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Last Updated : बुधवार, 3 जून 2026 (16:49 IST)

Birsa Munda: आदिवासी स्वाभिमान और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा

Portrait of Birsa Munda, a brave warrior of the Indian freedom struggle and a rich historical personality
Birsa Munda Biography: स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस 9 जून को मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में ‘धरती आबा’ (धरती पिता) के नाम से पूजे जाने वाले बिरसा मुंडा मात्र एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे आदिवासी चेतना, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के सबसे बड़े प्रतीक थे। 19वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार मिलकर आदिवासियों का शोषण कर रहे थे, तब बिरसा मुंडा ने एक ऐसी अलख जगाई जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी।
 

1. प्रारंभिक जीवन और चेतना का उदय

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले के उलीहातु गांव में हुआ था। भारत सरकार द्वारा उनके जन्मदिन 15 नवंबर को हर साल 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
 
बचपन और शिक्षा: उनका बचपन चाईबासा के जंगलों और खेतों में बीता। पढ़ाई के लिए उन्होंने कुछ समय ईसाई मिशनरी स्कूल में दाखिला लिया, जहां उनका नाम 'बिरसा डेविड' रखा गया।
 
शोषण के खिलाफ आवाज: स्कूल के दिनों में ही उन्होंने महसूस किया कि मिशनरी और ब्रिटिश व्यवस्था आदिवासियों की संस्कृति, भाषा और उनके पारंपरिक अधिकारों को नष्ट कर रही है। इसके बाद उन्होंने मिशनरी स्कूल छोड़ दिया और अपनी संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया।
 

2. 'बिरसा संप्रदाय' और सामाजिक सुधार

क्रांति से पहले बिरसा मुंडा ने समाज को अंदर से मजबूत करने का काम किया। उन्होंने देखा कि अंधविश्वास और नशे के कारण आदिवासी समाज कमजोर हो रहा है।
 
एकेश्वरवाद की सीख: उन्होंने आदिवासियों को केवल एक ईश्वर (सिंगबोंगा) की पूजा करने की सलाह दी।
 
सामाजिक बुराइयों का अंत: उन्होंने शराबबंदी, पशु बलि के विरोध और स्वच्छता पर जोर दिया।
 
उनके इन विचारों से प्रभावित होकर हजारों लोग उनके अनुयायी बन गए और लोग उन्हें प्यार से 'धरती आबा' कहने लगे।
 

3. 'उलगुलान' (महान विद्रोह) की शुरुआत

'उलगुलान' मुंडारी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'महान उथल-पुथल' या 'विद्रोह'। यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार की 'दिक्षु' (बाहरी शोषक, जमींदार और सूदखोर) नीति के खिलाफ था, जो आदिवासियों की ज़मीनें छीन रहे थे।
 
नारा: बिरसा मुंडा ने सिंहभूम और रांची के जंगलों में आदिवासियों को एकजुट किया और नारा दिया- 'अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना (अर्थात: अब हमारा राज शुरू हो गया है और महारानी का राज खत्म हो गया है)।
 
गुरिल्ला युद्ध: मुंडा तीर-कमान और पारंपरिक हथियारों से लैस होकर ब्रिटिश चौकियों, थानों और जमींदारों पर हमला करते थे। डोम्बारी पहाड़ी का युद्ध इस आंदोलन का एक ऐतिहासिक केंद्र बना।
 

4. महानायक का बलिदान

ब्रिटिश सेना आधुनिक हथियारों से लैस थी, फिर भी बिरसा मुंडा की रणनीतियों के सामने उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। आखिरकार, अंग्रेजों ने चाल चली और बिरसा मुंडा पर इनाम रख दिया।
 
गिरफ्तारी: मार्च 1900 में, चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल से सोते समय उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया।
 
शहादत: मात्र 24 वर्ष की आयु में, 9 जून 1900 को रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में (अंग्रेजों के अनुसार हैजे के कारण) उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन इतिहासकारों और उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा जेल में धीमा जहर दिया गया था। उनकी शहादत के बाद अंग्रेजों को आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act, 1908) कानून बनाना पड़ा, जिसने बाहरी लोगों को आदिवासी जमीन खरीदने से रोका।
 

'धरती आबा बिरसा मुंडा का जीवन हमें सिखाता है कि जब बात अपनी संस्कृति, अस्मिता और अधिकारों की हो, तो संसाधनों की कमी कभी भी आपके हौसलों को डिगा नहीं सकती।'

 
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