डॉक्टरों की हड़ताल के बीच बंगाल में भाषा पर बवाल, वोट बैंक के लिए ममता ने चला 'बांग्ला' अस्मिता का कार्ड

विकास सिंह| पुनः संशोधित शनिवार, 15 जून 2019 (11:55 IST)
लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर पश्चिम बंगाल में भाषा को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। चुनाव के दौरान उसके बाद भी जय श्रीराम के नारे को लेकर गरमाने वाली बंगाल की सियासत में एक बार फिर हिंदी भाषी ममता के निशाने पर आ गए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नए बयान कि ‘बंगाल में रहना है तो बांग्ला बोलना होगा’ से नया सियासी बवाल खड़ा हो गया है।
ममता के इस बयान को बंगाल की सियासत के जानकर नया नहीं मानते हैं। बांग्ला अस्मिता के नारे के सहारे अपनी सियासी रोटियां सेंकने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इससे पहले भी हिंदी भाषियों के खिलाफ कई तीखे बयान दे चुकी हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय ममता ने हिंदी भाषियों को राज्य में अतिथि बताया था, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिला था।

बांग्ला बोलने का बयान हताशा से उपजी प्रतिक्रिया : लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जय श्रीराम के नारे के साथ बंगाल में जो ध्रुवीकरण कार्ड खेला वह खूब सफल भी हुआ और भाजपा 2 सीटों से बढ़कर 18 सीटों तक पहुंच गई। इसके साथ ही भाजपा का वोट प्रतिशत भी करीब 23 फीसदी बढ़कर 40 फीसदी तक पहुंच गया। भाजपा की इस सफलता को देखकर ममता को अब अपनी रणनीति नए सिरे से बनाने पर मजबूर होना पड़ा है।
कोलकाता में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी यूनिवर्सिटी वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी और राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर सुनील कुमार ‘सुमन’ कहते हैं कि शुरू में हिंदी और हिंदी भाषियों के विरोध के सहारे अपनी राजनीति आगे बढ़ाने वाली ममता का यह बयान एक तरह से उनकी हताशा से उपजी प्रतिक्रिया है। डॉक्टर सुनील कुमार कहते हैं कि लोकसभा चुनाव नतीजों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि हिंदी भाषी लोग जो करीब एक-डेढ़ साल पहले तक ममता के साथ होते हुए उनका मजबूत वोट बैंक होते थे अब अपना रुख भाजपा की ओर कर लिया है।
ऐसे में जो ममता कुछ दिनों पहले तक हिंदी भाषियों के प्रति नरम रुख अपना रही थीं अब हताशा के चलते अपनी रणनीति बदलने को मजूबर हुई हैं। डॉक्टर सुनील कहते हैं कि बंगाल में अपनी सियासी जड़ें जमाने के लिए शुरू में हिंदी विरोध का स्वर अपनाने वाली ममता को जब बाद के वर्षों में लगा कि हिंदी वोट बैंक को इग्नोर कर राजनीति में ज्यादा दिन नहीं टिक पाएंगी तो उन्होंने हिंदी के प्रति नरमी दिखाते हुए हिंदी कॉलेज और हिंदी यूनिवर्सिटी खोलने जैसे बड़े निर्णय लिए, लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में हिंदी भाषी लोगों ने जिस तरह खुलकर भाजपा का साथ दिया है, ऐसे में ममता का ताजा बयान एक स्वाभाविक आक्रोश है।
ममता को लगता है कि हिंदी को इतना बढ़ावा देने के बाद भी जब हिंदी भाषी लोग भाजपा में शिफ्ट हो गए तो उनकी हिंदी को लेकर पुरानी दूरी एक बार फिर दिखने लगी है। डॉक्टर सुनील कुमार कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि ममता जितना अधिक हिंदी भाषियों के खिलाफ कट्टरता दिखाएंगी उतना ही भाजपा को फायदा मिलता जाएगा। ममता इस बयान के जरिए एक बार फिर बांग्ला अस्मिता को उठाकर उस बांग्ला वोट बैंक को वापस पाने की जद्दोजहद में लगी हैं जो बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ चला गया है।




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