विश्व अप्रवासी दिवस : कल के भारतीय और आज का भारत...

Simran Bhatia

कल देर रात टीवी पर अलग-अलग पर नृत्य प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम देर रात तक देखती रही। वीकेंड भी था और ठंड भी कड़ाके की शुरू हो चुकी है। करने के लिए कुछ खास था नहीं। नृत्य मेरा दूसरा प्यार है लेखन के बाद। मेरी गुरु ऋतु ने मुझे बॉलीवुड डांस से निकलकर फिर से कथक में डाल दिया है। उनका तर्क है तुम्हें नृत्य की समझ है और तुम्हारे लिए वही ठीक है।
इस उम्र में वे मेरे गुजरे सपने में फिर से जान डाल रही हैं, जो वे हमेशा करती हैं सभी के लिए। सारे प्रोग्राम एक जैसे ही लग रहे थे। नृत्य के नाम पर तेज संगीत पर हवा में उछलते-कूदते पतले से, नरम रबर की तरफ सभी प्रतियोगियों के शरीर और जजों के कमेंट्स सारे लगभग एक जैसे। मैं सोचने लगी कि लगातार 3-4 घंटे एक जगह बैठकर इन्हें देखा जा सकता है, शायद?

मेरे शहर शार्लोट में इंडियन कम्युनिटी के 80 प्रतिशत बच्चे अपने छात्र जीवन में क्लासिकल इंडियन डांस, गायन या वादन सीखते हैं, क्योंकि अभिभावक विरासत में मिली अपनी सांस्कृतिक संपदा के संस्कारों के बीज अपनी अगली पीढ़ी में बोना चाहते हैं। जरिया होता है- भाषा, कला, सिनेमा, मंदिर (हिन्दू सेंटर, जो भारतीयों के इकट्ठा होने का सामाजिक स्थान भी है) में दी जाने वाली हिन्दुत्व पर शिक्षा आदि सभी जगह बच्चों को लेकर जाते हैं। लेकिन भारतीय टीवी चैनल्स पर आज भारत की अलग ही तस्वीर दिखाई देती है और हमारे बच्चे कुछ पिछड़े दिखाई देते हैं?

सुबह आज मौसम की पहली बर्फ गिरी है, छुट्टी है। घास पर नरम सफेद शुद्ध बर्फ की परत और गहरी भूरी पेड़ों से गिर चुकी सूखी पत्तियों के ढेर पर छोटी-छोटी गहरी भूरी-काली सर्दियों में आने वालीं चिड़ियाएं फुदक-फुदककर पीली पड़ी घास में से पता नहीं क्या ढूंढकर खा रही हैं। हल्की धुन पर चलते संगीत पर मेरा ध्यान गया। ऐसा लग रहा था, मानो हर चिड़िया कोई पारंपरिक नृत्य पेश कर रही हो। मेरी कल्पनाओं में मुझे मजा आने लगा और मैं देर तक उन्हें निहार रही थी।

जब थोड़ी धूप निकल आई तो काली मोटी बिल्ली रोज की तरह उन पर झपट्टा मारने को आ गई और कुछ कौवे व बाज भी मंडराने लगे। थोड़ी धुंध भी साफ हो चुकी थी। अब नन्ही चिड़ियाएं मेरी कल्पनाओं का नृत्य छोड़ डर के मारे इधर-उधर उड़ने लगीं। मुझे लगा कि रात के टीवी में दिखाए गए तेज संगीत का एक्शन शुरू हो गया है कि 3 बज गए और पार्टी अभी बाकी है और ये नन्ही क्लासिकल इंडियन डांसर चिड़ियाएं प्रकृति के नृत्य के इस दूसरे राउंड में बाहर कर दी गई हैं हमारे बच्चों की तरह।

एक सीधा सवाल मेरे जेहन में गूंजा कि क्या हमें भारत से दूर विदेश में रहकर अपने बच्चों में अपनी भाषा, अपनी जड़ों, अपनी कला, अपनी संस्कृति, अपनी विरासत को आगे बढ़ाने की जो कोशिश है, जो जूनून है, जिसके लिए यहां वर्षों का समय, पैसा, शक्ति-साधन कई वर्षों की मेहनत, प्रतिबद्धता आदि है, क्या उसे बंद कर देना चाहिए? जबकि भारत में भी उसकी कद्र कम हो रही है, तस्वीर बदल रही है? इस मेहनत का क्या फायदा होने वाला है?
तत-तत, थुन-थुन की जगह मादक, अश्लील व उत्तेजक नृत्यों की भरमार है, जो कि सिर्फ एक्रोबेट्स की कला रह गई है? या कोई बीच का रास्ता भी है? मैं इस तत्थ से वाकिफ हूं कि परिवर्तन समय की पहचान है और वह निश्चित ही आवश्यक है। शायद भारत में जो तस्वीर बदल रही है, वो समय की मांग है। लेकिन जब बदलाव की गति बहुत तेज हो तो वह बदलाव किसी भी देश या समाज में असंतुलन लाता है।

मैंने मेरे सवालों के जवाब जानने के लिए शार्लोट शहर के नृत्य के सभी गुरु महारथियों, जिनका जीवन यहां भारतीय कला और संस्कृति के लिए समर्पित है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिनकी पहचान है, से संपर्क किया और अपने सवाल रखे। उन सभी के अनुभवों के आधार पर उनके जवाब भी मुझे मिल गए, उनका शुक्रिया। सभी के विचार लगभग एक समान ही थे और संबंधित चिंता भी!
नृत्य न ही मेरी जीविका का साधन है, न ही नृत्य मेरे लिए किसी के मनोरंजन का माध्यम मात्र है, न ही नृत्य मेरा चाल-चलन, मेरे लिए परंपराओं का निर्वाह या मेरी संस्कृति, सभ्यता का मात्र मुखौटा है। नृत्य मात्र विरासत में मिली मुझे सौगात भी नहीं है, मैं किसी पद, गरिमा या अवॉर्ड के लिए नृत्य की सेवा नहीं करती। नृत्य मेरी साधना, आराधना, भक्ति से भी बढ़कर मेरा जूनून है, जो मुझे मेरे ईश्वर से जोड़ता है।

मैंने कई साल से हिन्दू सेंटर में सारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना छोड़ दिया है। 'फेस्टिवल ऑफ इंडिया' में कई साल से मेरी भागीदारी नहीं है, क्योंकि उनकी मांग अब बॉलीवुड डांस की ज्यादा हो गई है। फिर भी मेरी नृत्य शिक्षा में अपने बच्चों को डालने के लिए लोग 1 साल से अधिक लंबे समय तक इंतजार करते हैं। मैं बाकायदा अभिभावकों का इंटरव्यू लेती हूं और उसके बाद ही बच्चे को अपना शिष्य बनाती हूं या किसी दूसरी नृत्य शिक्षिका के पास भेज देती हूं। फिर भी मेरे वार्षिक नृत्य कार्यक्रम में हजारों की उपस्थिति दर्ज होती है, टिकट्स 2 महीनों पहले बुक हो जाती हैं।

मैं शुद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्य सिखाती हूं और मेरी प्रस्तुति भी शुद्ध शास्त्रीय और लोकनृत्यों में होती है। मैं अपने शिष्यों को अपनी नृत्य शिक्षा द्वारा भारतीय सभ्यता और संस्कृति की शिक्षा देती हूं। ये शब्द हैं डॉ. महा गिंगरीच के (जो शार्लोट, अमेरिका में भरतनाट्यम की गुरु हैं और सीपीसीसी कम्युनिटी कॉलेज की एडमिन असिस्टेंस टू वाइज प्रेजीडेंट हैं) पिछले 35 वर्षों से अमेरिका के शहर शार्लोट को अपनी कला से भारतीय संस्कृति के रंग में रंग चुकी हैं। यह उनके अथक प्रयास और मेहनत का ही नतीजा है कि शार्लोट शहर बहुत छोटा होते हुए भी भारतीय सांस्कृतिक कला का एक केंद्र बन चुका है। नृत्य कला लोगों की रगों में बस आम जीवन की रोजमर्रा की जीवनशैली का अंग बन चुका है और शार्लोट शहर के लिए एक वरदान। सभी प्रकार के शास्त्रीय नृत्य, गायन, लोकनृत्य, बॉलीवुड नृत्य आदि कई कलाओं में यह शहर अग्रणी है। यहां कई सांस्कृतिक कार्यक्रम और जलसे होते हैं।

डॉ. महा की वार्षिक प्रस्तुति में जब स्टेज पर जीवंत ड्रम की थाप, गिटार की झनझनाहट और लेटिन डांस का थिरकता संगीत, उस पर क्लासिकल लेटिन डांस प्रस्तुत करते कलाकार और उसी थाप पर सजीव फ्यूजन प्रस्तुति में भरतनाट्यम के लिबास में नाचती डॉ. महा उस दैविक माहौल में किसी देवी-सी प्रतीत होती हैं। उधर दूसरी नृत्यगुरु राधिका घाघरा-चोली पहने उस नृत्य के जमे अखाड़े में अपने लेटिन डांस पार्टनर के साथ उतर आती हैं और दर्शक किसी मोहपाश में बंधकर पलकें झपकना भी भूल जाते हैं। उस दर्शक दीर्घा में कौन गोरा, कौन काला और कौन हिन्दी, तमिल, तेलुगु, मलयाली, कन्नड़, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, बंगाली किसी भी भाषा को बोलता हो, मक्का-मदीना जाता हो या हरिद्वार जाकर अस्थि-विसर्जन करता हो- किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, भान भी नहीं रहता। उस जीवंत प्रस्तुति को देखकर 'नवरंग', 'झनक-झनक पायल बाजे', 'नाचे मयूरी', 'गाइड' सिनेमा का पीरियड याद आ जाता है, साथ ही अफ्रीकन ड्रम पर थिरकते कलाकार 60 के दशक का हेलन के फ्लेमिंगो डांस, अफ्रीका के हुलाहु और छत्तीसगढ़ के आदिवासी नृत्य की याद करवाते हैं।

'कला, कला होती है चाहे कोई भी डांस फॉर्म हो। नृत्य की एक ही भाषा है। उस परम आनंद को महसूस करने की, जब आप अपने आपको भूलकर हृदय, आत्मा से पूरी तरह उस ईश्वर को, उस परम आनंद को महसूस करते हैं तो हमें दोनों ही सभ्यताओं के अच्छे पक्ष अपनाने चाहिए।' ये शब्द हैं गुरु राधिका के, जो यामिनी कृष्णमूर्ति की शिष्या हैं। वे दूरदर्शन पर उमा शर्मा और पं. बिरजू महाराज के साथ नृत्य प्रस्तुति दिया करती थीं और आज अमेरिका में नृत्यसेवा में जीवन समर्पित कर भारतीय नृत्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात कर चुकी हैं। गुरु राधिका हर नृत्यशैली का स्वागत खुले दिल से करती हैं, परंतु अपनी विरासत की जड़ें बहुत गहरे तक उनमें जमी हुई हैं और यही उनकी विशुद्ध गर्वित पहचान है, जो भीड़ में भी उन्हें अलग पहचान दिलवाती है।

यहां भारत के विभिन्न हिस्सों से आईं कई नृत्य शिक्षिकाएं हैं। भारतीय कम्युनिटी के बच्चे विभिन्न माध्यमों से भारतीय नृत्य कला की सेवा करते हैं। कोई भी त्योहार, उत्सव, स्कूलों के सांस्कृतिक कार्यक्रम, यूनिवर्सिटीज़ के कार्यक्रम, 15 अगस्त, 26 जनवरी, गांधी जयंती, फेस्टिवल ऑफ इंडिया, कोई भी इंटरनेशनल फेस्टिवल यहां तक कि चीन का ड्रेगन फेस्टिवल और भारतीय नृत्य कला का डंका सभी ओर बजता है।

अब वो जमाने गए, जब साड़ी, बिंदी, चूड़ी, कढ़ी का मतलब समझाना पड़ता था। अब तो यह हाल यह है कि स्कूलों में मैनू में भी भारतीय व्यंजन शामिल किए जाते हैं। ग्रॉसरी स्टोर्स में भारतीय व्यंजनों की बहार है। पनीर, घी, नॉन रोटी, समोसा भी अमेरिकनों के खानपान में शामिल हो चुका है और भारतीय परिधान की दुकानों में अमेरिकी ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी है। 'ॐ' का उच्चारण कर योग और ध्यान अमेरिकी जानने लगे हैं।

दूसरी ओर कथक और बॉलीवुड नृत्य की ठोस नींव की शार्लोट को सौगात देकर, नई ऊंचाइयों तक पहुंचाकर, 4 साल से लेकर 60 की उम्र के कलाकारों के सपनों की सौदागर कोलकाता दूरदर्शन की प्रसिद्ध कथक कलाकार ऋतु मुखर्जी, जो सभी उम्र के कलाकारों के सपनों को नए आयाम देकर सभी को साथ लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी से लेकर यश चोपड़ा की 'वीरजारा' पर आधारित कई बेजोड़ यादगार प्रस्तुतियों के जरिए नेपाल की कम उम्र में वेश्यावृत्ति में धकेली गईं कन्याओं की मददगार संस्था 'मैत्री', गरीब-अनाथ बच्चों की स्थानीय मददगार संस्था 'ट्री हाउस' और कभी भारतीय कम्युनिटी में किसी गंभीर बीमारी से लड़ रही बच्ची के इलाज के लिए पैसा जुटाने के लिए तन-मन-धन से अपने 120 शिष्यों के साथ जी-जान से जुट जाती हैं। हर साल हजारों डॉलर चैरिटी के लिए जमा करती हैं। वे अपने शिष्यों को एक ही संदेश देती हैं कि अपनी कला का प्रदर्शन मानवता की सेवा, किसी अच्छे उद्देश्य और भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए करो।

उनके पहले शब्द मेरे कानों में हमेशा गूंजते हैं कि 'जिस दिन मुझे कथक छोड़कर सिर्फ बॉलीवुड नृत्य करना पड़े, उस दिन मेरा शरीर तो रहेगा, परंतु आत्मा मर जाएगी।' वे आज नए जमाने की गुरु हैं। उनका सिखाने का तरीका गुरु-शिष्य परंपरा के साथ-साथ दोस्ती का भी है। भारतीय मूल्यों, संस्कृति, कला के साथ-साथ वे नए और आधुनिक प्रयोगों को करने और कुछ नया करने में हमेशा तत्पर रहती हैं। उनकी प्रस्तुति में पं. बिरजू महाराज के गीतों के साथ ग़ज़ल, तराना, ठुमरी, दादरा, लोकनृत्य जैसे भांगड़ा, गरबा, भोजपुरी, सूफियाना शैली, फ्लेमिंगो डांस, जैज, सालसा का कथक फॉर्म सभी का समावेश होता है। लेकिन कपड़े उतारकर सिर्फ एक्रोबेट्स की तरह कलाबाजियां खाने को वे नृत्य नहीं मानती हैं।

इन्हें आजकल भारतीय चैनलों पर दिखाए जाने वाले डांस शोज, उनमें जज बन किसी प्रतिभागी की गरीबी पर रोते या छिछोरे-भद्दे मजाक कर नेशनल टीवी पर सिक्स एप्स का प्रदर्शन करने के लिए प्रतिभागी को उकसाते जज, झूठी वाहवाही करते भगवान से उन्हें ऊंचा स्थान देकर उनके पैरों पर गिरकर आशीर्वाद की भीख मांगते घड़ियाली आंसू बहाते, सेट पर झूठ-मूठ के प्यार के वादे करते, झूठी शादियां दिखाकर शादी जैसे पवित्र बंधन का खुलेआम मजाक बनाते, नृत्य के नाम पर महज छिछोला मनोरंजन परोसते भारतीय चैनलों को देखकर बेहद दु:ख होता है। वे आहत होती हुई कहती हैं कि क्यों क्या भारत में सभी को वेस्टर्न बनना है? यह झूठी चकाचौंध, यह दिखावे की चमक-दमक हमारी विरासत व संस्कृति को किस दिशा में लेकर जाएगी? मुझे दु:ख होता है, जब ऐसी प्रतियोगिताओं में शास्त्रीय नृत्य में वर्षों की तपस्या और मेहनत कर पहुंचे कलाकार 2 या 3 राउंड्स के बाद बाहर कर दिए जाते हैं?

'नवरंग' और 'नाचे मयूरी' जैसी फिल्में कला का बेजोड़ नमूना थीं और जिस तरह 'हैप्पी न्यू ईयर', 'एबीसीडी' जैसी फिल्मों में दिखाया जाता है कि जिस आसानी से वर्ल्ड चैंपियनशिप जीत जाते हैं, क्या असल जिंदगी में यह इतना आसान है? सालों लग जाते हैं कलाकार बनने में। बॉलीवुड डांस 4 हफ्ते में कोई भी सीखकर स्टेज पर नाच सकता है, परंतु शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा सीखकर कलाकार बनने में सालो-साल लग जाते हैं। भारत में बदलती इस मानसिक सोच के आने वाले समय में गंभीर परिणाम होंगे। हम अपनी मातृभूमि पर अपनी ही पहचान को ललकार रहे हैं, नकार रहे हैं। मैंने ये सारे शोज़ देखना बंद कर दिए हैं, क्योंकि मुझे दु:ख होता है। मेरा जीवन जिस कार्य, जिस संदेश को समर्पित है, भारत में इन कार्यक्रमों की रीत ठीक उसके विपरीत है।

एक अन्य कथक गुरु अश्विनी, जो भारतीय नृत्य से लेकर परंपरा, संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों, विरासत, कृष्ण-राधा के रिश्ते से लेकर मुग़ल-ब्रिटिश-भारतीय इतिहास, तुलसीदासजी की रामचरित मानस जैसे सभी गंभीर विषयों पर घंटों बात कर सकती हैं, जिनकी ज्ञान की सीमा अपार है, बेबाक सही को सही और गलत को गलत ठहराती हैं, वे अपना ही उदाहरण देती हैं कि उनके पति अफ्रीका में पले-बढ़े, जो मराठी भाषा बोल लेते हैं। बचपन में कुछ हिन्दी फिल्में माता-पिता ने दिखा दीं और इससे ज्यादा भारतीय संस्कृति के बारे में उन्हें कोई ज्ञान नहीं था और शादी हो गई एक शुद्ध भारतीय कथक गुरु से, थिएटर कलाकार से, जो ठेठ भारतीय संस्कृति से आत-प्रोत संस्कारों की प्रतिमूर्ति हैं।

दोनों के रहन-सहन, पहनावे, जीवनशैली में एक बड़ा फासला था लेकिन कुछ उनके माता-पिता के संस्कार उनके पति में ऐसे थे, जो आज उनके सबसे बड़े समर्थक, परम मित्र हैं और साथ पाकर अश्विनी एक सफल कथक गुरु हैं, जो अमेरिका में अनेक शिष्यों को कथक सिखा रही हैं। उनकी सबसे बड़ी सफलता कि वे अमेरिका से देश-विदेश में होने वाले अंतरराष्ट्रीय कला उत्सवों में कथक का प्रतिनिधित्व करती हैं, यह गौरव उन्हें मिला है।

गुरु अश्विनी का कहना है कि मैं रोज सुबह उठकर मंदिर में दीया नहीं जलाती, ज्यादा कर्म-कांड व पूजा-पाठ नहीं करती। मेरी सच्ची भक्ति है, जब मैं रोज सुबह उठकर 2 घंटे रियाज करती हूं। मुझे मेरे सामने कृष्णा, शिवा, मां दुर्गा, गणेशा साक्षात दिखते हैं। यही मेरी तपस्या है, जो मुझे ईश्वर से जोड़ती है। आज मैं जब मेहनत करती हूं तभी हक के साथ मैं अपने शिष्यों को मेहनत के लिए प्रेरित करती हूं।

उन्होंने कहा कि मेरे पास आने वाले अभिभावकों को मैं साफ शब्दों में कह देती हूं कि एक कथक कलाकार बनने में सालों की मेहनत और तपस्या लग जाती है, निखार तभी आता है और सोना कुंदन बनता है। यदि 2 साल में सोचो कि मेरी बेटी माधुरी दीक्षित जैसा डांस करने लगेगी, पार्टी में डांस कर वाहवाही बटोरेगी, तो क्षमा करना। मेरे शिष्य किसी भी पार्टी में हाथ में सोडा और मुंह में नॉनवेज ठूंसकर डांस के लटके-झटके वाली शोरभरी पार्टियों में नाच, लोगों का मनोरंजन नहीं करते। पं. जाकिर हुसैन का तबला हो या विशुद्ध भारतीय नृत्य उसका एक अलग सम्माननीय माहौल होता है।

वे आगे कहती हैं कि आजकल टीवी पर चल रहे डांस शोज कहीं भी भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करते, उल्टा अपमान करते हैं। जल्दी में मिली सफलता और झूठी चमक के पीछे सब भाग रहे हैं, लेकिन कला का असली संतोष व आनंद खो रहे हैं। जो जज शोज को जज करते हैं, उनकी शायद क्षमता इतने तक ही सीमित है। वे नृत्य के कोई महान जानकार नहीं हैं इसीलिए शो को और मनोरंजक बनाने और टीआरपी बढ़ाने के लिए डांस के अलावा बाकी ताम-झाम भी दिखाए जाते हैं, जो कि निंदनीय हैं। फिर भी मैं बहुत आशावादी हूं कि जहां आज मेरे पुणे स्थित शिक्षण संस्थान में मेरे समय में 4 लड़कियां नृत्य की शिक्षा लेती थीं, आज वहां कई सौ हैं। इसका मतलब है कि अभी अंधेरा फैला नहीं है, आशा की किरण बाकी है। कई ऐसे अभिभावक हैं, जो भारतीय नृत्य ही सिखाना चाह रहे हैं, यह संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।

डॉ. महा के अनुसार भारत में सामाजिक जीवन का सबसे सुलभ और आसान मनोरंजन का साधन मात्र टीवी और सिनेमा है। जो रात-दिन टीवी पर दिखाया जाता है आम जनता भी उसी का अनुसरण कर वैसा ही करना चाहती है। भारत में 60 के दशक से ही फिल्मों में पाश्चात्य का प्रभाव दिखाई देने लगा था तथा अब उसका प्रभाव जोरों पर है। कुछ समय में यह ग्राफ भी नीचे आ जाएगा और लोग स्वयं ही अपनी पहचान खोने के डर से अपनी विरासत की कद्र करेंगे या पहचान खो देंगे और अपनी पहचान के अवशेष विदेशों में ढूंढेंगे?

उन्होंने कहा कि लेकिन सबसे अच्छी बात है कि शायद मुंबई की जादू नगरी भूल भी जाए अपनी कला की विरासत, लेकिन दक्षिण भारत और भारत के कई राज्यों में सरकारें लोककला और नृत्य को बढ़ावा देने लगी हैं। कई लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं लोककला और नृत्य को बढ़ावा देने के लिए मनाए जाने वाले उत्सवों में। इसकी शुरुआत हमें स्वयं अपने ही घर से करनी होगी ताकि अपनी आने वाली पीढ़ी को, चाहे वो नृत्य हो, भाषा हो या भारतीय मूल्य, अपनी पहचान से अवगत कराना होगा।

गुरु राधिका का मानना है कि हमें हर नृत्य कला का सम्मान करना चाहिए। जिस संस्कृति का जो भी अच्छा पक्ष है, उसे अपनाना चाहिए। मेहनत नृत्य कला के हर क्षेत्र में करनी पड़ती है लेकिन शुरुआत घर से होनी चाहिए। पहले अपनी पहचान का सम्मान करना हम सीखें, तभी दूसरे हमारा सम्मान करेंगे। सिर्फ पाश्चात्य अनुसरण हमारे लिए घातक है। कई साल भारत के बाहर रहकर मैंने यह महसूस किया है कि अमेरिका की अपनी कोई सभ्यता, संस्कृति या विरासत है ही नहीं। यह देश कई संस्कृतियों व सभ्यताओं का मिला-जुला रूप है। सिर्फ 300 साल पुराना है यह देश। यहां के लोगों में संस्कृति की भूख है। वे बड़ी आसानी से हर किसी की कला, सभ्यता, संस्कृति, खान-पान, जो भी अच्छा है, उसे अपना लेते हैं। दूसरी ओर भारत की प्राचीन कला संपदा, संस्कृति और सभ्यता हजारों साल पुरानी मूल्यवान धरोहर है।

उन्होंने कहा कि भारत हजारों सालों से कला का क्षेत्र हो या ज्ञान-विज्ञान का, शिक्षा का या मानव मनोविज्ञान का, गणित हो या भाषा का- हर क्षेत्र में अग्रणी रहा है। हर क्षेत्र में संसार को सिखाने और प्रतिनिधित्व के लिए भारत के पास अथाह भंडार है। फिर क्यों आज हमारी सोच, हमारी कल्पनाएं, हमारी उड़ान अपनी कला भूल दूसरों से कला की भीख मांग रही है? क्या हमारा अपने आपसे भरोसा उठ चुका है? क्यों नहीं अपनी कला के साथ दूसरे की कला का भी सम्मान हो? कभी सोचा है कि भारत से निकली प्राचीन रथयात्रा की परंपरा का विश्व पर क्या असर है? भारत में मनाए जाने वाले त्योहार, महोत्सवों, जुलूस, मेले, सामूहिक नृत्य, अखाड़ा कला, मल्लयुद्ध व कई-कई कलाएं जिनकी गिनती बड़ी है, उन सांस्कृतिक धरोहरों का विश्व की संस्कृति पर कैसी छाप है? सदियों से कई सभ्यताओं ने उसे कैसे अपनाया है?
अंत में एक बार दिवाली के नाम पर भारतीय कम्युनिटी की हर साल मनाई जाने वाली दिवाली पार्टी पर परिवार की 3 पीढ़ियां एकसाथ शामिल हुईं। स्वागत द्वार पर लक्ष्मी और गणेशजी की मूर्तियों के साथ दीये, रंगोली सजी हुई थी और भीतर वहां शराब-मांसाहारी खाने और शबाब का भरपूर इंतजाम था। स्ट्रिप डांसर्स न के बराबर कपड़ों में कमर मटका-मटकाकर बेली डांस कर रही थीं। कई भारतीय उठे और डॉलर घुमा-घुमाकर उन डांसर्स पर फेंक रहे थे।

गंदे इशारे करतीं वे डांसर्स अब हवा में पैसे लहराते भारतीयों के पास जा-जाकर भद्दा नृत्य कर रही थीं और वे भारतीय उन डांसर्स की बिकिनी और कटी-फटी छोटी स्कर्ट में डॉलर ठूंस रहे थे। अब ये डांसर्स पहले से अधिक कमर मटका-मटकार डॉलर्स को फर्श पर गिरा उन पैसों पर नाच रही थीं और जोश में बेहोश कुछ भारतीय और अधिक पैसों की वर्षा कर उन डांसर्स को मालामाल कर रहे थे, खूब हंस रहे थे, पी रहे थे, उनके साथ नाच रहे थे। पार्टी में बाकी सभी उनकी जिंदादिली पर तालियां पीट रहे थे और इस तमाशे का विरोध किसी ने नहीं किया।

यह एक सामाजिक पारिवारिक दिवाली पार्टी थी लेकिन वह उद्देश्य कहां पूरा होता है? आने वाले वर्षों में यह एक परंपरा बन गई। किंतु एक विरोधी स्वर एक मां के कानों में पड़ा कि मां, इसी पार्टी के लिए मुझे कॉलेज से यहां बुलाया गया? व्हॉट इस धिस? वो स्वर मां के कानों तक न रहकर मां के दिल तक गया और उस दिन से परिवार दिवाली की पार्टी में नहीं जाता है।

लॉस वेगास में कभी जाकर मजा कर आना एक बात है लेकिन लॉस वेगास के कल्चर को रोजमर्रा के जीवन जीने की शैली का कल्चर तो नहीं बनाया जा सकता है न? समय रहते भारत को संभालना और सचेत होना जरूरी है विश्व में अपनी गर्वित छबि और पहचान को बनाए रखने के लिए।

मैं प्रवासी भारतीय जरूर हूं लेकिन 4 जुलाई को हाथ में अमेरिकी झंडा और 15 अगस्त को हाथ में भारतीय तिरंगा जरूर लहराता है। भारत से हम जुदा होकर भी जुड़े ही रहेंगे और बेबाक अपनी राय देंगे।

साभार- आत्माराम शर्मा (गर्भनाल)






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