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जब दिलेरी पर भारी पड़ी ममता

Updated: मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026 (21:13 IST)
एक महिला अपनी संतान के लिए कुछ भी कर सकती है। वह अपनी जान की परवाह किए बिना किसी भी हिंसक जानवर से भिड़ सकती है। ऐसी खबरें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। पर इसका उलटा भी होता है—दिलेर से दिलेर महिला का साहस उस समय जवाब दे देता है, जब बात उसकी संतान की सुरक्षा की आती है। यह ममता की साहस पर जीत की कहानी है।
 
यह कहानी मेरी अम्मा की है। बात 1954 की है। संयुक्त परिवार था। घर में शादी का आयोजन था। रिश्ते की करीब 16 महिलाएं घर में मौजूद थीं। स्वाभाविक है कि सब अपने गहनों और महंगे कपड़ों के साथ आई थीं। गर्मी की अंधेरी रात थी। अचानक घर पर डाकुओं ने धावा बोल दिया। पुरुष जान बचाकर शोर मचाते हुए भाग गए, पर महिलाओं के पास दो ही विकल्प थे—या तो मुकाबला करें या डकैतों की मर्जी के 
 
अनुसार मुख्य दरवाजा खोलकर आत्मसमर्पण कर दें। डकैतों को भी यही उम्मीद थी, इसलिए वे मुख्य दरवाजे पर पहुंचकर डराने-धमकाने और जबरदस्ती दरवाजा खुलवाने का दबाव बनाने लगे। मायके की ओर से अम्मा दबंग परिवार की थीं। उनकी अगुआई में महिलाओं ने मोर्चा लेने का फैसला किया। डकैतों का शोर सुनते 
 
ही महिलाओं ने मुख्य दरवाजे से सटाकर अनाज के बोरों की दीवार बना दी। दरवाजा पहले से मजबूत था, ऊपर से नीचे तक सहारा पाकर और मजबूत हो गया। डकैतों को महिलाओं के ऐसे प्रतिरोध की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने दरवाजा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। महिलाएं पूरी ताकत से 
 
दरवाजे को थामे रहीं। उन्हें उम्मीद थी कि देर होने पर गांव या पड़ोस से मदद मिल जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ। देरी से डकैतों का धैर्य भी टूटने लगा। 16 महिलाओं के बीच कच्चे घर के खपड़े से आंगन में कूदना जोखिम भरा था, फिर भी एक डकैत ने यह जोखिम उठाया। वह दीवार के सहारे आंगन में कूद गया।
 
16 महिला एक डकैत, पर ममता ने हाथ बांध दिए : अम्मा बताती थीं—हम चाहतीं तो उसे मूसल या सिलबट्टे से कूट कर चटनी बना सकती थीं, गड़ासे या कुल्हाड़ी से काट सकती थीं। एक पल को मन में आया भी। पर गोद के बच्चे के साथ डकैतों की संभावित प्रतिक्रिया सोचकर हमने आत्मसमर्पण कर दिया।
 
जिसकी ममता का नाते साहस जवाब दे गया उसकी भी असमय मौत : जिस मासूम की ममता के आगे साहस हार गया, उसका नाम था—रविंद्र। पांच साल की उम्र में निमोनिया से उसकी मृत्यु हो गई। यह वह उम्र होती है जब माता पिता बच्चों को लेकर सपना देखने लगते हैं। यकीनन अम्मा और बाबूजी ने भी देखा होगा। पर होनी को कौन डाल सकता। शायद भगवान की यही मर्जी थी। वह होते तो हम तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े होते।
 
अम्मा इस घटना को सुनाते-सुनाते खो जाती थीं। बताती थीं—उनके बाल घुंघराले थे, रंग गोरा था और दिमाग उम्र से कहीं ज्यादा तेज। उनकी कोई तस्वीर नहीं थी, इसलिए हम कल्पना में ही उनकी एक छवि बना लेते थे।
लेखक के बारे में
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। .... और पढ़ें

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