्मि शरणं देवं हरिं नारायणं प्रभुम्।
प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे विष्णुः प्रसीदतु॥
छिनत्तु वैष्णवीं मायां भक्त्या प्रीतो जनार्दनः।
श्वेतद्वीपं नयत्वस्मान्मयात्मा विनिवेदितः॥
भावार्थ: "हे दसों अवतारों को धारण करने वाले सर्वव्यापी प्रभु नारायण! हे जगन्नाथ! मैं पूरी श्रद्धा से आपकी शरण में हूँ, मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें। हे जनार्दन! अपनी भक्ति से प्रसन्न होकर मेरी अज्ञानता और मोह-माया को दूर करें और मुझे अपने परम धाम में स्थान दें। हे नाथ! मैंने अपना सर्वस्व आपके चरणों में समर्पित कर दिया है।"

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