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Osho: ओशो की पुण्यतिथि: बचपन से जुड़ी 10 अनसुनी और चौंकाने वाली बातें

Written By WD Feature Desk
Updated: सोमवार, 19 जनवरी 2026 (12:05 IST)
Osho: ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर, 1931 को कुचवाड़ा गांव, बरेली तहसील, जिला रायसेन, राज्य मध्यप्रदेश में एक जैन परिवार में हुआ था। 19 जनवरी 1990 को उन्होंने देह त्याग दी थी। उनके अनुयायी इस दिन को 'ओशो दिवस' या 'महापरिनिर्वाण दिवस' के रूप में मनाते हैं। ओशो (चन्द्र मोहन जैन) के बचपन की 10 दिलचस्प बातें जानिए।
 
1. ननिहाल में बीता बचपन
2. नाना ने रखा था 'राजा' नाम
3. मरघट जाने का शौक
4. मृत्यु का पहला अनुभव
5. अनोखा नामकरण
6. विद्रोही स्वभाव
7. तर्क करने में माहिर
8. नास्तिकता की ओर झुकाव
9. आज़ाद हिंद फ़ौज से जुड़ाव
10. मृत्यु का इंतजार
 
1. ओशो का ननिहाल में बीता बचपन: ओशो अपने माता-पिता की 11 संतानों में सबसे बड़े थे, लेकिन उनके जन्म के बाद शुरुआती 7 साल उन्होंने अपने ननिहाल (कुचवाड़ा) में नाना-नानी के साथ बिताए। वहां उन्हें अत्यधिक स्वतंत्रता और प्रेम मिला। 
 
2. ओशो नाना ने रखा था 'राजा' नाम: उनके नाना उन्हें प्यार से 'राजा' कहकर पुकारते थे। ओशो अक्सर कहते थे कि बचपन में मिली उस आज़ादी ने ही उनके भीतर सत्य को खोजने की प्यास जगाई।
 
3. ओशो को मरघट जाने का शौक: ओशो को बचपन से ही श्मशान (मरघट) जाने का बहुत शौक था। वे कहते थे कि जब स्कूल में नहीं मिलते थे, तो शिक्षक समझ जाते थे कि गांव में कोई मर गया होगा और ओशो श्मशान में होंगे।
 
4. ओशो को मृत्यु का पहला अनुभव: जब वे 7 साल के थे, उनके नाना का निधन उनके गोद में सिर रखकर हुआ था। इस घटना ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला और वे बचपन से ही मृत्यु के अर्थ की खोज में लग गए।
 
5. ओशो का अनोखा नामकरण: 10 वर्ष की उम्र में जब उनका स्कूल में दाखिला हुआ, तब उनका नाम 'रजनीश चंद्र मोहन जैन' रखा गया। इससे पहले उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था।
 
6. ओशो का विद्रोही स्वभाव: वे बचपन से ही बहुत विद्रोही थे। वे परंपराओं और बनी-बनाई लीक पर चलने के सख्त खिलाफ थे और हर चीज पर सवाल उठाते थे।
 
7. ओशो तर्क करने में माहिर: स्कूल के दिनों में ही उन्होंने एक कुशल वक्ता और तर्कवादी के रूप में पहचान बना ली थी। वे अक्सर अपने शिक्षकों से ऐसे सवाल पूछते थे जिनका जवाब देना मुश्किल हो जाता था।
 
8. ओशो का नास्तिकता की ओर झुकाव: किशोरावस्था तक आते-आते वे पूरी तरह नास्तिक बन चुके थे। उन्हें ईश्वर और पारंपरिक धार्मिक कर्मकांडों में कोई विश्वास नहीं था।
 
9. ओशो का आज़ाद हिंद फ़ौज से जुड़ाव: बहुत कम लोग जानते हैं कि किशोरावस्था में वे कुछ समय के लिए 'आज़ाद हिंद फ़ौज' के विचारों से प्रभावित होकर उससे जुड़े भी थे।
 
10. ओशो को था मृत्यु का इंतजार: एक ज्योतिषी की भविष्यवाणी (कि उनकी मृत्यु जल्द हो सकती है) के कारण 14 वर्ष की आयु में उन्होंने सात दिनों तक एक मंदिर में अकेले रहकर मृत्यु का इंतजार करने का प्रयोग किया था।
 
ओशो को जबलपुर में 21 वर्ष की आयु में 21 मार्च 1953 मौलश्री वृक्ष के नीचे संबोधि की प्राप्ति हुई। 19 जनवरी 1990 को पूना स्थित अपने आश्रम में सायं 5 बजे के लगभग अपनी देह त्याग दी। उनका जन्म नाम चंद्रमोहन जैन था। 
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