उत्तरप्रदेश को चाहिए अर्जुन की आंख


में जैसे-जैसे निकट आते जा रहे हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ती जा रही है। प्रांत में चुनाव का माहौल गरमा रहा है। अभी से विभिन्न राजनीतिक दल भावी नेतृत्व के विकल्प की खोज शुरू करें, जो देश के सबसे बड़े प्रांत को सुशासन दे सके। जो पार्टियां सरकार बनाने की संभावनाओं को तलाशते हुए अपने को ही विकल्प बता रही हैं, उन्हें उम्मीदवार चयन में सावधानी बरतनी होगी। इसमें नीति और निष्ठा के साथ गहरी जागृति की जरूरत है।
 
 
इधर मतदाता सोच रहा है कि राज्य में नेतृत्व का निर्णय मेरे मत से ही होगा। यही वह वक्त है, जब मतदाता ताकतवर दिखाई देता है? इसी वक्त मतदाता मालिक बन जाता है और मालिक याचक- यही लोकतंत्र का आधार भी है और इसी से लोकतंत्र भी परिलक्षित होता है। अन्यथा लोकतंत्र है कहां?
 
लेकिन मतदाता को भी अपनी जिम्मेदारी एक वफादार चौकीदार के रूप में निभानी होगी। एक समय इस प्रदेश के नेतृत्व ने समूचे राष्ट्र के लिए उदाहरण प्रस्तुत किए थे, लोकतंत्र को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई थी, वही नेतृत्व जब तक पुन: प्रतिष्ठित नहीं होगा तब तक मत, मतदाता और मतपेटियां सही परिणाम नहीं दे सकेंगी।
 
आज उत्तरप्रदेश को एक सफल एवं सक्षम नेतृत्व की अपेक्षा है, जो प्रदेश की खुशहाली एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोपरि माने। आज प्रदेश को एक अर्जुन चाहिए, जो मछली की आंख पर निशाने की भांति भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, महंगाई, बेरोजगारी आदि समस्याओं पर ही अपनी आंख गड़ाए रखे। शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा, कानून व्यवस्था, जन-सुविधाओं के विस्तार के लिए जो निरंतर प्रयासरत हो।
 
युवा मुख्यमंत्री भले ही न बन सके हो, पर उनकी इस दिशा में कोशिश को कमतर भी नहीं आंका जा सकता। उनकी छवि बेदाग और ईमानदार मुख्यमंत्री के साथ-साथ विकास-पुरुष के रूप में बनी। भले ही कुछ राजनीतिक दल आरोप लगाते रहे हो कि प्रदेश को साढे़ चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं- मुलायमसिंह यादव, शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव एवं आजम खां एवं बाकी आधे खुद अखिलेश।
 
कुछ भी कहा जाए, अखिलेश ने अपनी पारी को अच्छे ढंग से खेला है। अब जबकि राजनीतिक गलियारों में सपा की जीत की कम ही संभावनाएं आंकी जा रही है, वैसे समय में अखिलेश के हौसले किसी भी दृष्टि से कमजोर नजर नहीं आ रहे हैं। वे पूरे विश्वास एवं उम्मीद से भरे हैं। यही कारण है कि उनके प्रयासों में दूरदर्शिता के साथ-साथ कूटनीति के भी दर्शन हो रहे हैं। जो उन्हें जीत की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चुनावी साल में अखिलेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने घोषणा पत्र के उन जटिल वादों को पूरा करने की होगी, जो अब सरकार की नीति और नीयत का प्रश्न बन गए हैं।
 
सपा का यह एक सूझबूझपूर्ण निर्णय ही कहा जाएगा कि आगामी चुनाव के लिए उन्होंने अपनेउम्मीदवारों के नामों की सूची अभी से तय करके उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में काम करने और काम करके वहां से लोगों का दिल जीतने के लिए भेज दिया है। मेरी दृष्टि में इस निर्णय से सपा को बहुत बल मिलेगा।
 
इधर नेताजी ने समय-समय पर सार्वजनिक रूप से अखिलेश सरकार और उनके मंत्रियों को निशाना बनाकर सुशासन एवं पारदर्शिता का पाठ पढ़ाया, यह विपक्ष के हमले को कुंद करने का प्रयास तो था ही, साथ ही राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण पार्टी के भीतर होने वाले घमासान की संभावनाओं पर बहुत होशियारी से नियंत्रण की कोशिश भी कही जा सकती है।
 
सुशासन एवं विकास पर हाईटेक रहे अखिलेश ने पार्टी के मुस्लिम एजेंडे पर खूबसूरती से कायम रहते हुए भी प्रगतिवादी और उदारवादी चेहरा दिखाने में भी संकोच नहीं किया। जड़ता से बाहर निकलकर अखिलेश ने एक संदेश दिया है। इस समय वे अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में ‘मिशन-2017’ को लेकर जुटे हैं। इसके लिए उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है पार्टी एवं सरकार की इमेज को सुधारना।
 
लेकिन 4 साल की छवि को 7-8 माह में सुधार पाना टेढ़ी खीर साबित होती दिख रही है। असल में अखिलेश को चुनौती जितनी बाहरी है उससे ज्यादा भीतरी है। इसका उदाहरण दबंग विधायक रामपाल हैं जिन्हें उन्होंने पार्टी से बाहर का रास्ता तो दिखा दिया लेकिन पार्टी के पुरोधाओं के सामने नतमस्तक होकर रामपाल को वापस लेना पड़ा। इस तरह से सपा के एक कदम आगे और दो कदम पीछे के खेल के बड़े नुकसान पार्टी के झेलने पड़ सकते हैं।
 
लंबे दौर से प्रदेश की राजनीति विसंगतियों एवं विषमताओं से ग्रस्त रही है। इन स्थितियों से मुक्त होने के लिए सपा के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक दलों को आने वाले चुनाव में ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे ताकि प्रदेश को ईमानदार और पढ़े-लिखे, योग्य उम्मीदवार के रूप में ‘अर्जुन’ मिल सके। जो भ्रष्टाचारमुक्त शासन के साथ विकास के रास्ते पर चलते हुए राजनीति की विकृतियों से छुटकारा दिला सके। प्रदेश को संपूर्ण क्रांति की नहीं, सतत क्रांति की आवश्यकता है।
 
 



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