Hanuman Chalisa

करण-अर्जुन बनाम अच्छे दिन

मनोज लिमये
"मेरे करण-अर्जुन आएंगे"  बॉलीवुड की सुपर-डूपर फिल्म में यह एक सुप्रसिद्ध संवाद था। अभिनेत्री  द्वारा तमाम भाव भंगिमाओं के साथ इसे फिल्म में अनेकों बार बोला गया था। सनद रहे कि इस संवाद की याद मुझे अनायास नहीं आई है। आज  सरकार के नुमाइंदे सिनेमा के इसी  संवाद की तर्ज पर प्रत्येक प्लेटफॉर्म पर जनता-जनार्दन से कह रहे हैं "अच्छे दिन आएंगे"। 
सिनेमा था तो 3 घंटे की अवधी में करण-अर्जुन के पास तो कोई विकल्प नहीं था, सो वो आ गए किंतु अच्छे दिन आने में कितना समय लगेगा?  इस बात की कोई निश्चित समयावधि नहीं है। शुरुआत में ऐसा भ्रम हुआ था कि शायद अच्छे दिन अधिकतम 5 बरस में आ जाएंगे, किंतु जब से यह घोषणा हुई है कि 2024  तक कोई खतरा नहीं है, तब से आम मतदाता स्वयं को खतरे में महसूस कर रहा है।
 
वैसे भारतीय मतदाता यह भली-भांति जानता है कि चुनावी वादों और हकीकत का आपस में कोई बी.ए-एम.ए वाला रिश्ता नहीं है। बी.ए करने वाला छात्र एम.ए करने की पात्रता भले ही रखता हो किंतु लोकतंत्र में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि राजनैतिक दल ने घोषणा पत्र में जो भी कहा वो उन्हें करना ही होगा। एक आम व्यक्ति की दृष्टी से अच्छे दिनों का क्या अभिप्राय है यह भी शोध का विषय है। अच्छे दिनों के संदर्भ में कोई ऑथेंटिक सर्वे भी हमारे पास नहीं है जिसकी मदद से यह कहा जा सके कि क्या होगा तो माना जाएगा की अच्छे दिन आ गए?
 
मजबूरी यह कि अच्छे दिनों के संदर्भ में अब धरना भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वो भी अब अप्रासंगिक हो चला है। जब-जब ऐसी विकट स्थिति आई है हजामत की दूकान को मैंने सदैव प्राथमिकता का दर्जा दिया है। मेरे जीवन काल में हजामत की दूकान का स्थान बोधि वृक्ष की तरह है जहां से मैं गाहे-बगाहे ज्ञान प्राप्त करता रहता हूं। हजामत की दूकान पर हजामत करवाने आए परम ज्ञानियों में से एक बोल ही पड़े - 'क्या सूचना के अधिकार में यह जानकारी नहीं मांगी जा सकती कि सरकार बताये अच्छे दिन आए या नहीं'? एक दूसरे सज्जन जो बालों पर कालिख करवा रहे थे, बोले 'करने को तो रिट भी दायर की जा सकती है पर आई डोंट थिंक इट मेक एनी डिफरेंस '।
 
मैंने भी इस ज्ञान हवन में अपनी ज्ञानाहुति देना परम कर्तव्य समझा और कहा 'वैसे पेट्रोल के भाव कुछ कम हुए हैं और टमाटर भी वापिस अपनी लाइन पर आ गया है'। कोने में बैठे एक अन्य सज्जन जो इस बातूनी टाईप के माहौल में स्वयं को एडजस्ट नहीं कर पा रहे थे और संभवतः दफ्तर जाने में लेट हो रहे थे व्यथित हो कर बोले 'ये सब तब सोचना था जब वोट देने गए थे अब फालतू में बहस करने से क्या हासिल होगा? अब प्रतिक्रिया देने की बारी हज्जाम की थी। उसने मुंह में उमड़-घुमड़ रही तंबाखू की पीक को जमीन दरोज करते हुए कहा 'सारे के सारे एक जैसे हैं खर्चा तो दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता ही जा रहा है भिया अब इस महंगाई का कोई कुछ नी कर सकता है।'
 
हज्जाम द्वारा महंगाई के समर्थन में कही इस बात के बाद मैंने कटिंग-दाढ़ी की भाव सूची को गौर से देखा। भावों में अभी कोई वृद्धि नहीं की गई थी और इस महंगाई में मुझे यह भी अच्छे दिनों का नमूना लग रहा था।
Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

सावन मास पर एक भावपूर्ण और मौलिक हिंदी कविता

Shravan Essay: आस्था, प्रकृति और पवित्रता का उत्सव श्रावण मास, पढ़ें रोचक निबंध

आगे तो बढ़ रहे हैं… पर किस दिशा में? कहीं ऐसा तो नहीं कि जीवन बेहतर बनाने की दौड़ में हम जीना ही भूलते जा रहे हैं?

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

सभी देखें

बारिश में कुछ टेस्टी खाने का है मन? ट्राई करें ये 5 मानसून स्पेशल रेसिपीज

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना

कविता: लाल किला तुझे सलाम

Essay on Friendship Day: फ्रेंडशिप डे: दोस्ती के अटूट बंधन का खूबसूरत पर्व, पढ़ें हिन्दी में रोचक निबंध

अगला लेख