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हिन्दी कविता : मेरे कृष्ण-कन्हैया, बंशी बजैया

गुरुवार,अगस्त 18, 2022
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क्या भारत मेरा देश नहीं है? क्या मैं भारत का लाल नहीं हूं? क्यों तन पर चिथड़े हैं मेरे? क्यों मन मेरा रीता उदास है? क्यों ईश्वर मुझसे छिपा हुआ है? क्यों जीवन बोझ बना हुआ है? Desh Bhakti Kavita in Hindi
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Poem on 15 August कहते थे बरसों पहले तुम हैं हिन्दी-चीनी भाई-भाई, फिर सीमा पर चुपके-चुपके किसने थी आग लगाई। फेंगशुई का बहाना करके क्यों अंधविश्वास फैलाया, नकली और घटिया चीजों का भारत में जाल बिछाया। लड़ियां, घड़ियां और पटाखे, टीवी व एसी दे गए, सस्ती ...
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यह अनमोल जिंदगी, इसकी अपनी पहचान है, जब इसने जन्म लिया, पतन हुआ गुलामी का, यह एक गर्वित एहसास है आजादी का, इसका अपना ठोस अस्तित्व है संसार में, यह जिंदगी सफल है, बिंदास मुस्कुराती है, चाय संग आलस में पांव पसार सुस्ताती है...
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Poem on Bharat Maa सीता-सा आह्वान कर, तुम्हारी छवि मन में उतारूं, मेरे विश्वास का तिनका जिसे थाम मैं प्रार्थना करती, किसी दिन जब भाग्य में होगा, दाना-पानी तेरे आंगन में, मैं लौट, लौटा लाऊंगी बचपन कि यह दो तरफा जिंदगी, अब जी नहीं जाती !
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फ्रेंडशिप डे पर कविता : कड़कती धूप में गन्ने का रस जैसे, सर्दियों में चाय की गरम सेंक जैसे, जैसे रसमलाई नरम जैसे पकौड़े करारे है दोस्त मेरे बड़े प्यारे हैं, दोस्त मेरे बड़े प्यारे हैं, दनदनाती बारिश में छाते की तरह, उबड़-खाबड़ रास्तों में जूतों की ...
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एक दीवाना था, सनसनाती बिजलियों को मस्ती में छेड़ा था, तूफानों की बांहों को कस के मरोड़ा था, तमतमाते शोलों को हाथों में सजाया था मंजिल की लौ छूने वो परवाने सा मचला था,
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मेरी भारत माता याद तो बहुत आती है, आंखें भी भर जाती हैं, दूर हूं तुझसे इतनी कि तेरी, सीमा भी नजर न आती है, तू तो रही है सदा से आरजू मेरी, मेरी भारत माता, तू तो बसी है मेरे मन में पर क्या करूं यहां से तुझे न देखा जाता...
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रह रह कर मन उदास हो उठता है, एक अंधेरे कोने में सिमटने लगता है हजार दुख छिपाकर एक खुशी मनाएं कैसे, मां ठीक है लेकिन मामा चले गए
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एक सुबह सुहानी खिल आई इठलाती, नभ ललचाए आ बैठे सुबह की गोद में, धूप देख शरमा पड़ी, सूरज हो गया रुआंसा, गगन की मादकता से धरा को मिली राहत
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दुर्घटना हुई कार की मेरी, पहुंच गई वो बॉडी शॉप, अपनी बॉडी सही सलामत, ऊपर वाले का था हाथ।
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ज्येष्ठ का महीना, सूर्य का भभकना, जलाशयों का सूखना, जल जंतुओं का तड़पना।
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ग्रीष्म ऋतु है कितनी अच्छी, लंबी छुट्टी लाती है, पढ़ने लिखने होमवर्क से, राहत हमें दिलाती है।
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अमेरिका की स्टेट नॉर्थ कैरोलाइना के शार्लिट शहर के 'साहित्य संगम' ग्रुप की पहली कविता गोष्ठी की रिपोर्ट यहां पेश की जा रही है।
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कैसे एक व्यक्ति की सोच, उठाया गया एक सार्थक कदम और प्रयास भविष्य निश्चित कर, अस्तित्व को मजबूत कर, सभी को एकजुट कर सभी की ख़ुशियों का कारण बन जाता है। भविष्य को लेकर देखा गया एक सपना साकार होकर भविष्य को वर्तमान में संजो लेता है।
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अमेरिका ने यारों, बूढ़ा कर दिया, वरना हम भी, जवान थे अच्छे-खासे।
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भरा आकाश और नभ मंडल बारूद और धुएं की बौछार है, सिसक रही मानवता ये कैसा नरसंहार है, जहां थी तारों की लड़ियां वहां बमों की भरमार है... कांप रहा नभमंडल सारा ये कैसा अत्याचार है
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जब सहन करते हैं, जब मर्यादा उलांघते हैं, जब आकांक्षाएं ऊंची रखते हैं, जब उम्मीदों को ठुकराते हैं, जब चाल चल जाते हैं
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एक समुंदर पानी का, एक समुंदर रेत का, एक जमीन बंजर एक पहाड़ विशाल, मध्य जीवन रिक्त है
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स्वास्थ, सद्‌बुद्धि, हिम्मत, मेहनत, चार पाए हैं ऐसी खटिया के जिन पर टिक कर, आराम से कटती है जिंदगी
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