उपचुनाव में भाजपा की जीत के बाद भी अपने ही गढ़ में साख नहीं बचा सके ‘महाराज’ सिंधिया

Author विकास सिंह| पुनः संशोधित बुधवार, 11 नवंबर 2020 (09:54 IST)
में 28 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की है। भाजपा ने 19 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस के सत्ता में वापसी के सपने को तार-तार कर दिया है। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन 28 में से 27 सीटों पर जीत हासिल कर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी वहीं अब में भाजपा ने 19 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली है।

प्रदेश के इतिहास में पहली बार 28 सीटों पर एक साथ हो रहे उपचुनाव में सबकी निगाहें पिछले आठ महीने से सत्ता के केंद्र में रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया पर लगी थी। मार्च में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 22 समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए थे तो वह कमलनाथ सरकार को गिराने और भाजपा सरकार बनाने में ‘नायक’ के तौर पर उभरे थे। ऐसे में इन उपचुनाव में सिंधिया की पूरी साख दांव पर लगी थी। चुनाव के परिणाम से सिंधिया का पूरा राजनीतिक भविष्य सीधे तौर पर जुड़ा था।
अगर चुनाव नतीजों का विश्लेषण करें तो सिंधिया के गढ़ के रूप में पहचाने जाने वाले ग्वालियर-चंबल अंचल में 16 सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने 9 सीटों जीत ली है। ऐसे में सिंधिया ने बहुत हद अपनी प्रतिष्ठा को बचा लिया है,लेकिन सिंधिया की कट्टर समर्थक और पूरे उपचुनाव में सबसे अधिक सुर्खियों में रही कैबिनेट मंत्री इमरती देवी और अपने घर
ग्वालियर पूर्व सीट से उनके समर्थक मुन्नलाल गोयल की हार ने जरूर उनकी साख पर असर डाला है।

उपचुनाव में सात सिंधिया समर्थक भाजपा उम्मीदवार चुनाव हार गए है। इनमें शिवराज सरकार में राज्यमंत्री और दिमनी विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार गिर्राज दंडोतिया और सुमावली सीट से चुनावी मैदान में उतरे मंत्री एंदल सिंह कंसाना भी शामिल है।

गिर्राज दंडोतिया जिनको सिंधिया के कट्टर समर्थक के तौर पर गिना जाता है उन्हें कांग्रेस के रवींद सिंह तोमर ने मात दी है। वहीं मुरैना की सुमावली सीट चुनाव लड़े कैबिनेट मंत्री एंदल सिंह कंसाना को कांग्रेस के अजब सिंह कुशवाहा के हाथों हार का सामना करना पड़ा है। इसके साथ ही मुरैना से रघुराज सिंह कंषाना, गोहद से रणवीर जाटव, करैरा से जसमंत जाटव भी चुनाव हार गए है।

ग्वालियर-चंबल की सियासत को करीब से देखने वाले वरिष्ठ कहते हैं भाजपा की इस बड़ी जीत के बाद सिंधिया अब यकीनन भाजपा में एक समानांतर सत्ता के केंद्र बनकर उभरेंगे लेकिन उनके लिए चिंता की बात यह होगी वे अपने ही गढ़ में साख नहीं बचा सके है।भाजपा की इस बड़ी कामयाबी के बाद कांग्रेस सरकार गिराने वाले और शिवराज बनाने वाले सबसे अहम चेहरे ज्योतिरादित्य सिंधिया को तगड़ा झटका लगा है।

'वेबदुनिया' से बातचीत में डॉक्टर राकेश पाठक कहते हैं कि सिंधिया के अपने संसदीय क्षेत्र रहे शिवपुरी की करैरा सीट पर भी भाजपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा है। कुल मिलाकर सिंधिया के लिए अपने ही प्रभाव क्षेत्र के समर्थकों को नहीं जिता पाना उनके लिए चिंता की बात होगी। खास तौर पर तब जब कि वे पूरे चुनाव में साफ कहते रहे कि यह सिंधिया घराने की इज्जत का सवाल है।



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