आज का युग अत्यंत प्रगतिशील है।
इतना प्रगतिशील कि अब युद्ध भी शांति स्थापना के नाम पर लड़े जाते हैं। पहले लोग युद्ध जीतने के लिए लड़ते थे, अब वे शांति जीतने के लिए लड़ते हैं अंतर केवल शब्दों का है, परिणाम लगभग वही रहता है।
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही तनातनी को देखिए। दोनों ही पक्ष अत्यंत गंभीर, जिम्मेदार और विश्वशांति के कट्टर समर्थक हैं। दोनों के बयान सुनिए तो लगेगा कि वे युद्ध नहीं, कोई आध्यात्मिक सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। फर्क इतना है कि सम्मेलन के निमंत्रण-पत्र की जगह मिसाइलें भेजी जा रही हैं।
अमेरिका का तर्क बड़ा सरल और पवित्र है 'हम शांति चाहते हैं, इसलिए युद्ध आवश्यक है।' यह वही तर्क है जैसे कोई कहे कि 'मैं स्वास्थ्य के लिए रोज जहर की थोड़ी-थोड़ी मात्रा लेता हूं।' दूसरी ओर ईरान है, जो अपने स्वाभिमान को थामे खड़ा है। वह कहता है 'हम झुकेंगे नहीं।' यह झुकने और न झुकने की लड़ाई कब टकराने में बदल जाती है, यह शायद दोनों ही नहीं समझ पाते।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक सक्रिय यदि कोई है तो वह है समाचार चैनल। उनके लिए यह युद्ध नहीं, एक भव्य इवेंट है। स्क्रीन पर लाल-नीले नक्शे, तीरों की आवाजाही, और एंकर की उत्तेजित वाणी मानो कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो।
'देखिए, यह मिसाइल यहां से चलेगी, और सीधा यहां जाकर गिरेगी!' बस फर्क इतना है कि यहां विकेट नहीं गिरते, इंसान गिरते हैं।
संयुक्त राष्ट्र भी इस कथा का एक महत्वपूर्ण पात्र है। वह हर बार मंच पर आता है, गंभीर स्वर में अपील करता है 'कृपया शांति बनाए रखें।'
यह अपील कुछ वैसी ही होती है जैसे दो लड़ते बच्चों के बीच खड़ा कोई तीसरा बच्चा कहे 'अरे मत लड़ो!'
और दोनों बच्चे उसे धक्का देकर फिर से लड़ने लगें।
दुनिया के अन्य देश भी कम दिलचस्प नहीं हैं। वे सब दर्शक बने बैठे हैं। कुछ देश भीतर-ही-भीतर प्रसन्न हैं कि तेल के दाम बढ़ेंगे, कुछ सोच रहे हैं कि हथियारों की बिक्री बढ़ेगी। कुल मिलाकर, युद्ध अब केवल दो देशों के बीच नहीं होता यह एक वैश्विक व्यापारिक अवसर भी बन चुका है।
और आम जनता? वह अपने मोबाइल स्क्रीन पर युद्ध का लाइव अपडेट देख रही है। चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा चल रही है
'लगता है इस बार बड़ा कुछ होगा!' उसे यह नहीं बताया जाता कि हर बड़ा कुछ किसी छोटे घर की तबाही होता है, किसी मां की सूनी गोद, किसी बच्चे का टूटा भविष्य होता है।
विडंबना देखिए दोनों पक्ष शांति शब्द का प्रयोग सबसे अधिक करते हैं, और उसी अनुपात में हथियारों का भंडारण भी बढ़ाते हैं। मानो शांति अब एक ऐसा शब्द हो गया है, जिसे केवल भाषणों में जिया जाता है और वास्तविकता में मारा जाता है।
अंततः यह पूरा घटनाक्रम हमें यही सिखाता है कि आज का युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता यह शब्दों में, अर्थों में, और सबसे अधिक, हमारी संवेदनाओं में लड़ा जाता है।
और इस महायुद्ध में सबसे बड़ी हार किसी देश की नहीं, बल्कि मानवता की होती है, जो हर बार मारी जाती है और हर बार अगली शांति वार्ता तक जीवित घोषित कर दी जाती है।
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