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प्रवासी कविता : कशिश तेरे मेरे बीच

मंगलवार,अगस्त 25, 2020
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एक दीवाना था, सनसनाती बिजलियों को मस्ती में छेड़ा था, तूफ़ानों की बांहों को कस के मरोड़ा था, तमतमाते शोलों को हाथों में सजाया था
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कड़कती धूप में गन्ने का रस जैसे, सर्दियों में चाय की गरम सेंक जैसे जैसे रसमलाई नरम जैसे पकौड़े करारे है
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सौम्य सुदर्शन शामल सुंदर, नीलमणी सम रोचन उज्ज्वल, रणवीर धुरंधर वीर धनुर्धर, असुर निकंदन दशरथ नंदन
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ढ़ीठ होती हैं यादें, बेबाक होती हैं यादें, बेवक्त की बारिश सी सनकी होती हैं यादें, दुआ मरहम से भी लाइलाज होती हैं, पुराने ज़ख्मों सी ज़िद्दी होती हैं यादें
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दोस्तों के साथ मिल कहकहे लगाना, वो हंसना वो ठहाके लगाना, भूला हुआ हो जैसे एक फसाना! थिरकते हुए पैरों पर रातों की जवानी, कभी मस्ती, कभी शोखियों की रवानी,
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कितने परिवर्तनों की बात करें, कितने जुल्म सहे हैं यह गिनें कुछ परिवर्तन आया भी तो, क्या जुल्म होने बंद हो गए !
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चलो गांव लौट चलें फिर से बुलाएं बारिशों को, गड़गड़ाते बादलों संग झूमे हल्ला-गुल्ला खूब शोर मचाएं!
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एक सदी के बीत जाने पर, इम्तिहान लेती कुदरत महामारी के भेष में मिला हाथों की लकीरें सभी इंसानों की, दुनिया के लिए खड़ी करती एक चुनौती !
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यह कैसा वसंत आया, उल्लास नहीं जो लाया, संताप सब तरफ छाया, यहां कोरोना का साया।
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मां तन्हा यहां मैं कितनी, उड़कर आने को मन करता, तेरी गोद में सिर रखकर, सुकून पाने को मन करता !
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नील गगन की छांव में भोर होते ही सूरज निकलते ही मेघों-सा वेग भर वह चल पड़ते हैं
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भीतर मेरे कई मुखौटे, कई पहरे परछाइयां,कई तहों में छिपे सिमटे, बंद आंखों में भीतर गुपचुप!
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चिकित्सकों ने सीमित ज्ञान से चेचक हैजा जीता, अब अथक ज्ञान समुद्र से कोरोना जंग जीत लेंगे !
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ना तुम जल्दी ऑफ़िस जाना, ना तुम देर से घर आना, घर से ही काम कर काम चलाना !
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सब कुछ बदल रहा, इंसान बदल रहे, मुस्कराहटें बदल रही, प्रकृति करवट बदल रही!
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फूलों को थामते-थमाते, कब वह दिल में उतर आए, कुछ प्यारा-सा अहसास उन्हें हुआ, अब होने लगा हमें भी वही अहसास!
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सुंदर, नाजुक, कोमल-कोमल मानो कोई खिली थी नन्ही-सी कली देख-देख मैं मन ही मन खुश होती लहराती मेरे मन की बगिया
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अभी फ़ोन रखा गया। दिल में अब भी कई बातें हैं। कई बातें सिर्फ कहने की होती हैं, दिलों पर उनका वजूद कुछ भी नहीं होता। अच्छा, मैं तुम्हें फ़ोन करता हूं
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें बेटियों की पहुनाई (मेहमाननवाजी)।
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