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प्रवासी कविता : बुढ़ापा अमेरिका में

Updated: गुरुवार, 17 मार्च 2022 (17:07 IST)
old age poem
 
- हरनारायण शुक्ला (मिनियापोलिस, USA) 
 
अमेरिका ने यारों,
बूढ़ा कर दिया, 
वरना हम भी,
जवान थे अच्छे-खासे।
 
आए तो थे चालीस के,
अब हो गया है अस्सी,
सेहत और उम्र की कशमकश,
जिंदगी खिंची-तनी इक रस्सी।
 
मैं पापड़ बहुत ही बेला,
धक्का भी खूब खाया,
सेवा-निवृत्त जब हो ही गया,
तब जाके मुझे रास आया।

 
जिंदाबाद 'सोशल सिक्योरिटी',
वहीं से आती, मेरी दाल-रोटी, 
कुछ मिलता भी है मुझको पेंशन,
मस्ती में हूं, मैं लेता नहीं हूं टेंशन।
 
आराम की है जिंदगी,
मेरी यही पसंदगी, 
करता नहीं मैं दिल्लगी, 
प्रभु, मेरी तुझे है बंदगी।

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