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वैज्ञानिकों ने विकसित किया मस्तिष्क की नकल करने वाला कृत्रिम सिनैप्टिक नेटवर्क

Updated: शुक्रवार, 4 जून 2021 (13:49 IST)
नई दिल्ली, मस्तिष्क हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, जो हमारे शरीर को नियंत्रण में रखता है। हाल ही में, भारतीय वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से एक ऐसा उपकरण विकसित किया है, जो मानव मस्तिष्क की क्रियाओं की नकल करने में सक्षम है।

वैज्ञानिकों ने जो उपकरण बनाया है, वह मानव मस्तिष्क की ज्ञान से संबंधित क्रियाओं की नकल कर सकता है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित यह एक न्यूरोमॉर्फिक उपकरण है, जो मस्तिष्क से कुशल कंप्यूटिंग क्षमता प्राप्त कर मानव मस्तिष्क के ढांचे की नकल कर सकता है।

वैज्ञानिक लंबे समय से एक ऐसा उपकरण विकसित करने का प्रयास कर रहे थे, जो बाहरी सपोर्टिंग (सीएमओएस) सर्किट की सहायता के बिना जटिल मनोवैज्ञानिक व्यवहारों की नकल करने में सक्षम हो। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत कार्यरत स्वायत्त संस्था जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने एक सरल स्व-निर्माण विधि के माध्यम से जैविक तंत्रिका नेटवर्क जैसा एक कृत्रिम सिनैप्टिक नेटवर्क (एएसएन) बनाने का तरीका खोज निकाला है।

इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने सिल्वर धातु को शाखा युक्त द्वीपों और नैनो कणों को नैनोगैप पृथक्कीकरण के साथ जैव-न्यूरॉन्स और न्यूरोट्रांसमीटर के समान बनाने के लिए तैयार किया है, जहां गोलाकार कणों में फिल्म के टूटने की प्रक्रिया निरंतर होती है। ऐसे आर्किटेक्चर के साथ उच्च किस्म की अनेक ज्ञानात्मक गतिविधियों का अनुकरण किया जाता है। फैब्रिकेटेड कृत्रिम सिनैप्टिक नेटवर्क (एएसएन) में सिल्वर एग्लोमेरेट्स नेटवर्क शामिल हैं, जो अलग-अलग नैनो कणों से भरे नैनोगैप्स द्वारा पृथक किया गया है। उन्होंने पाया कि उच्च तापमान पर सिल्वर फिल्म को गीला करने से जैव-तंत्रिका नेटवर्क से मिलते-जुलते नैनोगैप्स द्वारा अलग किए गए द्वीप संरचनाओं का निर्माण होता है।

प्रोग्राम किए गए विद्युत संकेतों का एक रियल वर्ल्ड स्टिमुलस के रूप में उपयोग करते हुए इस वर्गीकृत संरचना ने सीखने की विभिन्न गतिविधियों जैसे कि अल्पकालिक स्मृति (एसटीएम), दीर्घकालिक स्मृति (एलटीएम), क्षमता, अवसाद, सहयोगी शिक्षा, रुचि-आधारित शिक्षा, पर्यवेक्षण का अनुकरण किया गया। सिनैप्टिक थकान और इसमें होने वाले आत्म-सुधार की भी नकल की गई।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा है कि प्रकृति के पास विकास के माध्यम से नये रूपों और कार्यों को करने के लिए असाधारण समय और विविधता है। प्रकृति और जीव विज्ञान से नई प्रक्रियाओं, प्रौद्योगिकियों, सामग्रियों और उपकरणों को सीखना और अनुकरण करना भविष्य की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है, जो मानव निर्मित प्रौद्योगिकियों के साथ जीवन से भरी दुनिया को तेजी से एकीकृत करेंगे।
जेएनसीएएसआर टीम की यह उपलब्धि हाल ही में ‘मेटिरियल्स होराइजन्स’ शोध पत्रिका में प्रकाशित की गई है। (इंडिया साइंस वायर)

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