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Last Modified: बुधवार, 31 अगस्त 2022 (20:10 IST)

गैर हिन्दू दलितों को आरक्षण पर क्या सोचती है भारत सरकार

Supreme court
चारु कार्तिकेय
मुस्लिम और ईसाई दलितों को भी आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं। अदालत ने केंद्र सरकार को इस विषय पर अपनी राय देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।
 
लंबित याचिकाओं में उन दलितों को भी शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का लाभ दिए जाने की मांग की गई है जो हिंदू, बौद्ध और सिख नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस विषय पर राय मांगे जाने के बाद केंद्र सरकार ने समय की मांग की थी, जिसे स्वीकार करते हुए अदालत ने केंद्र को तीन सप्ताह का समय दिया है।
 
मौजूदा व्यवस्था के तहत हिन्दू दलितों के अलावा बौद्ध और सिख दलितों को भी आरक्षण का लाभ मिलता है। दलित अधिकार कार्यकर्ताओं का लंबे समय से कहना रहा है कि मुस्लिम और ईसाई समुदायों में भी दलित होते हैं और उन्हें भी आरक्षण के दायरे में लाया जाना चाहिए।
 
ये वो लोग हैं जिनके पुरखे कभी हिंदू हुआ करते थे और उस समय इनकी पहचान हिंदू दलितों के रूप में थी। बाद में कभी किसी पीढ़ी में उन्होंने अपना धर्म बदलकर इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया। लेकिन हिंदू धर्म छोड़ने के बाद भी वे जाति व्यवस्था से निकल नहीं सके और उनकी सामाजिक पहचान दलित के रूप में ही रही।
 
धर्म बदल लेने के बावजूद शोषित
इस वजह से हिन्दू दलितों की ही तरह बौद्ध, सिख, मुस्लिम और ईसाई दलितों के साथ भेदभाव होता रहा। समाजशास्त्री क्रिस्टॉफ जफ्रेलॉत और फिलिप वर्गीस ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार में हाल ही में छपे एक लेख में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा 2008 में कराए गए एक अध्ययन का हवाला दिया।
 
उन्होंने लिखा कि इस अध्ययन में सामने आया कि 39.6 प्रतिशत दलित मुस्लिम और 30.1 प्रतिशत दलित ईसाई गरीबी रेखा के नीचे हैं, इसलिए दलित अधिकार कार्यकर्ता लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि इन्हें भी आरक्षण का लाभ मिले। कुछ मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि इस वक्त केंद्र सरकार भी इस मांग के मूल्यांकन के लिए एक समिति का गठन करने पर विचार कर रही है।
 
2006 की सच्चर आयोग की रिपोर्ट और 2007 की रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट भी इन तबकों के पिछड़ेपन की गवाही देती हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि मूल रूप से संविधान के तहत सिर्फ हिंदू दलितों को ही आरक्षण मिलता था, लेकिन बाद में संशोधन कर बौद्ध और सिख दलितों को भी आरक्षण के दायरे में ला दिया गया। उनका मानना है कि ऐसा ही मुस्लिम और ईसाई दलितों के लिए भी किया जा सकता है।
 
आरक्षण के अंदर आरक्षण
मामले पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति एसके कॉल ने कहा कि एक तरह से यह आरक्षण के अंदर आरक्षण का सवाल है और ऐसा अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि कानून का प्रश्न यही है कि अब ऐसा अनुसूचित जाती के लोगों के लिए किया जा सकता है या नहीं।
 
केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि मामला सिर्फ कानूनी नहीं है और इसके सामाजिक और दूसरे पहलू भी हैं। इस पर न्यायमूर्ति कॉल ने कहा कि 'सामाजिक परिणामों' की वजह से ये सारे पुराने मामले लंबित हैं और अब इन पर निर्णय लेने का समय आ गया है।
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