प्लास्टिक से भरे महासागरों के लिए कौन जिम्मेदार है?

plastic bottle
पुनः संशोधित शुक्रवार, 2 अगस्त 2019 (11:29 IST)
अच्छी रिसाइक्लिंग यूनिट वाले अमीर देश महासागरों में कचरे के लिए दक्षिणपूर्वी एशिया पर आरोप लगाते हैं। लेकिन पड़ताल करने पर पता चलता है कि आरोप लगाने वाले खुद भी खूब कचरा बहा रहे हैं।
महासागरों में प्लास्टिक के कचरे के लिए कौन जिम्मेदार है? मछलियों और समुद्री जीवन को मार रहे इस कचरे के जिम्मेदार पर अंगुली उठाना इतना आसान नहीं है। अमीर देश, गरीब राष्ट्रों की तुलना में ज्यादा प्लास्टिक बर्बाद करते हैं। जर्मन और अमेरिकी नागरिक, केन्या और भारत के लोगों के मुकाबले 10 गुना ज्यादा प्लास्टिक फेंकते हैं। यूरोप, उत्तरी अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया दक्षिणपूर्वी एशिया में रिसाइक्लिंग के लिए इतना कचरा भेज चुके हैं कि वहां कचरे का अंबार लग गया। इसी साल मलेशिया और वियतनाम ने प्लास्टिक के कचरे के आयात पर रोक लगा दी। चीन 2018 में ही ऐसा कर चुका है।
लेकिन जब महासागरों में कचरे की बात आती है तो कुछ शोध चुनिंदा एशियाई देशों की ओर अंगुली उठाते हैं। जर्मनी के हेल्महोल्स सेंटर ऑफ एनवॉयरंमेंटल रिसर्च के मुताबिक महासागरों में ज्यादातर प्लास्टिक एशिया और अफ्रीका की 10 नदियों से पहुंचता है। जॉर्जिया यूनिवर्सिटी के जैमबेक रिसर्च ग्रुप के शोध में कहा गया है कि प्लास्टिक के जिस कचरे का प्रबंधन नहीं किया जाता है, वह देर सबेर महासागरों तक पहुंच ही जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यूरोप और उत्तर अमेरिका प्लास्टिक कचरे में कितनी कटौती करें।
तो, महासागरों में प्लास्टिक का कचरा किसकी गलती है?

बीयर या सॉफ्ट ड्रिंक के सिक्स पैक के कवर कछुओं को फंसा सकते हैं। शॉपिंग बैग्स व्हेल मछली के पेट में जाकर उन्हें भूखा मार सकते हैं। लेकिन इसके बावजूद हर साल करोड़ों टन प्लास्टिक महासागरों में समाता है।

2017 में प्रकाशित हेल्महोल्स शोध को मीडिया के ज्यादातर हिस्से ने गलत ढंग से प्रसारित किया। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि महासागरों में 90 फीसदी प्लास्टिक एशिया की आठ और अफ्रीका की दो नदियों से पहुंचता है। लेखकों ने सिर्फ नदियों के जरिए समंदर तक पहुंचने वाले प्लास्टिक का अनुमान लगाया। उन्होंने सूनामी या मछली पकड़ने के दौरान फैलने वाले कचरे का आकलन नहीं किया।
महासागरों में मिलने वाला प्लास्टिक का कचरा जमीन से आने वाले कचरे के मुकाबले काफी विविध है। सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के इंस्टीट्यूट फॉर ससटेनेबल फ्यूचर्स के रिसर्चर मॉनिक रेटामल कहते हैं, "जहाजों और समुद्र में गैरकानूनी डंपिंग जैसे ऐसे कई मामले हैं जिनके बारे में हम ज्यादा नहीं जानते हैं।"

जैमबेक शोध 2015 में प्रकाशित हुआ था। उसमें चीन, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम को ही महासागरों में पहुंचने वाले 50 फीसदी प्लास्टिक कचरे के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। कहा गया कि बेहतर रिसाइक्लिंग सिस्टम के चलते यूरोप और उत्तर अमेरिकी देश 5 फीसदी से भी कम प्लास्टिक समंदरों में छोड़ते हैं। रिसाइकिल होने वाले या जलाए जाने वाले कूड़े के अलावा प्लास्टिक का जो कचरा लैंडफिल में भरा जाता है, वो भी लीक होकर नदियों में पहुंच जाता है।
लेकिन जैमबेक रिसर्च ग्रुप की समुद्र विज्ञानी कार्ला लॉ खुद शोध के इन नतीजों को सही नहीं मानती हैं। उनके मुताबिक दूसरे देशों में भेजे जाने वाले कचरे की बात किए बिना किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं होगा।

कचरे का कारोबार

2018 में जब चीन ने प्लास्टिक कचरे के आयात पर रोक लगाई तो दुनिया का रिसाइक्लिंग तंत्र हैरान रह गया। चीन पहले प्लास्टिक के कचरे का सबसे बड़ा आयातक था। चीनी प्रतिबंध के बाद पश्चिम का कूड़ा कहां जाए, यह सवाल खड़ा हो गया। प्लास्टिक का दाम गिरने लगा, लेकिन इसी बीच दक्षिणपूर्वी एशिया की कंपनियों को यह मुनाफे का सौदा लगा। प्लास्टिक की अथाह मात्रा लेने के लिए वे कंपनियां तैयार नहीं थीं, प्रोसेसिंग के प्लांट भी पर्याप्त नहीं थे। लेकिन फिर भी कूड़़ा मंगाया जाने लगा। समस्या बढ़ती देख वहां की सरकारों ने सख्ती शुरू की।
मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस ने आखिरी के दो तीन महीनों में प्लास्टिक के कचरे से लदे दर्जनों जहाज यूरोप और उत्तर अमेरिका वापस भेज दिए। कुछ मामलों में जहाजों पर लदा प्लास्टिक डायपर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी चीजों से दूषित था। उसी बीच दक्षिण पूर्वी एशिया के कई देशों ने प्लास्टिक कचरे को आयात करने के परमिट खारिज भी कर दिए।

कार्ला लॉ के मुताबिक अब वह इस बात की जांच कर रही हैं कि अमेरिका ने कितने कचरे का निर्यात किया और कितना गैरकानूनी ढंग से फेंका। अभी यह साफ नहीं है कि कितना प्लास्टिक समंदरों में पहुंच रहा है। 2010 से 2016 के बीच जब चीन दुनिया का डंपिंग ग्राउंड बना था, तब भी उसने सिर्फ 10 फीसदी प्लास्टिक कचरा ही आयात किया। ब्रसेल्स में ब्यूरो ऑफ इंटरनेशनल रिसाइक्लिंग के डीजी अरनॉड ब्रूनेट के मुताबिक प्लास्टिक का ज्यादातर कचरा वहीं रहता है, जहां वह पैदा हुआ हो।
एक दूसरे पर आरोप

1950 से अब तक प्लास्टिक का उत्पादन 200 गुना बढ़ चुका है। एक अलग शोध में जैमबेक रिसर्च ग्रुप इस नतीजे पर पहुंचा। इसमें से सिर्फ नौ फीसदी प्लास्टिक ही रिसाइक्लिंग के लिए पहुंचता है। बाकी 91 फीसदी प्लास्टिक या तो जला दिया जाता है या फेंक दिया जाता है।

रासायनिक रूप से जटिल संरचना के कारण प्लास्टिक कई सदियों तक जैविक रूप से विघटित नहीं होता है। इसका मतलब साफ है कि पुराने दौर में अमीर देशों ने जो भी प्लास्टिक बनाया वही अक्सर महासागरों में तैरता दिखता है। विशेषज्ञों के मुताबिक डाटा के अभाव के चलते यह सटीक ढंग से नहीं कहा जा सकता कि किन इलाकों से ज्यादा प्लास्टिक सागरों में समा रहा है।
कार्ला लॉ कहती हैं, "मैं इसे एक एक दूसरे पर अंगुली उठाने वाले व्यवहार के रूप में देखती हूं। रिसर्च पेपर प्रकाशित करते समय हमारा सबसे बड़ा डर यही था कि हर कोई ये न कहे कि यह चीन की गलती है, लेकिन फिर से कुछ लोगों ने ऐसा ही कहा।" लॉ ने कहा, "दक्षिणपूर्वी एशिया के देशों के नागरिकों से हमें काफी प्रतिक्रिया मिली, उन्होंने कहा कि शुक्र है कि कोई तो आधारभूत संरचना के अभाव का जिक्र कर रहा है।"
समुद्रों की सफाई में जुटे एक एनजीओ ओसन क्लीनअप फाउंडेशन के मुताबिक अगर प्लास्टिक के कचरे को सही तरीके से ठिकाने नहीं लगाया गया तो 2060 प्लास्टिक के कचरे की मात्रा तीन गुना और बढ़ जाएगी।

अगर सागरों और पर्यावरण को साफ रखना है तो गरीब देशों को रिसाइक्लिंग सेंटर और सुरक्षित लैंडफिल बनाने में निवेश करना होगा। वहीं अमीर देशों में हर घर को कम से कम कचरा पैदा करना होगा। ग्रीनपीस मलेशिया की एक्टिविस्ट हेंग कियाह शुन कहती हैं, "किसी भी देश का इस्तेमाल डपिंग ग्राउंड के तौर पर नहीं होना चाहिए। यह एक वैश्विक समस्या है जिसे हम सबको मिलकर रोकना होगा।"
रिपोर्ट: अजित निरंजन/ओएसजे

 

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