अंग्रेजी में एक कहन है; people who show you new music are important. मैं अक्सर अपने मित्रों और परिचितों को नए गीत भेजता रहता हूं, कभी रेयर तो कभी कोई अनरिलीज़्ड गाना. इस गुमान के साथ कि मैं संगीत में कितना कुछ जानता- समझता हूं. लेकिन एक रात ऐसी भी थी कि मैं लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर के कंठ में भेद नहीं कर पाया! मैं एक ऐसी समानता का शिकार हो गया जिसमें कोई भेद नहीं था— हालांकि वे दो कंठ थे, दो आवाजें और दो अलग जिंदगियां.
आँखें और पैर थके हुए हैं. देह टूटी हुई. उनींदी शक्ल और बेलौस, बेपरवाह प्रतीक्षा में प्लेटफॉर्म पर यहां से वहां भटक रहा हूं. जूतों में पैर सुन्न हैं और बर्फ की तरह ठंडे. दिमाग़ बिल्कुल शिथिल. ज़ेहन शून्य है. कोई विकल्प नहीं है. अब रेलगाड़ी आएगी तो बैठ जाएंगे— नहीं आई तो सुबह जो होगा वही होगा.
मैं वेटिंग हॉल में चला आता हूं. एक खाली कुर्सी देखकर पसर जाता हूं. आसपास लोग ऊंघ रहे हैं, झपकियों से गर्दनें लुढ़क गई हैं. बच्चों ने अपनी देहों को कुछ दूसरी बड़ी देहों के हवाले कर दिया है. हर कोई नींद में गुम हैं. जैसे नींद का देवता अभी- अभी नशा बांट के गया हो.
सामने टीवी है, अभी- अभी श्वेत श्याम (दो आंखे बारह हाथ) ख़त्म हुई है. अगली फिल्म (दिल ने फिर याद किया- 1966) शुरू हुई है. वही इंडियन रोमांटिक ड्रामा. एक गलतफहमी और याददाश्त चले जाने वाला एक एंगल. कहानी बढ़ती गई और मेरी पूरी थकी हुई देह सिर्फ एक ही ख़्याल पर सिमट आई है. मेरा ज़हन और फिल्म की कहानी दोनों रफ़त में आकर साथ- साथ बहने लगे हैं. फ़िल्म क्लाइमेक्स के करीब है और टाइटल सॉन्ग 'दिल ने फिर याद किया बर्क सी लहराई है' किसी धीमे झोंके की तरह शुरू होता है. नदी के पानी की लय में अपनी लय को मिलाता हुआ. नाव के साथ बहता हुआ गीत. पूरी फिल्म को दरकिनार करता हुआ मैं एक बार फिर से लता मंगेशकर की आवाज़ में गिरफ्त हो जाता हूं. एक बार फिर मुझे यह गुमान जकड़ लेता है कि मैं लता जी का बहुत भावुक प्रशंसक हूं. मुझे लगता है कि अगर मैं कभी लता से मिलता तो मिलते ही वो मुझे पहचान लेती. मुझे लगता है, जिस तरह मैं लता को सुनता हूं, शायद ही कोई ओर सुनता होगा. जिस तरह से मैं लता मंगेशकर से प्रेम करता हूं— कोई नहीं करता है.
यही सोचते हुए इस गाने को मैं अपनी प्ले लिस्ट में दर्ज़ कर लेता हूं. यह गीत पहले भी सुन चुका था, किंतु अनजान शहर, नींद में डूबे हुए प्लेटफॉर्म, रात के दृश्य, रेल न आने की उकताहट और एक अनिश्चित प्रतीक्षा के बीच जिस तरह से यह गीत आधी रात को ऊंघते हुए लोगों के बीच बज रहा था, वो फिर कभी नहीं होगा. उस वक्त को कभी दोहराया नहीं जा सकेगा. ज़िंदगी हर क्षण नई है, किंतु हमारी आँखें सदियों पुरानी हैं. देह नई है किंतु याददाश्त प्राचीन है. मैं कांप उठा हूं लता की आवाज़ पर. मेरी स्मृति में लता मंगेशकर है, जबकि यह आवाज़ सुमन कल्याणपुर की है. मैं अपनी याददाश्त का शिकार हो चुका था और पूरी रात लता के ग़लत रूमानियत ख्याल में गुजार दी.
इस फिल्म और गीत के साथ स्मृति में मुझे एक पूरी चिड़चिड़ी रात मिली थी, रेलवे स्टेशन का एक दृश्य मिला. हज़ारों उनींदी आँखें, थकी मांदी देह, खीझ से भरी एक प्रतीक्षा, तमाम चिल्ल- पों और बगैर किसी विकल्प के रेल का इंतजार करने का एक माद्दा— और एक कुछ भी सह लेने की बेशर्मी मिली थी.
जिस आदमी की रेल नहीं चूकती या जो 10-15 घंटे देरी से आने वाली रेल का प्लेटफॉर्म पर इंतजार नहीं करता, वो आदमी हक़ीकत में किसी काम का नहीं. हर आदमी को अपनी जिंदगी में कोई न कोई चीज़ चूक जानी चाहिए. हर आदमी को किसी न किसी अज्ञात शे की प्रतीक्षा करनी चाहिए.
बहरहाल, मेरे लिए यह भी काफ़ी नहीं था. मैं हर चीज़ को हद तक बर्दाश्त करना चाहता हूं. ज़्यादा से ज़्यादा जानी- अनजानी शे को सहना और समझना चाहता हूं. इसलिए मैं अपनी पसंद की हर चीज़, हर बात, हर घटना को अतिरेक में बरतता हूं. ज़्यादातर संगीत में.
मैं सितार के एक टुकड़े पर ख़ुद की जान ले लेता हूं. गले के एक घुमाव पर सारी रात गुजार देता हूं. कंठ के रेशे पर महीनों ज़िंदा रहता हूं.
यही वजह है कि संगीत ने मेरी जिंदगी का ज़्यादातर हिस्सा और वक्त बर्बाद कर दिया है. बर्बाद किए वक्त को मैं कहीं वाज़िब इस्तेमाल कर सकता था. इस बर्बादी से मुझे निजी और ज़हनीतौर पर जो मिला है वो दुनिया के किसी काम का नहीं. एक नितांत अकेली ज़िंदगी कितनी भी गहरी और समृद्ध हो, वो शेष जमात के किसी काम नहीं आती.
सो, फ़िल्म खत्म होती है, साल 2022 की कोई शाम है. शाम को साढ़े 7 बजे आने वाली रेल सुबह 4 बजे आती है. मैं बर्थ पर लेटते ही स्पॉटीफाई पर 'दिल ने फिर याद किया बर्क सी लहराई है' गीत लगा लेता हूं. इसके बाद कई दिनों तक यह गीत लूप में बजता रहता है. पहले मोहम्मद रफ़ी शुरू करते हैं, अंत में मुकेश की आवाज है— और बीच में स्त्री कंठ का हिस्सा, जिसे मैं अब तक लता मंगेशकर समझता रहा.
1 जून 2026 की सुबह सुमन कल्याणपुर के निधन पर मुझे पहली दफ़ा पता चलता है कि यह लता मंगेशकर नहीं, सुमन कल्याणपुर की आवाज़ थी. मैं सोच रहा हूं मुझे सुमन की आवाज़ ने धोखा दिया या ख़ुद मैंने अपने आप को?
लता और सुमन का कंठ एक नहीं हो सकता. वो है भी नहीं. यह समानता थी— और समानता में ही भिन्नता है. समान का अर्थ ही है कि (एक) नहीं वहां (दो) है. तभी वहां समानता आई.
यह तो क़ुदरत की ग़लती थी, उसने लता और सुमन को एक ही कालखंड में जन्म दिया और सुमन की आवाज़ का उजाला लता की आवाज़ के आलोक में कुछ मंद- सा रह गया. जैसे माइकल जैक्सन की मूनवॉक रोशनी में जॉर्ज माइकल की रूहानी आवाज कहीं खो गई थी. बावजूद इसके मेरे आसपास बहुत से मौसिकीपसंद हैं जो सुमन कल्याणपुर को लता के इक्वल मानते हैं और अगर में सुमन को कमतर कहता हूं मेरे साथ गाली गलौच कर बैठते हैं. मैं सिर्फ यह कहता हूं कि दोनों की अपनी-अपनी जगहें थी.
मैं कभी नहीं चाहता हूं कि मेरा मन लता के कंठ को दुनिया की किसी दूसरी आवाज़ से तुलना करे. हर कंठ का रेशा अलग है. हर कंठ की पीड़ा और चीख अलग है. हर कंठ का दुख और दुख की वजह भिन्न है. आवाज़ें अपने अतीत की स्मृतियों से उपजती हैं. मेरी आवाज़ मेरे बचपन की कहानी है. आपकी आवाज़ आपके किसी अतीत की कहानी या हिस्सा है. हम आवाज़ों की समीक्षाएं नहीं कर सकते. आवाज़ ज़िंदगी है. जीवन का स्वर है. हर जीवन भिन्न है तो जीवन से उपजी ध्वनि भी भिन्न है. लता जी और सुमन जी की ज़िंदगी दो अलग- अलग सिरे, दो अलग स्मृतियां हैं. जिया अलग तो जीने का परिणाम भी अलग हैं.
यह मेरी अनभिज्ञता थीं कि मैं सुनम कल्याणपुर को लता समझता रहा. मेरी सिंचित याददाश्त ने मुझे धोखा दिया— और मैं अपनी प्राचीन स्मृति के हाथों मारा गया. अब मैं कभी नहीं कहूंगा— कि मैं आवाजों के बारे में सबकुछ जानता हूं.