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COVID-19 Lock Down पर कविता : चलो घर बैठ रिश्ते निभाते हैं

शनिवार,मार्च 28, 2020
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सब कुछ बदल रहा, इंसान बदल रहे, मुस्कराहटें बदल रही, प्रकृति करवट बदल रही!
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फूलों को थामते-थमाते, कब वह दिल में उतर आए, कुछ प्यारा-सा अहसास उन्हें हुआ, अब होने लगा हमें भी वही अहसास!
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सुंदर, नाजुक, कोमल-कोमल मानो कोई खिली थी नन्ही-सी कली देख-देख मैं मन ही मन खुश होती लहराती मेरे मन की बगिया
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अभी फ़ोन रखा गया। दिल में अब भी कई बातें हैं। कई बातें सिर्फ कहने की होती हैं, दिलों पर उनका वजूद कुछ भी नहीं होता। अच्छा, मैं तुम्हें फ़ोन करता हूं
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)।
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दिन ढला हो गई रात लो आई सुबह नई वक्त सदा चलता ही रहता बिना कोई विश्राम लिए
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कल ही तो ऊपर सूर्य ग्रहण लगा था। आज नीचे औरत के आकाश का सूर्य ग्रहण हट गया। अब दिखेंगी पगडंडियां पर्दे के पीछे वाली आंखों को भी
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हाला-प्याला की गाथा, वह अद्वितीय लिखने वाला, बिना पीए ही लिख डाला, बच्चनजी ने मधुशाला।
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एक बार कह दिया तो फिर करके दिखाने वाले 'पं. चंद्रशेखर आजाद' को बचपन में एक बार अंग्रेजी सरकार ने 15 कोड़ों का दंड दिया तभी उन्होंने प्रण किया कि वे अब कभी पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। वे गुनगुनाया करते थे
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मुझे ऐसा लगे हर सुबह का सूरज आप हैं, अथाह समुंदर कोई और नहीं आप ही हैं पापा, पृथ्वी के माथे लगा चंद्र भी आप हैं,
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मोदी जी का जलवा देखो, वो जीत गए दोबारा, 'चौकीदार चोर है', बिल्कुल झूठा था वह नारा।
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नारी तू नारायणी चलता तुझसे ही संसार है। है नाजुक और सुंदर तू कितनी तुझमें ओजस्विता और सहजता का श्रृंगार है
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स्वच्छ नीला आकाश, चिलचिलाती धूप, देखता ही रह गया, शिशिर का यह रूप। मन मचला कि क्यूं ना, बाहर घूम आऊं, तापमान ऋण तीस, जाऊं तो कैसे जाऊं?
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घास की सख्ती जाती सिमटती आई नमी अब वातावरण में नन्ही ओंस की बूंदें धूप में चांदनी-सी चमके-दमके।
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यह कैसी बसंत ऋतु दिल पर छाई, जब कोमल विचारों की बयार बहती आई। सपनों की पंखुड़ियों पर दस्तक दी निंदिया ने, नीले आकाश तले आरजुएं तितलियों-सी मंडराईं।
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मैंने मंदिर देखा, मस्जिद देखी, चर्च देखा और देखा गुरुद्वारा, मैंने मेरे प्रभु से पूछा, समझा दो क्या है सारा माजरा। तू मदारी या मेरे बंदे मदारी,
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आना-जाना लगा हुआ है, यह है मुसाफिरखाना, थोड़ी देर यहां रुकना है, फिर है सबको जाना। गठरी रखकर सीधा कर लूं, थोड़ा अपना पांव, सात कोस हूं चलकर आया, छूटा मेरा गांव।
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)
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रह गए हैं अब कुछ पल, इस साल के अंत के, होने वाली है नई सुबह, सपनों के संसार की।
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