न्यूयॉर्क डायरी : पीढ़ियों की सी‍ढ़ियां

Last Updated: सोमवार, 6 अक्टूबर 2014 (20:03 IST)
-सुषम बेदी, न्यूयॉर्क से
एन्‍थ्रोपालजिस्ट ने कहा था कि पहले जब कोई दादी गोद में बिठाए अपने पोते के भविष्य के बारे में सोचती थी तो बहुत कुछ अपने वर्तमान जैसा भविष्य की परिकल्पना में होता था। जो ले-देकर सही भी था। पर आज जब कोई दादी अपने गोद में बैठे पोते की भावी कल्पना करे तो तेजी से बदलते आधुनिक युग में उस भविष्य की बहुत सही कल्पना कर पाना उसके बस की बात नहीं होगी।
मीड का यह कथन भारत के लिए भी उतना ही सही होगा जितना अमेरिका के लिए। वहां भी आज जब दादी मां बच्चे को गोद में बिठाती है तो बच्चे के भविष्य की कल्पना उसके प्रत्यक्षीकरण की सीमाओं के बाहर पड़ जाती है।
 
अब सोचिए कि अमेरिका आने वाले भारतीय, जो कि न केवल समय बल्कि स्थान की दृष्टि से ही हजारों मील दूर आ गए हैं, और ऐसे देश में, जो कि भारत के मुकाबले प्रगति की दुनिया में कोसों आगे है, ऐसे देश में पलने वाले भारतीयों की युवा पीढ़ी अपनी दादी तो छोड़, मां-बाप की दुनिया से ही कितनी-कितनी दूर होगी। दादी की दुनिया तो युवाओं के लिए शोध का‍ विषय बन जाती है, क्योंकि कतरा भर भी अंदाज उनके मौजूदा जीवन में नहीं।
 
इस तथ्य को हम थोड़ा-सा भी समझ लें तो हमें अंदाज हो जाएगा कि हमारे यहां बड़े होने वाले युवकों की दुनिया हमसे कितनी दूर है। हम, पहली पीढ़ी के आप्रवासी जो काफी हद तक इन बच्चों की दादी की दुनिया को अपने भीतर संजोए हैं, अभी भी उसी दुनिया के नियमों का पालन करते हैं, उसका खान-पान, उसके रीति-रिवाज, उसके सोच-विचार को मानते हैं... स्वयं इन बच्चों से कितना दूर आ गए हैं।
 
पर हम में से कितने यह सब देख पाते हैं?
 
देख पाते होते तो पीढ़ियों के जिस टक्कर की बात आज हम कर रहे हैं, उसका सवाल भी न उठता और उठता तो उसकी खास अहमियत न होती। पर संघर्ष है इसलिए सवाल उठता है और बार-बार उठाया जाता है। और अमेरिका में बसे आवासी भारतीयों के बारे में तो और भी ज्यादा बार उठाया जाता है, क्योंकि यहां के भारतीय परिवार एकसाथ समय और स्थान के बहुआयामों में विचर रहे हैं और बिना तकलीफ के एक से ज्यादा समय-स्थानों के बीच से निकल पाना किसी भी इंसान के बस की बात नहीं होगी।
 
क्या है वे बहु-आयाम?
 
पहले युवक-युवतियों का सवाल लीजिए। दिन के चौबीस घंटों के भीतर ही वे कम से कम एक तिहाई हिस्सा उस दुनिया में गुजारते हैं, जो उनके घर की दुनिया से एकदम अलग होती है। जहां भारतीय संदर्भों का कोई ताल्लुक ही नहीं होता। न तो भारत उनके करीकुलम का हिस्सा होता है, न खेलों का, न उनके अध्यापक या सहपाठियों को कहीं छूता है। उस वातावरण में कहीं कुछ ऐसा नहीं होता, जो भारतीयता को पोसे या उन्हें उसके नजदीक ले जाए। भारतीयता को भूलकर या उससे दूर जाकर इस दुनिया में रमना ही यहां की सफलता की एक बड़ी शर्त होती है।
 
इस दुनिया के नियम न केवल भिन्न बल्कि घर की दुनिया के उलट भी हो सकते हैं। अगर बच्चे को घर में सिखाया जाता है कि बड़ों का आदर करो तो बाहर सिखाया जाता है कि सबसे बराबरी का व्यवहार करो। घर में सिखाया जाता है कि विनम्र बनो, सिर झुकाकर चलो, अप्रिय सत्य न बोलो, तो बाहर यह उम्मीद की जाती है कि साफ बात कहो और खुलकर, बेबाक होकर बोलो। 
 
भारतीय संस्कृति कहती है कि आत्म का दमन करो, विलय करो और अमेरिकी कहती है कि आत्म को प्यार करो, पोसो (यहां 'आत्म' से मेरा मतलब 'सेल्फ' या 'स्व' से है। उपनिषदों में आत्म का एक अर्थ आध्यात्मिक है जिसके विकास पर जोर दिया गया है वहीं उसका दुनियावी रूप अहम है जिसके दमन पर जोर दिया गया है। यानी कि 'मैं' को भूलकर 'आत्म' को उस 'परमात्म' के स्वरूप में घुला देने पर बल दिया जाता है। मैं इस ऐहिक आत्म, 'मैं' या अहम की बात कर रही हूं जिसकी अभिव्यक्ति इंसान का एक व्यक्ति के रूप में विकास होने के लिए अवश्यंभावी है जिसका दमन करने से व्यक्ति का अंतस सूखने लगता है। अमेरिकी संस्कृति ने इस अहम की अभिव्यक्ति, उसके सीमाहीन विकास और उसके प्रति जागरूकता पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। भारतीय समाज में बहुत से घर्षण इस दमन का परिणाम होते हैं, क्योंकि आत्म या सेल्‍फ जब बहुत दबा दिया जाता है तो वह फिर लावे की तरह जहां-तहां फूटता है... पारिवारिक झगड़े या समाज में ऊंचा स्तर पाने के झगड़ों का, मिन्ना-मिसकना हो जाने का, मूल यही है। इस विषय पर मनोविश्लेषक डॉ. सुधीर कक्कड़ और डॉ. प्रकाश देसाई का लेखन विशेष प्रकाश डालता है।) अमेरिकी संस्कृति कहती है अपनी योग्यता को जानो-समझो, उसे औरों के सामने आने का मौका दो, तो भारतीय कहती है कि अपनी योग्यता का दिखलावा मत करो।
 
बात यह है कि भारतीय और अमेरिकी संस्कृति में इतना अंतर है कि कई चीजें तालमेल खाती ही नहीं। पर फिर भी भारतीय माता-पिता ही अगर बच्चे को घर में विनम्र बनने को कहेंगे तो साथ ही यह उम्मीद भी करेंगे कि बाहर की दुनिया में वह सबसे कंधे से कंधा मिलाकर चले, अमेरिकी सा‍थियों की ही तरह प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले, बेसबॉल खेले, वैसे ही एग्रैसिव हो जैसे अमेरिकी बालक।
 
देखा जाए तो स्वयं भारतीय मां-बाप ही दोनों संस्कृतियों के मानदंडों का बोझ अपने बच्चों पर छोटी उम्र से डालने लगते हैं। वे चाहते हैं कि घर पर तो बच्चे विनम्र-शालीन बने रहें, पर जब बाहर जाएं तो अमेरिकी बच्चों की ही तरह स्मार्ट-एग्रैसिव बनें। वे पूरी कोशिश करते हैं कि ये बच्चे बेसबॉल खेलें, वायलिन बजाएं, बैले सीखें। साथ ही जब उनकी भारतीयता को लेकर चिंतित होने लगते हैं तो उनको तबले, सितार और भरतनाट्यम की क्लासों में भरती करवाते हैं और जोर डालते हैं कि बच्चे इन्हें भी ध्यान लगाकर सीखें। साथ ही अपने धर्म और भाषा की शिक्षा भी लें। अपनी पूरी कोशिश के साथ वे बच्चों को घर और बाहर दोनों संस्कृतियों में ढालना शुरू कर देते हैं। अपनी संस्कृति का ज्ञान जरूरी है इस पर सवाल नहीं लगाया जा सकता। निश्चय ही इससे बच्चों की जड़ें मजबूत होती हैं, जो उनके बहुमुखी विकास के लिए, उनके एक मजबूत व्यक्ति बनने के लिए जरूरी है।
 
मेरी आपत्ति इस बात पर है‍ कि मां-बाप उनसे जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएं करने लगते हैं। इससे हमारे बच्चों पर बहुत बोझ डलता है एकसाथ बहुत कुछ सीख डालने का। और न केवल सीखना बल्कि उसे ठीक से भीतर गुनने-मथने का। अगर वह इन अपेक्षाओं की पूर्ति में सफल न हो तो यह उनके विकास में घातक हो सकता है।
 
चूंकि भारतीय संस्कृति का कोई संदर्भ उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं होता इसलिए बहुत कुछ भारतीय विद्याओं को सीखना उनके लिए 'इररेलेवेंट' हो जाता है, दूसरे अमेरिकी सदर्भ चूंकि उनके जीवन के हर दिन का सच होता है इसलिए अनचाहे-अनजाने ही वह उनकी हस्ती का हिस्सा होने लगता है। वहीं जब कुछ बड़े होकर जो कुछ उन्होंने 'आस्मासिस' की प्रक्रिया से घर से ग्रहण किया होता है, उसके प्रति वे अपने-आप सचेत होते हैं, अपने-आप उसकी खोज करते हैं। उनकी अपनी समझ और खोज ही उनको भारतीयता के उन अंशों को ग्रहण करने के लिए तत्पर करती है, जो उनकी मौजूदा जिंदगी में खप सकते हैं, उन्हें रास आ सकते हैं, वर्ना मां-बाप का सिखाया बहुत-कुछ उन्हें सांप के केंचुल की तरह त्याग देना पड़ता है। जो अपने आप पाते हैं वही अंतत: जीवनभर उनके साथ रहता है।
 
हमें बच्चों में संस्कृति के उन मूल तत्वों की ही समझ पैदा करनी है। उनको जबरदस्ती मंदिरों में नहीं धकेलना, जबरदस्ती हिन्दू धर्म के भाषण नहीं सुनवाने, जबरदस्ती कीर्तनों में नहीं बिठाना। जितना घर में होता है, नानी-दादी या परिवार के दूसरे सदस्यों में देखते-सुनते हैं, त्योहारों को मनाने में अब्जर्व करते हैं, वह जानना उनमें जागरूकता भरता रहता है, जो उनके मन की तैयारी करती रहती है सही सवाल पूछने के लिए। सवाल जो भारतीयता को उनकी मौजूदा जिंदगी में 'रैलेवेंट' बना सकें।
 
आज भारतीय मां-बाप को बार-बार यही शिकायत होती है कि बच्चे उनसे इज्जत से नहीं बोलते, तू-तड़ाक करते हैं, हर बात का मुंहतोड़ जवाब देते हैं, कुछ करने से रोको तो बड़ी बेशर्मी से उसका तर्क मांगते हैं, कुछ भी करने को कहो तो सवाल उठाते हैं। मैं ऐसे बहुत से मां-बाप को जानती हूं, जो सिर्फ इसलिए भारत लौट गए कि यहां बच्चे बिगड़ जाते हैं। मैं उनसे पूछती हूं कि कैसे बिगड़ जाते हैं तो जवाब मिलता है- बड़े रूड हो जाते हैं, मां-बाप की सुनते नहीं। मैं उन्हें छेड़ती भी हूं कि आप बच्चों को कंट्रोल में रखना चाहते हैं? क्या बच्चे आपकी संपत्ति हैं?
 
बच्चों को अपने से अलग करके एक स्वायत्त इकाई के रूप में स्वीकार करना और विकसित होने देना बहुत जरूरी है। आप उन्हें रास्ता जरूर दिखाइए, पर कितनी देर तक उंगली पकड़कर चलाते रहेंगे! हमने उनको पैदा किया है तो इसका मतलब नहीं कि हमारा उन पर हक हो गया। उन्हें अपनी सांस भरने की आजादी होनी चाहिए। आखिर हमीं ने इस अमेरिकी दुनिया का रास्ता भी उनको दिखलाया है। अब अगर वे सफलतापूर्वक उस पर चल पड़े हैं और इतना आगे आ गए हैं तो क्या अब चुटिया पकड़कर उन्हें वापस खींचने की कोशिश अक्ल की बात होगी? यह तो वही गाय-ढोर वाली बात हो गई। गाय के गले में रस्सी बांध दी कि जब तक आपकी मर्जी हो, चरने दें और फिर जब मन आए तो रस्सी खींच वापस खूंटे से बांध दिया। ऐसी आजादी स्वतंत्र मन से सोचने वाले युवाओं को कैसे रास आ सकती है! बाकी भारतीय संस्कृति के जो आंतरिक गुण हैं, जो उनको सहज भाएंगे, उनको तो सहज ही वे अंगीकार कर लेते हैं, उसके लिए उनको जबरदस्ती किसी खूटे से बांधने की जरूरत नहीं होती।
 
खासतौर से जब लड़कियों का सवाल उठता है कि तो भारतीय-अमेरिकी नजरिए में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है। भारतीय मूल्यों में अभी भी लड़कियां घरेलू ही भली होती हैं चाहते कितनी भी आधुनिक और फैशनेबल हों। उनका घरेलू संस्कार उन्हें तारीफेलायक बनाता है। मां-बाप के लाड़-चाव में पली लड़कियां समाज के दूसरे क्षेत्रों में भी बहुत तरक्की कर रही हैं, पर विवाह का सवाल उठते ही कामशुदा लड़की में भी घरेलूपन के गुण ढूंढे जाते हैं। औरत आज भी घरवालों की इज्जत का मसला बनी हुई है। आज भी अमेरिकी-भारतीय घरों की लड़कियों की एक बड़ी समस्या यही होती है कि मां-बाप उनको पूरी आजादी नहीं दे पाते, जैसे कि उनके भाइयों को मिलती है। जहां मां-बाप आजादी दे डालते हैं, वहां वे सदैव खुद ही अपने पर संदेह करते रहते हैं कि सही कर रहे हैं या नहीं? कि हिन्दुस्तान में होते तो यह समस्या ही न उठती। जबकि यह समस्या हर पीढ़ी की होगी और हर भौगोलिक क्षेत्र में होगी। उसका रूपरंग बदला हो सकता है। लड़कियों के मसलों को लेकर एक पूरा दूसरा लेख लिखना होगा। इसलिए इसे यहीं छोड़ आगे बढ़ती हूं।
 
अमेरिकी समाज के साथ एक मूल्य जो यहां आने वाले लगभग सभी भारतीय बांटते हैं, वह है शिक्षा पर जोर देने का। पर हम नए वातावरण में आर्थिक तौर से असुरक्षित आवासियों के लिए‍ शिक्षा मानसिक विकास का उतना बड़ा जरिया नहीं है जितना कि आर्थिक विकास का। आर्थिक बढ़ोतरी के लिए भयभीत आवासी बच्चों को व्यावसायिक शिक्षा लेने पर ही दबाव डालते रहते हैं। चूंकि मेडिकल या कम्प्यूटर जैसे विषयों की पढ़ाई निश्चयात्मक तौर पर सुरक्षित भविष्य का वचन दे सकती है, तो हम बच्चों की रुचि दूसरे विषयों या कलाओं में होने पर भी उन पर दबाव डालते हैं कि वे कोई धन-उपजाऊ विषय ही पढ़ें। यह दबाव खासतौर से लड़कों पर ज्यादा पड़ता है।



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