(होली पर एक सामयिक व्यंग्य)
होली का त्योहार आते ही देश में दो तरह की प्रजातियां सक्रिय हो जाती हैं एक वो जो बुरा न मानो होली है कहकर आपके घर में घुसकर आपकी शक्ल वॉशिंग मशीन जैसी कर देते हैं, और दूसरे वो जो पूरे साल भले ही न नहाएं, लेकिन होली के दिन पानी बचाओ के ऐसे उपदेश देते हैं जैसे वो सीधे यूनेस्को के ब्रांड एंबेसडर बनकर आए हों।
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होली साल का वो इकलौता दिन है जब इंसान स्वेच्छा से बंदर बनने के लिए तैयार होता है। सुबह-सुबह आप नहा-धोकर, क्रीम लगाकर शीशे में खुद को हैंडसम हंक समझ रहे होते हैं, और तभी दूर से आवाज़ आती है 'होली हैऽऽऽ!'
यह आवाज़ नहीं, बल्कि आपके हुलिए के खिलाफ डेथ वारंट है। इसके बाद जो झुंड आपके घर में घुसता है, वो आपको इंसान नहीं, बल्कि दीवार की पुताई का अधूरा प्रोजेक्ट समझता है। मोहल्ले के गुप्ताजी जी, जो कल तक नमस्कार के जवाब में सिर्फ गर्दन हिलाते थे, आज वो आपको ऐसे गले लगाएंगे जैसे आप उनके बिछड़े हुए कुंभ के मेले वाले भाई हों। और गले लगते समय आपके कान के पीछे जो चांदी वाला पक्का रंग चुपके से रगड़ेंगे, उसका असर दिवाली तक आपके आधार कार्ड की फोटो में भी नज़र आएगा।
होली का असली दर्द वो कॉर्पोरेट कर्मचारी समझता है जिसे सोमवार को ऑफिस जाना है। रविवार को वो अपने दोस्तों से गिड़गिड़ाता है
'भाई, चेहरे पर मत लगाना, कल क्लाइंट मीटिंग है।'
दोस्त कसम खाते हैं
'अरे भाई, बस हल्का सा गुलाल लगाएंगे।'
लेकिन 10 मिनट बाद वो लड़का नीले थोथे में डूबा हुआ मिलता है। नतीजा ये होता है कि सोमवार को ऑफिस में वो अपनी प्रेजेंटेशन कम, और अवतार फिल्म का हीरो ज्यादा लगता है। बॉस पूछता है
'ये चेहरे पर बैंगनी धब्बा कैसा है?'
बेचारा कर्मचारी कहता है
'सर, ये धब्बा नहीं, दोस्तों का प्यार है जो साबुन से भी नहीं हट रहा।'
होली पर गुझिया का अपना अलग स्वैग है। घर की महिलाएं हफ्ते भर से गुझिया ऐसे बनाती हैं जैसे कोई न्यूक्लियर मिसाइल तैयार कर रही हों। लेकिन होली के दिन वही गुझिया जब मेहमानों के सामने आती है, तो मेहमान ऐसे खाते हैं जैसे वो गुझिया नहीं, बल्कि कोहिनूर का हीरा निगल रहे हों। ऊपर से भांग का हल्का सा तड़का! भांग पीने के बाद आदमी को लगता है कि वो स्पाइडरमैन है, बस कमी ये है कि वो जाला नहीं फेंक पाता, सिर्फ सोफे पर पड़ा-पड़ा पंखा गिनता रहता है 'एक पंखा... दो पंखा... साला ये तीसरा पंखा कहां से आया?'
होली पर सफेद कुर्ता पहनने का रिवाज़ वैसा ही है जैसे जलते हुए तवे पर घी डालना। जो आदमी सफेद कुर्ता पहनकर घर से निकलता है, वो असल में पूरी दुनिया को चुनौती दे रहा होता है 'आओ, मुझ पर हमला करो!' घर लौटते समय उस कुर्ते की हालत ऐसी होती है कि उसे देखकर खुद डिटर्जेंट पाउडर बनाने वाली कंपनियां आत्महत्या कर लें। उस कुर्ते को देखकर ये बताना मुश्किल होता है कि ये कुर्ता है या किसी दंगे में बचा हुआ चीथड़ा।
होली का असली संदेश यही है कि साल भर आप चाहे कितने भी बड़े तोप क्यों न हों, होली के दिन आप किसी न किसी के लिए टारगेट ही रहेंगे। इसलिए, इस बार जब कोई बुरा न मानो कहे, तो आप भी बुरा मत मानिए... बस चुपके से उसके पीछे जाकर उसके बालों में वो काला पेंट चिपका दीजिए जो उसने पिछले साल आपके गालों पर लगाया था।
क्योंकि, हिसाब बराबर रहना चाहिए!
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