मस्तिष्क आघात के इलाज में जागी उम्मीद

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा|
भारतीय अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार चूहों में आघात के बाद क्षतिग्रस्त हो चुके मस्तिष्क के इलाज में स्टेम कोशिकाओं का सफलतापूर्वक इस्तेमाल करने का दावा किया है।

इसके साथ ही के उन मरीजों के इलाज के लिए नई उम्मीद जगी है जो इसकी वजह से स्थायी पक्षाघात, विकलांगता से पीड़ित हैं और दूसरों पर निर्भर हैं।

पीजीआई चंडीगढ़ के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख एस. प्रभाकर ने बताया कि हमने पहले स्टेम कोशिकाओं को विकसित किया। फिर उन्हें मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्से में इंजेक्शन के जरिये पहुँचाया। हमने पाया कि क्षतिग्रस्त हिस्से में नई मस्तिष्क कोशिकाएँ विकसित होने लगीं और इससे कोई दुष्प्रभाव भी नहीं हुए।
उन्होंने बताया कि यह पहला अवसर है जब वहाँ डाली गई कोशिकाओं और पहले से मौजूद कोशिकाओं के बीच तालमेल काम कर गया।

प्रभाकर के अनुसार देशभर में एम्स सहित पाँच केंद्र मस्तिष्क आघात के बाद के दुष्प्रभावों का इलाज स्टेम कोशिकाओं से करने के बारे में अध्ययनरत हैं।

मस्तिष्क आघात तब होता है जब मस्तिष्क को ऑक्सीजन और आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति करने वाली रक्त वाहिनी थक्के या किसी अन्य कारण से अवरुद्ध हो जाती है और मस्तिष्क को पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिल पाती।
एम्स की एक न्यूरोलॉजिस्ट एमवी पद्मा ने बताया कि थोड़ी देर के लिए ही सही, ऑक्सीजन से वंचित होने पर मस्तिष्क कोशिकाएँ मरने लगती हैं। ऐसा होने पर मस्तिष्क का वह हिस्सा प्रभावित होता है जो शरीर पर नियंत्रण रखता है तो पक्षाघात हो जाता है। इस अध्ययन के लिए मानवीय परीक्षण इसी माह शुरू होगा।

प्रभाकर ने बताया कि जनवरी से मानव पर इस अध्ययन के संदर्भ में परीक्षण शुरू किया जाएगा। हम चाहते थे कि एक बार स्टेम कोशिकाओं को इंजेक्शन के जरिये अंदर प्रविष्ट कराया जाए तो यह क्षतिग्रस्त हिस्से में पहुँचें और नई कोशिकाएँ बनाना शुरू कर दें। ऐसा हो भी गया।
मस्तिष्क आघात दो प्रकार का होता है- पहले प्रकार में रक्त वाहिनियों के खून के थक्के से अवरुद्ध होने के कारण मस्तिष्क में धमनियाँ भी अवरुद्ध हो जाती हैं। दूसरे प्रकार में रक्त वाहिनियाँ फट जाती हैं जिससे रक्तस्राव होने लगता है। इसे हैमरेजिक स्ट्रोक भी कहा जाता है।

प्रभाकर ने बताया कि हृदयाघात की तुलना में मस्तिष्क आघात के बारे में जागरूकता कम है।



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