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छत्तीसगढ़ मॉडल से पराली देगी खासी कमाई

Updated: मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020 (16:46 IST)
पराली को लेकर आधे अक्टूबर से दिसंबर और जनवरी के शुरू तक बेहद हो हल्ला होता है। व्यापक स्तर पर चिन्ता की जाती है, किसानों पर दण्ड की कार्रवाई की जाती है। बावजूद इसके समस्या जस की तस रही आती है।
सच तो यह है कि जिस पराली को बोझ समझा जाता है वह बहुत बड़ा वरदान है। अच्छी खासी कमाई का जरिया भी बन सकती है बशर्ते उसकी खूबियों को समझना होगा।

लेकिन कहते हैं न हीरा तब तक पत्थर ही समझा जाता है जब तक कि उसे तराशा न जाए। पराली के भी ऐसे ही अनेकों फायदे हैं। न केवल उन्हीं खेतों के लिए यह वरदान भी हो सकती है बल्कि पशुओं के लिए तो सनातन से खुराक ही है। इसके अलावा पराली के वो संभावित उपयोग हो सकते हैं जिससे देश में एक नया और बड़ा भारी उद्योग भी खड़ा हो सकता है जिसकी शुरुआत हो चुकी है। इसके लिए जरूरत है सरकारों, जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, किसानों और बाजार के बीच जल्द से जल्द समन्वय की और खेतों में ठूठ के रूप में जलाकर नष्ट की जाने वाली पराली जिसे अलग-अलग रूप और नाम में पुआल, नरवारी, पैरा और भूसा भी कहते हैं जो सोने की कीमतों जैसे उछाल मारेगी।

बस इसी का इंतजार है जब पराली समस्या नहीं वरदान बन जाएगी। देखते ही देखते भारत में एक बड़ा बाजार और उद्योग का रूप लेगा। वह दिन दूर नहीं जिस पराली के धुएं ने न जाने कितने छोटे बड़े शहरों को गैस चेम्बर में तब्दील कर दिया है वह ढ़ूढ़ने से भी नहीं मिलेगी और उसका धुएं तो छोड़िए, उस गंध को भी लोग भूल चुके होंगे।

अब वह दौर है जब हर वेस्ट यानी अपशिष्ट समझे जाने वाले पदार्थों का किसी न किसी रूप में उपयोग किया जाने लगा है। चाहे वह प्लास्टिक कचरा हो, कागजों और पैकिंग कार्टून्स की रद्दी हो, स्टील, तांबा, यहां तक की रबर भी। सब कुछ रिसाइकल होने लगा है। बड़े शहरों में सूखा कचरा और गीला कचरा प्रबंधन कर उपयोगी खाद बनने लगी है जिसमें सब्जी, भाजी के छिलके भी उपयोग होते हैं। ऐसे में पराली का जलाया जाना अपने आप में बड़ा सवाल भी है और नादानी भी।

देश में कई गांवों में महिलाएं पराली से चटाई और बिठाई (छोटा टेबल, मोढ़ा) जैसी वस्तुएं बनाती हैं। अभी भोपाल स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी सीएसआइआर और एडवांस मटेरियल्स एंड प्रोसेस रिसर्च यानी एम्प्री ने तीन साल की कोशिशों के बाद एक तकनीक विकसित की है जिसमें धान की पराली, गेहूं व सोयाबीन के भूसे से प्लाई बनेगी।

इसमें 30 प्रतिशत पॉलीमर यानी रासायनिक पदार्थ और 70 प्रतिशत पराली होगी। इसके लिए पहला लाइसेंस भी छत्तीसगढ़ के भिलाई की एक कंपनी को दे दिया गया है जिससे 10 करोड़ की लागत से तैयार कारखाना मार्च 2021 से उत्पादन शुरू कर देगा। सबसे बड़ी खासियत यह कि देश में यह इस किस्म की पहली तकनीक है जिसे यूएसए, कनाडा, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन समेत आठ देशों से पेटेंट मिल चुका है।

इस तरह खेती के अपशिष्ट से बनने वाली यह प्लाई आज बाजार में उपलब्‍ध सभी प्लाई से न केवल चार गुना ज्यादा मजबूत होगी बल्कि सस्ती भी. पराली से लेमिनेटेड और गैर लेमिनेटेड दोनों तरह की प्लाई बनेंगी जिसकी कीमत गुणवत्ता के हिसाब से 26 से 46 रुपए वर्गफीट तक होगी। निश्चित रूप से सस्ती भी होगी और टिकाऊ भी। इसकी बड़ी खूबी यह कि 20 साल तक इसमें कोई खराबी नहीं आएगी। जरूरत के हिसाब से इसे हल्की व मजबूत दोनों तरह से बनाया जा सकेगा।

इसके लिए बहुत ज्यादा पराली की जरूरत होगी व कई और फैक्टरियां खुलने से उत्तर भारत में पराली की इतनी डिमाण्ड बढ़ जाएगी कि 80 से 90 फीसदी खपत इसी में हो जाए। बता दें कि देश में छत्तीसगढ़ ही वह पहला राज्य है जहां पर गोबर भी प्रतिकलो की दर से खरीदा जाकर किसानों, पशुपालकों को प्रोत्साहन देकर कई अंतर्राष्ट्रीय उत्पाद तैयार कर नए व्यवसाय की शानदार और धाकदार शुरुआत कर देश में एक मिशाल कायम की है।

अब तो पराली से नया उद्योग खड़ा करने की शुरुआत भी छत्तीसगढ़ से ही हो रही है जो वहां के मुख्यमंत्री की इच्छा शक्ति और दूर की सोच की परिणिति है। निश्चित रूप से आने वाले समय में पराली उपयोग का छत्तीसगढ़ मॉडल पूरे देश के लिए वरदान बनेगा बल्कि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे से प्रान्त को अभिनव नवाचारों के लिए भी जाना जाएगा।

बस सवाल यही कि मौजूदा लचर व्यवस्था के बीच जागरूकता और अनमोल पराली का मोल कब तक हो पाएगा?
जहां तक पराली की बात है अभी अनुमानतः भारत में 388 मिलियन टन फसल अवशेष हर वर्ष रह जाता है जिसमें करीब 27 प्रतिशत गेहूं और 51 प्रतिशत धान का शेष दूसरी फसलों का होता है।

जाहिर है जिस तरह की तैयारियां हैं बस कुछ ही बरस में पराली जलाने नहीं बनाने के काम आएगी और देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा और बड़ा उद्योग होगी। किसी ने सही कहा है कि घूरे के दिन भी फिरते हैं। बहुत जल्द ही पराली प्रदूषण फैलाने नहीं धन वर्षा का साधन बनेगी।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया ' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
लेखक के बारे में
ऋतुपर्ण दवे

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