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सुशांत के पास ‘चांद’ पर प्‍लॉट था, लेकिन ‘मन’ की एक गली खाली थी

Updated: मंगलवार, 16 जून 2020 (17:09 IST)
बहुत सारी शोहरत, कामयाबी, रुपहले पर्दे की चकाचौंध और मल्‍टीप्‍लेक्‍स स्‍क्रीन में गूंजती हुई ताल‍ियों के बीच भी सुशांत स‍िंह अकेले थे। इतना सबकुछ होना भी उनके अवसाद को रोकने की गारंटी नहीं बन सका।

वो स‍ि‍तारों के दीवाने थे। आसमान के रहस्‍य को जानना चाहते थे। स्‍पेस में चमकते तारों और ग्रहों को देखने के ल‍िए उनके पास टेल‍िस्‍कोप था। यहां तक क‍ि चांद पर प्‍लाट खरीद ल‍िया था।

इतना सबकुछ। मुंबई आने से पहले उनके पास यह सब नहीं था। उन्‍हें इतना कुछ म‍िला था। यानी पहले ज‍िसके पास कुछ नहीं था उसे यह सब म‍िल जाए तो उसे सतुंष्‍ट होना चाह‍िए, क्‍योंक‍ि उन्‍होंने पाया ही पाया था। तो फ‍िर उनकी आत्‍महत्‍या का कारण क्‍या था। इस पर कई एजेंस‍ियां जांच में लगी हैं।

दरअसल इसी वजह से उनकी मौत का रहस्‍य और ज्‍यादा गहराता भी जा रहा है। लेक‍िन आमतौर पर मनुष्‍य के मन में एक कोना होता है जो इन सब चीजों से नहीं भरता। मन की एक अनजान गली, जीवन की एक अजनबी सुरंग। जहां हर कोई नहीं पहुंचता। जो पहुंच जाता है वो उसी खाली मन पर राज करता है। शायद कई बार प्रेम ऐसी खाली गल‍ियों को भर देता है। पूरा कर देता है। इन खाली जगहों में जब दो लोग म‍िलकर चलते हैं तो ज‍िंदगी की सफर तय हो जाता है, पूरा हो जाता है।

लेक‍िन इन सब के बावजूद सुशांत शायद क‍िसी आम आदमी की तरह अकेले थे। क्‍या ये संभव नहीं है क‍ि धरती पर उन्‍हें देखने वाला कोई नहीं म‍िला इसील‍िए वो आसमान में चांद स‍ितारों की कंपनी करते थे।

अकेलेपन और अवसाद से न‍िजात के ल‍िए आदमी अपनी प्रवृत‍ि के मुताबि‍क कई तरह की चीजों का सहारा लेता है। कोई धर्म और आध्‍यात्‍म की तरफ जाता है तो कोई योग या मनोरंजन की तरफ। कोई यात्राओं की तरफ।

अपनी पूर्णता की खोज के ल‍िए तरह तरह के जतन करता है। कई बार वो ऐसा कर के अपने अवसाद और अकेलेपन से बाहर न‍िकलने में कामयाब भी हो जाता है। या कम से कम उसके साथ रहने के ल‍िए उससे क‍िसी न क‍िसी तरह का ‘कॉन्‍ट्रैक्‍ट’ कर लेता है।

लेक‍िन सुशांत के मामले में यह दुखद रहा क‍ि उन्‍हें चांद स‍ितारों का यह साथ भी रास नहीं आया। उनके मन की खाली गली जमीन पर और आसमान दोनों जगह खाली ही रही।

शायद… इसी‍ल‍िए उन्‍होंने यह दोनों जगहें छोड़ दी। जमीन भी और आसमान भी। …और चले गए उस अज्ञात दुन‍िया में जहां शायद कुछ भी नहीं होता है। जमीन भी नहीं और आसमान भी नहीं।

(नोट: इस लेख में व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक की न‍िजी अभिव्‍यक्‍त‍ि है। वेबदुन‍िया का इससे कोई संबंध नहीं है।
लेखक के बारे में
नवीन रांगियाल
नवीन रांगियाल DAVV Indore से जर्नलिज्‍म में मास्‍टर हैं। वे इंदौर, भोपाल, मुंबई, नागपुर और देवास आदि शहरों में दैनिक भास्‍कर, नईदुनिया, लोकमत और प्रजातंत्र जैसे राष्‍ट्रीय अखबारों में काम कर चुके हैं। करीब 15 साल प्रिंट मीडिया में काम करते हुए उन्‍हें फिल्‍ड रिपोर्टिंग का अच्‍छा-खासा अनुभव है। उन्‍होंने अखबार.... और पढ़ें

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