कैसे कम होंगे भारत में मौजूद कचरे के पहाड़

DW| Last Updated: शुक्रवार, 18 जून 2021 (08:29 IST)
रिपोर्ट : अविनाश द्विवेदी

के 2 सबसे बड़े महानगरों दिल्ली और मुंबई में भी कचरा खुले में फेंका जाता है। दिल्ली का गाजीपुर और मुंबई का मुलुंड डंपिंग ग्राउंड ऐसे इलाके हैं, जहां कचरे के ऊंचे पहाड़ बन चुके हैं और जिनके आसपास लोग भी रहते हैं।
भारत से हर साल 277 अरब किलो कचरा निकलता है यानी प्रति व्यक्ति करीब 205 किलो कचरा। इसमें से 70 प्रतिशत ही इकट्ठा किया जाता है, बाकी जमीन और पानी में फैला रहता है। इकट्ठा किए गए कचरे में से भी आधा या तो खुले में फेंक दिया जाता है या जमीन में दबा दिया जाता है। और कुल कचरे के सिर्फ 5वें हिस्से की रिसाइकलिंग हो पाती है। वे शहर जिनमें कचरे को खुले में फेंका जा रहा है, उनमें भारत के 2 सबसे बड़े महानगर दिल्ली और मुंबई भी शामिल हैं। दिल्ली का गाजीपुर और मुंबई मुलुंड डंपिंग ग्राउंड ऐसे इलाके हैं, जहां ऊंचे-ऊंचे कचरे के पहाड़ बन चुके हैं और इनके आसपास लोग भी रहते हैं। जिनके स्वास्थ्य पर इस कचरे का बुरा असर होता है।
भारत से निकलने वाला कचरा मुख्यत: 2 तरह का है, इंडस्ट्रियल और म्युनिसिपल। इंडस्ट्रियल कचरे के निपटान की जिम्मेदारी जहां उद्योगों पर ही है, म्युनिसिपल कचरे की जिम्मेदारी स्थानीय सरकारों की होती है। उन्हें शहरी इलाकों को साफ रखना होता है हालांकि ज्यादातर म्युनिसिपल अथॉरिटी कचरे को इकट्ठा तो करती हैं लेकिन फिर उसे आबादी के आसपास ही किसी डंपिंग ग्राउंड में फेंक देती हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के स्कूल ऑफ एनवायरमेंटल साइंसेस की एक स्टडी के मुताबिक खुले में फेंके गए कचरे में भारी मात्रा में निकल, जिंक, आर्सेनिक, कांच, क्रोमियम और अन्य जहरीली धातुएं होती हैं, जो और लोगों के लिए गंभीर खतरों की वजह बनती हैं। भारत सालभर में जितनी जहरीली का उत्सर्जन करता है, उसमें से 20 प्रतिशत सिर्फ इन कचरे के ढ़ेरों से होता है।
असली समस्या मिला-जुला कचरा

भारत में भारी मात्रा में कचरे के रिसाइकल न हो पाने और इसे खुले में फेंके जाने की वजह मिला-जुला कचरा भी होता है। नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट सेंटर के हेड साइंटिस्ट डॉ. सुनील कुमार कहते हैं कि असल समस्या कचरा नहीं बल्कि मिक्स कचरा है। यानी ऐसा कचरा जिसमें सब्जियों-फलों के छिलके, कागज, प्लास्टिक, धातुएं, शीशा और इलेक्ट्रिक कूड़ा यह सब मिला हुआ हो। ऐसे कूड़े का निपटान बहुत मुश्किल होता है। अगर यह कूड़ा अलग-अलग हो तो इसका निपटान सरकारी और प्राइवेट दोनों ही चैनल से किया जा सकता हैं। डॉ. सुनील कुमार का इशारा उन सरकारी और प्राइवेट यूनिट की ओर है जिनमें कचरे को रिसाइकल किया जाता है।
भारत में लंबे समय से कचरे को प्राइवेट यूनिट के जरिए रिसाइकल किया जा रहा है। कबाड़वाले घरों से पुराने अखबार, प्लास्टिक-कांच की बोतलें और धातुएं कुछ दाम देकर ले जाते हैं जिसे वे प्राइवेट रिसाइक्लिंग यूनिटों को बेच देते हैं। जहां इन्हें फिर से काम में आने लायक चीजों में बदल दिया जाता है। हालांकि भारत में असंगठित प्राइवेट सेक्टर में जिस तरह रिसाइक्लिंग होती है, उससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान होता है बल्कि इसमें लगे कामगारों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर होता है। डॉ. सुनील कुमार भी मानते हैं कि ऐसी ज्यादातर प्राइवेट यूनिट में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। यहां कामगारों को न ही गम बूट दिए जाते हैं और न ही ग्लव्स और मास्क जिससे कई तरह की गंदगी और रासायनिक कचरे के संपर्क में आने से उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती हैं। डॉ. सुनील कुमार भी कहते हैं कि सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि प्राइवेट यूनिट में रिसाइकलिंग अब सुरक्षित हुई है लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ नहीं है।
सिर्फ 1 प्रतिशत ई-कचरा होता है रिसाइकल

दिल्ली जैसे शहरों से कितना कचरा निकलता है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यूपी के कई जिलों में ऐसी यूनिट हैं जिनमें दिल्ली से लाकर कचरा रिसाइकल होता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में प्लास्टिक कचरे को रिसाइकल करने वाली प्राइवेट यूनिट के ठेकेदार ने बताया कि रिसाइक्लिंग से बहुत कम मुनाफा होता है। इसलिए सभी कामगारों के लिए सेफ्टी किट का इंतजाम करना महंगा पड़ता है। ठेकेदार ने यह भी बताया कि वे ज्यादातर प्लास्टिक कचरा दिल्ली से मंगाते हैं जिसे कानपुर में रिसाइकल किया जाता है। नेशनल सॉलिड वेस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. अमिय कुमार साहू कहते हैं कि सरकार भी अब कचरे के निपटान के लिए प्राइवेट सेक्टर से मदद ले रही है, जो अच्छी बात है। मुझे आशा है इससे कचरे के पहाड़ और ऊंचे नहीं होंगे।

अब इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए सरकार उद्योगों की भी जिम्मेदारी तय कर रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले समय में सोलर पैनल, बैटरी गाड़ियों, मोबाइल और लैपटॉप का जो भारी ई-कचरा बढ़ने वाला है, उसके निपटान की जिम्मेदारी इन वस्तुओं का उत्पादन करने वाली कंपनियों की ही होगी। लेकिन अब भी भारत के पूरे कचरा प्रबंधन को देखा जाए तो हम इंडस्ट्रियल और म्युनिसिपल दोनों ही सेक्टर में अन्य देशों से बहुत पीछे हैं। दरअसल अब भी भारत में कुल ई-कचरे का सिर्फ 1-2% ठीक से रिसाइकल हो पाता है। बाकी सारा ई-कचरा असंगठित क्षेत्र में चला जाता है, जहां स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक इस कचरे की रिसाइक्लिंग भी प्लास्टिक कचरे की तरह ही होती है। हालांकि डॉ. अमिय कुमार साहू मानते हैं कि भारत में कचरे से जुड़े ज्यादातर आंकड़े सही नहीं हैं क्योंकि इन्हें केंद्रीय स्तर पर इकट्ठा नहीं किया गया है।
जागरुकता और विज्ञान हैं कचरे का इलाज

तो क्या भारत में कचरे के पहाड़ ऊंचाई में लगातार बढ़ते रहेंगे और लोग इनके आस-पास रहने को मजबूर रहेंगे। इस सवाल के जवाब में डॉ. सुनील कुमार कहते हैं कि ऐसा नहीं है लेकिन कचरे का प्रबंधन हमारे घरों से ही शुरू हो जाता है। सबसे पहले लोगों को अलग-अलग कचरा अलग-अलग डस्टबिन में रखने के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। जिससे इसकी रिसाइक्लिंग आसान हो सके। डॉ. अमिय कुमार साहू कहते हैं कि भारत में लोगों को ऑर्गेनिक, प्लास्टिक और धातु के कचरे को तीन-चार अलग-अलग डस्टबिन में रखने के लिए तैयार करना अभी मुश्किल है। उन्हें अभी गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग रखने के बारे में जागरुक किया जा रहा है, जो काफी है। और इसे लेकर सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के बाद लोगों में काफी जागरुकता आई है।
डॉ. सुनील कुमार यह भी बताते हैं कि लैंड फिल माइनिंग और बायोसेल डेवलपमेंट 2 कारगर वैज्ञानिक तरीके हैं, जिनसे कचरे के पहाड़ों को भी कम किया जा सकता है। लैंड फिल माइनिंग में कचरे की खुदाई कर उसे अलग-अलग कर लिया जाता है, यानी प्लास्टिक अलग, धातुएं अलग, कागज अलग और शीशा अलग। इसके बाद उन्हें वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में भेज दिया जाता है। जहां अलग-अलग चीजों को उनके लिए निर्धारित अलग-अलग रिसाइकल प्रक्रिया से गुजारा जाता है, वहीं बायोसेल डेवलपमेंट में अलग-अलग एंजाइम का प्रयोग कर कचरे को गलाकर खत्म किया जाता है। वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक 2030 तक भारत में हर साल निकलने वाला कचरा बढ़कर 388 अरब किलो हो जाने का अनुमान है। कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि भारत में कचरे को ऊर्जा के स्रोत के तौर पर भी देखा जाना चाहिए ताकि इससे डरने के बजाए इसका प्रयोग वैज्ञानिक प्रक्रिया से बिजली आदि बनाने में किया जा सके।



और भी पढ़ें :