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शार्लिट शहर के 'साहित्य संगम' ग्रुप की पहली कविता गोष्ठी का आयोजन संपन्न

शुक्रवार,अप्रैल 29, 2022
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कैसे एक व्यक्ति की सोच, उठाया गया एक सार्थक कदम और प्रयास भविष्य निश्चित कर, अस्तित्व को मजबूत कर, सभी को एकजुट कर सभी की ख़ुशियों का कारण बन जाता है। भविष्य को लेकर देखा गया एक सपना साकार होकर भविष्य को वर्तमान में संजो लेता है।
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अमेरिका ने यारों, बूढ़ा कर दिया, वरना हम भी, जवान थे अच्छे-खासे।
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भरा आकाश और नभ मंडल बारूद और धुएं की बौछार है, सिसक रही मानवता ये कैसा नरसंहार है, जहां थी तारों की लड़ियां वहां बमों की भरमार है... कांप रहा नभमंडल सारा ये कैसा अत्याचार है
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रह रह कर मन उदास हो उठता है, एक अंधेरे कोने में सिमटने लगता है हजार दुख छिपाकर एक खुशी मनाएं कैसे, मां ठीक है लेकिन मामा चले गए
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जब सहन करते हैं, जब मर्यादा उलांघते हैं, जब आकांक्षाएं ऊंची रखते हैं, जब उम्मीदों को ठुकराते हैं, जब चाल चल जाते हैं
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एक समुंदर पानी का, एक समुंदर रेत का, एक जमीन बंजर एक पहाड़ विशाल, मध्य जीवन रिक्त है
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स्वास्थ, सद्‌बुद्धि, हिम्मत, मेहनत, चार पाए हैं ऐसी खटिया के जिन पर टिक कर, आराम से कटती है जिंदगी
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आज मेरी तस्वीरें चिढ़ा रही हैं मुझे, जब मैं उनसे नजरें मिला रही हूं कुछ पुरानी तस्वीरें कॉलेज के दिनों की, प्रयोगशाला में सफेद कोट पहने
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सुंदर, नाजुक, कोमल-कोमल, मानो कोई खिली थी नन्ही-सी कली, देख-देख मैं मन ही मन खुश होती लहराती मेरे मन की बगिया
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याद आती है भारत की दिवाली ! यहां तो बस लगता है खाली खाली !! न यहां वह वातावरण है और न है संग ! व्यस्त जीवन के कारण न है वह उमंग!!
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अमेरिका के रेतीले प्रांत नेवादा में, अलकापुरी सी चमचमाती, रेगिस्तान के बीच बसी हुई, लास वेगास की भव्य नगरी।
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दिल्ली शहर इतना प्रदूषित (Polluted) हो चुका है कि वहां पर एक दिन रहकर सांस लेना यानी दस सिगरेट पीने के बराबर नुकसान करता है- ऐसा TV चैनल वाले अक्सर बताते रहते हैं,
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प्रवासी कविता : पर्वत

रविवार,अक्टूबर 3, 2021
अनंतकाल से अटल खड़ा है, पर्वत एक विशाल, उत्तुंग शिखर उसका चमके, जैसे कोई मशाल।
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आज बदली है सोच बदला है जमाना, दावे तो कई हैं फिर भी एक पदक ना ला सकी बेटी, कइयों के मुंह खुल गए, कइयों ने सांत्वना भी दी
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मुझे ऐसा लगे हर सुबह का सूरज आप हैं, अथाह समुंदर कोई और नहीं आप ही हैं पापा, पृथ्वी के माथे लगा चंद्र भी आप हैं, खिली बगिया का झूला भी आप ही तो हैं पापा,
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जिनके साथ बचपन में खेला, जिनसे सुनी लोरियां मैंने, जिनका साया छांव थी मेरी
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तू तो रही है सदा से आरजू मेरी मेरी भारत माता तू तो बसी है मेरे मन में पर क्या करूं यहां से तुझे न देखा जाता
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जीवन ज्योत जल जाती मानो तेरे आने से, लोग मुस्कुराते थे मेरे इतराने से
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मेरा उससे कोई नाता नहीं ना मैंने उसे देखा है कभी फिर भी वह लगती है अपनी दूर बैठी लगती है करीब-सी संसार छोटा होता जा रहा वह किसी तरह मिल गई
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