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भाजपा के उभार के दौर में क्यों कम हुए मुस्लिम विधायक? क्या कहते हैं देशभर की विधानसभाओं के आंकड़े
-विचार-विमर्श
Muslim representation in Indian politics: भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में प्रतिनिधित्व केवल चुनावी जीत-हार का प्रश्न नहीं होता, बल्कि यह इस बात का भी संकेत होता है कि सत्ता संरचना में कौन-से सामाजिक समूह कितनी भागीदारी रखते हैं। पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में भाजपा का प्रभाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसने न केवल सत्ता संतुलन बदला है बल्कि राज्य विधानसभाओं की सामाजिक संरचना पर भी गहरा असर डाला है।
इसी बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम प्रतिनिधित्व में आई गिरावट है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की विभिन्न विधानसभाओं में मुस्लिम विधायकों की संख्या 2013 के लगभग 339 से घटकर अब करीब 282 रह गई है। यह गिरावट ऐसे समय में हुई है जब भारत की मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 14% से अधिक हिस्सा है।
बड़े राज्यों में सबसे अधिक गिरावट : मुस्लिम विधायकों की संख्या में सबसे अधिक कमी उन राज्यों में दर्ज की गई है जहां मुस्लिम आबादी भी उल्लेखनीय है।
उत्तर प्रदेश : आबादी 19%, प्रतिनिधित्व 8% से कम
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम विधायकों की संख्या 63 से घटकर 31 रह गई है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 19% मानी जाती है, लेकिन विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व अब 8% से भी कम रह गया है।
यह बदलाव केवल संख्या का नहीं, बल्कि राज्य की चुनावी राजनीति के पुनर्गठन का संकेत भी है। 2014 के बाद भाजपा ने हिंदुत्व, कल्याणकारी योजनाओं और गैर-यादव OBC राजनीति के संयोजन के जरिए ऐसा सामाजिक गठबंधन तैयार किया जिसने पारंपरिक मुस्लिम-आधारित विपक्षी राजनीति को कमजोर किया।
पश्चिम बंगाल : मुस्लिम वोट, लेकिन घटता प्रतिनिधित्व
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम विधायकों की संख्या 59 से घटकर 37 हो गई है। जबकि राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 27% है, विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी करीब 12.6% ही रह गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसका एक कारण चुनावों का अत्यधिक ध्रुवीकरण भी है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई ने उम्मीदवार चयन की रणनीतियों को प्रभावित किया, जहां कई सीटों पर 'विजयी सामाजिक समीकरण' को प्राथमिकता दी गई।
बिहार और राजस्थान में भी गिरावट
बिहार में मुस्लिम विधायकों की संख्या 19 से घटकर 11 हो गई है। राज्य की मुस्लिम आबादी लगभग 17% है, लेकिन प्रतिनिधित्व महज़ 4.5% के आसपास सिमट गया है। वहीं राजस्थान में मुस्लिम विधायकों की संख्या 11 से घटकर 6 रह गई है।
असम, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी असमानता
असम में मुसलमान आबादी का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा हैं, लेकिन विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी लगभग 17% है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी मुस्लिम विधायक कुल सदन का लगभग 3-4% ही हैं, जबकि उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी 10% से अधिक है।
विशेष रूप से कर्नाटक में, जहां कभी कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) के जरिए मुस्लिम नेतृत्व को राजनीतिक स्पेस मिलता था, वहां भी संख्या 11 से घटकर 9 रह गई है।
गुजरात और छत्तीसगढ़ का संकेत
गुजरात में मुस्लिम विधायकों की संख्या दो से घटकर एक रह गई है। जबकि छत्तीसगढ़ में वर्तमान विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, गोवा, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड और सिक्किम जैसे राज्यों में भी कोई मुस्लिम विधायक नहीं है। हालांकि इन राज्यों में मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है, लेकिन यह तथ्य राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व के असंतुलन को और स्पष्ट करता है।
कुछ राज्यों में मामूली सुधार
हालांकि तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। तमिलनाडु में मुस्लिम विधायकों की संख्या 8 से बढ़कर 9 हुई है। दिसंबर 2023 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में केवल दो मुस्लिम विधायक चुने गए थे और मेघालय में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं जम्मू और कश्मीर अब भी मुस्लिम विधायकों की संख्या के लिहाज से सबसे आगे है, हालांकि यहां भी संख्या 58 से घटकर 51 हो गई है।
मुस्लिम विधायकों को सबसे अधिक टिकट कौन देता है?
वर्तमान में सबसे अधिक मुस्लिम विधायक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पास हैं, जिनकी संख्या 61 है। इसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के 39 विधायक हैं। तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के पास 34-34 मुस्लिम विधायक हैं।
दिलचस्प तथ्य यह है कि भाजपा के पास भी दो मुस्लिम विधायक हैं— अचब उद्दीन और तफज्जल हुसैन। इसके अलावा उत्तरप्रदेश के विधान परिषद सदस्य दानिश आज़ाद अंसारी उप्र केबिनेट के एकमात्र मुस्लिम मंत्री हैं। वे राज्यमंत्री के रूप में अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज विभाग संभालते हैं।
क्या यह केवल भाजपा के उभार का परिणाम है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व में गिरावट को केवल भाजपा की चुनावी सफलता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं:
- चुनावों का बढ़ता ध्रुवीकरण
- विपक्षी दलों द्वारा 'विनिंग कैन्डिडेट' पर अधिक जोर
- मुस्लिम उम्मीदवारों को सीमित सीटों तक समेटना
- क्षेत्रीय दलों का कमजोर होना
- बहुसंख्यक सामाजिक गठबंधनों का विस्तार
इसके अलावा, भारत की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) चुनाव प्रणाली भी छोटे या बिखरे हुए सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व को सीमित कर देती है।
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?
लोकतंत्र केवल बहुमत की सरकार नहीं, बल्कि विविध समाजों की साझी भागीदारी की व्यवस्था भी है। किसी समुदाय की राजनीतिक उपस्थिति घटने का असर केवल विधानसभा की संख्या तक सीमित नहीं रहता, इसका प्रभाव नीति-निर्माण, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक विश्वास पर भी पड़ता है।
भारत की राजनीति में आने वाले वर्षों में यह बहस और तेज हो सकती है कि क्या चुनावी जीत ही पर्याप्त है, या फिर लोकतंत्र की गुणवत्ता का आकलन सामाजिक प्रतिनिधित्व से भी किया जाना चाहिए।
