पढ़ें, चीनी अर्थव्यवस्था का भारत पर असर कितना?

दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में अमेरिका और यूरोप का बड़ा योगदान है। इनका ज्यादातर मैन्यूफैक्चरिंग का काम चीन और के हिस्से में आता है। पिछले कुछ समय से पश्चिमी देशों ने चीन को दिए जाने वाले काम में कटौती की है। इसकी जो वजह सामने आई वह थी दोनों देशों में निर्माण को लेकर भिन्नता। चीन द्वारा निर्माण के लिए रोबोटिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है जोकि भारतीय मजदूरों की तुलना में काफी महंगा पड़ता है। यही वजह है कि भारत पर निर्माण को लेकर भरोसा दिखाया जा रहा है।

आंकड़े क्या कहते हैं ? :
चीन का विदेशी व्यापार 9.7 फीसदी घटकर करीब 320.8 अरब डॉलर हो चुका है, इस दौरान उसके विदेशी मुद्रा भंडार में 93.9 अरब डॉलर की कमी आई। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि जहां निर्यात 6.1 फीसदी घटकर 1200 अरब युआन रहा वहीं आयात 14.3 फीसदी घटकर 836.1 अरब युआन रहा। वहीं आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक 25 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत की विदेशी मुद्रा संपत्ति में 1.98 अरब डॉलर की कमी आई है। दोनों देशों की एक सी स्थिति इस बात को बल देती है कि चीन की तरह भारत के हालात भी बद से बदतर हो सकते हैं।
दोनों की अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंतर :
भारत की अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर की है और चीन की 9 ट्रिलियन डालर से ज्यादा की समझी जाती है। चीन उत्पादन का 50 फीसदी से ज्यादा निर्यात करता है जबकि भारत का मार्केट घरेलू (डोमेस्टिक) है। चीन के उत्पाद विदेशी मांग पर निर्भर करते हैं, वहीं भारतीय उत्पाद की ज्यादातर खपत देश में ही होती है।
कुछ और तथ्य, जोकि बहुत अहम हैं :

* चीन की बेहतर होती आर्थिक स्थिति भारत के लिए सकारात्मक है, किंतु उसकी गिरती आर्थिक स्थिति किसी भी तरह से भारत के खिलाफ नहीं है। दरअसल भारत, चीन को ज्यादा निर्यात नहीं करता। भारत के कुल निर्यात का 10 फीसदी ही चीन को जाता है, जो कि सुखद संदेश है। दूसरे एशियाई देश ज्यादातर निर्यात के लिए चीन पर निर्भर हैं, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है।
* चीन की हालत देखकर विदेशी कंपनियां भारत से भी वापस ले सकती हैं या मैन्यूफैक्चरिंग बंद करवा सकती हैं। इससे शेयर बाजार लुढ़केगा और रुपए की कीमत कम होगी। लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि चीन की गिरती जीडीपी और भारत की बढ़ती जीडीपी पश्चिमी देशों में भारत के प्रति अच्छा नजरिया विकसित कर रही हैं। कोई भी देश ऐसे बाजार में निवेश करके उसका हिस्सा बनना चाहेगा, जिसका भविष्य उज्जवल नजर आ रहा हो। संभवत: इसी कारण से चीन और अमेरिका बड़े उद्यम भी भारत में निवेश करना चाहते हैं।

* चीन कमोडिटी में मेटल जैसी चीजों पर वर्चस्व रखता है। अगर उसके दाम गिरेंगे तो भारत के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि भारत स्टील का बड़ा उत्पादक है और मेटल उसकी आधारभूत जरूरत है।

* अमेरिका-ईरान संधि के बाद कच्चे तेल के गिरते दाम चीन के लिए घाटे का सौदा है, जबकि कच्चा तेल जितना सस्ता होगा, भारत उतने फायदे में रहेगा।

* 2009 में आई भयावह मंदी से जहां चीन समेत दुनिया के बड़े देश बुरी तरह से प्रभावित हुए थे, वहीं भारत पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ा था। उल्टे रूस और ब्राजील में मंदी के समय भारत की आर्थिक ग्रोथ लगातार बढ़ी ही है।
* विश्व बैंक के मुताबिक चीन की जीडीपी 2016 में गिरकर 6.3 तक पहुंचने की उम्मीद है, जबकि भारत की बढ़कर 8.1 फीसदी रहने की निश्चितता है। इससे अमेरिका सहित दूसरे देशों में भारत के प्रति भरोसा बढ़ा है।

* विश्व बैंक ने भारत की अर्थव्यवस्था को अगले तीन साल तक दुनिया में सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था रहने का अनुमान लगाया है। चीन और भारत के बीच विकास दर के बीच का अंतर डेढ़ फीसदी से ज्यादा रह सकता है।
* विश्व बैंक ने अपनी ताजा आर्थिक संभावना रिपोर्ट में कहा है कि 2016 में भारत की विकास दर 7.8 फीसदी रहने की उम्मीद है जबकि 2017 और 2018 में भारत की विकास गति 7.9 फीसदी रह सकती है। हालांकि जून 2015 में किए गए अनुमान में सुधार करते हुए विश्व बैंक ने 2015 में भारत की विकास गति को 7.5 फीसदी से घटाकर 7.3 फीसदी कर दिया है।

* विश्व बैंक के मुताबिक 2015 में चीन की विकास दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि 2017 और 2018 में चीन की अर्थव्यवस्था और धीमी होकर 6.5 फीसदी की दर से विकास करेगी। ब्रिक्स देशों में चीन और भारत को छोड़कर बाकी देशों के लिए मुश्किल हालात बने हुए हैं। रूस की अर्थव्यवस्था को 0.7 फीसदी से सिकुड़ने का अनुमान जताया गया है जबकि ब्राजील की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा ढाई फीसदी की सिकुड़न का अंदाजा लगाया गया है।
भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती बने रहने की वजह बताते हुए विश्व बैंक ने कहा है, 'दुनिया की बाकी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में, भारत छोटी अवधि की विपरीत परिस्थितियों और वैश्विक उतार-चढ़ाव के लिए अच्छी तरह से तैयार है। बाहरी मुश्किलों से कम प्रभावित रहना और सहायक नीतिगत माहौल के साथ घरेलू कारोबार की मजबूती के चलते भारत मजबूत दिख रहा है।'



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