Fertilizer Crisis 2026: रूस और चीन के हालिया फैसलों ने वैश्विक उर्वरक बाजार में हलचल बढ़ा दी है। रूस ने घरेलू मांग को प्राथमिकता देते हुए एक महीने के लिए खाद के निर्यात पर रोक लगा दी है। भारत के कुल उर्वरक आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 33% है। जनवरी से जून 2025 के बीच रूस ने भारत को लगभग 25 लाख टन खाद की आपूर्ति की थी।
वहीं, पोटाश जैसे उर्वरकों के मामले में 100% आयात पर निर्भर भारत के लिए चीन का निर्यात रोकने का फैसला भी चिंता बढ़ाने वाला है। इन दोनों कदमों ने पहले से जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच खाद संकट की आशंका को और गहरा कर दिया है।
ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष का असर फिलहाल रसोई गैस और ईंधन की कीमतों में दिख रहा है, लेकिन यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है तो इसका सीधा असर खेती और खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है। डीजल महंगा होने और उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से स्थिति और जटिल हो सकती है।
क्यों प्रभावित हो सकती यूरिया की सप्लाई
भारत में किसानों की सबसे अधिक मांग यूरिया की रहती है और हर सीजन में इसकी उपलब्धता चर्चा का विषय बनती है। पश्चिम एशिया की मौजूदा अशांति इस समस्या को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा सकती है।
क्यों यूरिया पर सबसे ज्यादा खतरा
भारत में यूरिया उत्पादन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस एलएनजी (LNG) पर निर्भर करता है। देश के अधिकांश यूरिया संयंत्रों में यही कच्चा माल है। भारत अपने एलएनजी आयात का बड़ा हिस्सा (करीब 30%) कतर सहित खाड़ी देशों से करता है और इनकी शिपिंग का प्रमुख मार्ग हॉर्मुज जलडमरूमध्य है।
यदि ईरान के कारण इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो गैस आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में उर्वरक संयंत्रों को उत्पादन घटाना पड़ सकता है या मेंटेनेंस शेड्यूल आगे बढ़ाना पड़ सकता है।
दबाव डीएपी और पोटाश पर भी
डीएपी के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल—रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड, सल्फर और अमोनिया—का बड़ा हिस्सा भारत आयात करता है। इनकी आपूर्ति सऊदी अरब, मोरक्को और खाड़ी क्षेत्र से होती है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में बढ़ते जोखिम के कारण सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे डीएपी की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
पोटाश के मामले में भारत लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। इसका प्रमुख स्रोत रूस, बेलारूस और कनाडा हैं। हालांकि आपूर्ति पूरी तरह रुकने की संभावना कम है, लेकिन युद्ध के कारण शिपिंग लागत, बीमा और रूट बदलने से इसकी कीमतों में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है।
क्या कहती है सरकार
सरकार का कहना है कि खरीफ सीजन के लिए अभी पर्याप्त उर्वरक भंडार मौजूद है और कंपनियों के पास कुछ महीनों की मांग पूरी करने लायक स्टॉक है। लेकिन यदि संघर्ष एक-दो महीने से अधिक समय तक जारी रहता है, तो उत्पादन में कमी, महंगे आयात और बढ़ती सब्सिडी का दबाव सरकार और किसानों—दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। सरकार वैकल्पिक स्रोतों—जैसे रूस, चीन और उत्तरी अफ्रीका—से आपूर्ति बढ़ाने के विकल्प तलाश रही है।
स्पष्ट है कि यह संकट सिर्फ ऊर्जा या विदेश नीति का मुद्दा नहीं रह गया है। यदि हालात नहीं सुधरे तो इसका असर खेत-खलिहानों से होते हुए सीधे आम आदमी की थाली तक पहुंचेगा। भारत के लिए यह समय सिर्फ संकट प्रबंधन का नहीं, बल्कि उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक स्रोतों और दीर्घकालिक रणनीति पर गंभीरता से काम करने का है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala