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चहक रहा है चूल्हा

Updated: गुरुवार, 19 मार्च 2026 (20:41 IST)
सिलेंडर की कमी के चलते इन दिनों चूल्हा फिर चर्चा में है। वर्षों बाद इस कदर चर्चा में आने से चूल्हा चहक रहा है। तो आइए, हम भी चूल्हे के बारे में कुछ बातें कर लेते हैं।
 
चूल्हा आमतौर पर दो तरह का होता था। पहला दो खाने का, जिसमें दोनों ओर खाना पकाया जा सकता था। दूसरा एक खाने का, जिसमें एक ही तरफ बर्तन चढ़ता था। जब चूल्हे पर खाना बनता था तो घरों में अक्सर कई चूल्हे होते थे। किसी पर दाल-रोटी बनती थी, तो कोई भुजिया या सब्जी के काम आता था।
 
घर में शादी-ब्याह के मौके पर हलवाई या भंडारी तो जमीन खोदकर, ईंटों के सहारे अपना खास चूल्हा तैयार करते थे। वही असली अस्थायी किचन होता था।
 
चूल्हे और चइले (सूखी लकड़ी) का रिश्ता भी बड़ा खास होता था। चइले की आंच सबसे तेज और टिकाऊ मानी जाती थी। बाकी मौसम और उपलब्धता के हिसाब से उसमें रैंठा, चिपरी और गोइठा भी डाले जाते थे। चूल्हा बनाना और चूल्हा जलाना अपने आप में एक कला थी। घर की नई बहू का चूल्हे का काम संभालना एक उस घर के लिए बड़ा अवसर होता था।
 
चूल्हा जलाने में फुकनी बड़ी मददगार होती थी। यह न हो तो फूंक मारते-मारते आंखें लाल हो जाती थीं और चूल्हे के मुंह तक झुकते-झुकते कमर भी टेढ़ी हो जाती थी। चूल्हा धीरे-धीरे गरम होता था और धीरे-धीरे ठंडा पड़ता था — बिल्कुल पुराने जमाने के रिश्तों की तरह। अब जब चूल्हा चर्चा में है, तो इससे जुड़े कुछ मुहावरे भी शायद फिर याद आ जाएं। जैसे — चूल्हे में डालना, चूल्हा पोतना, चूल्हे में डालकर झोंस देना।
 
ये सब दरअसल गालियां ही थीं। फर्क बस इतना था कि ये प्यार में भी दी जाती थीं और गुस्से में भी। चूल्हे का बुझना या ठंडा पड़ना घर में अभाव या किसी बड़े शोक का संकेत माना जाता था। ऐसे समय कई घरों का चूल्हा दिनों-दिन तक नहीं जलता था।
और चूल्हे का अलग होना यानी घर में बंटवारा हो जाना। वहीं चूल्हा-चौका संभालना मतलब पूरे घर की जिम्मेदारी संभालना।
 
महिलाओं को कभी अपने इस हुनर पर बड़ा गुमान रहता था, तभी तो कभी परदेश गए पति पर किसी द्वारा किया गया यह तंज (जाई परदेश मजा लूटत होइहें, चुतर उठाई चूल्हा फूंकत होइहें) बड़ा लोकप्रिय था। पर अब वो जमाना नहीं रहा। बराबरी का दौर है। परदेश में हो घर अगर साथ हैं तो बीबी के साथ चूल्हा फूंकना ही होगा।
 
वैसे सिलेंडर की कमी हो तो खाने के कई आसान विकल्प भी हैं — भूजा, भेली, सतुआ, फल-फूल, दूध, दही, पानी, शरबत आदि।  और नवरात्र में नौ दिन का व्रत रख लिया जाए तो पुण्य भी मिलेगा और शरीर का शुद्धिकरण भी। अगर मां दुर्गा खुश हो गईं तो संभव है आपकी ही नहीं, पूरे देश-दुनिया का भला हो जाए। और अगर मां की इस कृपा को हम ठीक से प्रचार-प्रसार और प्रोपेगंडा के जरिए भुना ले गए, तो जो विश्व गुरु का दर्जा थोड़ा डगमगा रहा था, वह भी फिर से मुकम्मल हो जाएगा।
 
बावजूद इसके अगर सिलेंडर की समस्या का समाधान न हो तो घबराइए मत…। अपने इतिहास को याद रखिए। उससे सबक लीजिए। देश के इतिहास में चूल्हे ने ही सबसे ज्यादा पीढ़ियों को जिंदा रखा है, गैस ने नहीं। गैस कभी पकड़ने की चीज नहीं छोड़ने की चीज रही है। चाहे ऊपर से छोड़ें या नीचे से। अधिक हो जाने पर यह बहुत बड़ा और आम रोग भी है। सिर्फ बड़ा ही नहीं, खतरनाक भी। क्योंकि कभी कभी यह सर पर चढ़कर भयंकर सरदर्द की भी वजह बनती है। कभी कभी गंभीर रोगों का लक्षण भी। अब रोग पालना अच्छी बात तो नहीं? फिलहाल मेरे दिमाग में चूल्हे के बारे में इतना ही आया। दिमाग पेट्रोल, डीजल के आसन्न संकट के समाधान पर लगा है।
लेखक के बारे में
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। .... और पढ़ें

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