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पढ़ें, चीनी अर्थव्यवस्था का भारत पर असर कितना?

अगर हमें भारत, चीन और दुनिया के अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के हालात के बारे में थोड़े समय में ही बहुत कुछ जानना हो तो पहले कुछ इन तथ्यों पर गौर कर लें। चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले 25 साल में पहली बार सात प्रतिशत से नीचे फिसलकर 2015 में 6.9 प्रतिशत रही। इससे विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य और इसके निवेशकों पर असर के संबंध में वैश्विक चिंता पैदा हो गई है।
 
यह साम्यवादी देश इस समय मुश्किल आर्थिक सुधार के दौर से गुजर रहा है। वहीं भारतीय अर्थव्यवस्‍था की मजबूती के संकेत को इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि चीनी अरबपति वांग जियानलिन भारत में बड़ा निवेश करने जा रहे हैं। वांग का वांडा ग्रुप भारत में इंडस्ट्रियल पार्क बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट पर वांडा ग्रुप करीब 10 अरब डॉलर (करीब 67 हजार 578 करोड़ रुपए) खर्च करेगा। यह भारत के सबसे बड़े डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में एक होगा।
 
दूसरी बड़ी खबर है कि अमेरिका के टेक जाइंट एप्पल की आईफोन की बिक्री 2007 से लेकर अब तक सबसे सुस्त है। हालांकि प्रौद्योगिकी क्षेत्र की इस प्रमुख कंपनी ने रिकॉर्ड तिमाही मुनाफा दर्ज किया है। एप्पल का मुनाफा 26 दिसंबर को समाप्त तिमाही के दौरान दो प्रतिशत बढ़ा जो पिछले साल की तिमाही में 18.4 अरब डॉलर था जबकि आय भी दो प्रतिशत बढ़कर 75.9 अरब डॉलर रही। लेकिन एप्पल के शेयरों में इस चिंता के बीच पिछले साल से 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टिम कुक का कहना है कि बिक्री बढ़कर मुनाफा कमाने के लिए कंपनी भारत जैसे बाजारों पर ध्यान केन्द्रित करेगी। 
 
एक तरफ जहां दुनिया की अर्थव्यवस्था मंदी के दरवाजे पर खड़ी है, भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रही है। ग्लोबल परामर्श कंपनी पीडब्ल्यूसी (प्राइस वाटरहाउस कूपर्स) की ताजा रिपोर्ट में कहा गया गया है कि चालू वर्ष 2016 में उभरते बाजार वाली अर्थव्यवस्थाओं में भारत सबसे शानदार प्रदर्शन करने वाला देश होगा।
 
पीडब्ल्यूसी ने कहा है कि भारत इस वर्ष 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करेगा, जो लगातार दूसरे साल चीन की आर्थिक वृद्धि से अधिक होगी। पीडब्ल्यूसी ने अपनी रिपोर्ट में जिन सात उभरती अर्थव्यवस्थाओं का जिक्र किया है उनमें भारत के अलावा चीन, रूस, ब्राजील, मेक्सिको, इंडोनेशिया और तुर्की है। इस रिपोर्ट में चीन के बारे में कहा गया है कि उसकी अर्थव्यवस्था में नरमी आएगी, जबकि ब्राजील और रूस की अर्थव्यवस्था में संकुचन आएगा।
 
अगले पन्ने पर... क्या मंदी के द्वार पर खड़ी है दुनिया...

खास बात यह है कि पीडब्ल्यूसी ने सात विकसित देशों-अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा की अर्थव्यवस्थाओं के बारे में कहा है कि 2010 के बाद से अब पहली बार इनमें वृद्धि की उम्मीद है।
 
हालांकि ग्लोबल वित्तीय फर्म मोर्गन स्टेनले की आशंका है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था 2008 की तरह एक बार फिर मंदी के द्वार पर खड़ी है। अपनी शंका के पक्ष में कंपनी तर्क भी देती है कि हर आठ साल में एक बार मंदी का चक्र लौटता है, चीन की हालत खस्ता है, दुनिया भर में कमोडिटी व जिंसों की कीमतें स्थिर हैं या गिर रही हैं, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेड रिजर्व ब्याज दर बढ़ाने की हालत में नहीं है।
 
संयुक्त राष्ट्र की इकाई खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने भी अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2015 में खाने-पीने की चाजों के दाम 19 फीसदी गिरे हैं। खपत में कमी आना और मुद्रास्फीति का उम्मीद से ज्यादा गिरना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जाता है। इससे मोर्गन स्टेनले की शंकाओं को बल मिलता है। चीन को भी देखें तो पिछले एक साल में उसकी अर्थव्यवस्था का बुलबुला फटा है, जिसके चलते उसे अपनी मुद्रा युआन का बार-बार अवमूल्यन करना पड़ा है। फिर भी उसका निर्यात पटरी पर नहीं लौट रहा है। चीन आर्थिक मोर्चे पर मांग की व्यापक सुस्ती झेल रहा है।
 
ऐसे में अगर पीडब्ल्यूसी भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक रिपोर्ट दे रहा है और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जो खुद वित्तमंत्री रह चुके हैं, कह रहे हैं कि देश तेजी से विकास कर रहा है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था और मोदी सरकार के लिए सुकून देने वाली बात है। भारत के मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने की वजह भी है।
 
अगले पन्ने पर... धीमी पड़ रही है चीनी अर्थव्यवस्था... 

वहीं चीन की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है, यह स्थिति काफी समय से दिख रही थी, यही बात 2015 की विकास दर से जाहिर होती है। पिछले साल चीन की विकास दर 6.9 प्रतिशत रही, जो पिछले 25 वर्षों में सबसे कम है। इस खबर पर एक प्रतिक्रिया तो यह है कि चीन की अर्थव्यवस्था का संकट गहरा रहा है और दुनिया को इसके नतीजों के लिए तैयार रहना चाहिए। दूसरी ओर दावा किया जा रहा है कि उसकी अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा संकट नहीं है।
 
पर चीन अब निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था से सेवा आधारित अर्थव्यवस्था में बदल रही है, इसलिए उसकी विकास दर का घटना स्वाभाविक है। चीन की सरकार ने सात प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया था और 6.9 प्रतिशत अनुमान से बहुत कम नहीं है। चीन लगभग पिछले दो दशक से 10 प्रतिशत से ज्यादा की दर से विकास करते हुए दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। लंबे दौर तक चीन में हो रहे निर्माण और उत्पादन से दुनिया भर में कच्चे माल की कीमत ऊंची बनी रही और चीनी सामान से दुनिया भर के बाजार पटे रहे। 
 
अब वहां की अर्थव्यवस्था के सुस्त होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मंदी का आलम है। जो अर्थव्यवस्थाएं चीन को कच्चे माल के निर्यात पर निर्भर थीं, वे इसका असर महसूस कर रही हैं। विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम 2015 के मुकाबले एक तिहाई से भी नीचे आ गए हैं और इसमें चीन में उनकी खपत घटने की बड़ी भूमिका है।
 
जो विश्लेषक मानते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था गहन संकट में है, उनका कहना है कि सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें, चीन की अर्थव्यवस्था की असली विकास दर चार-पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। दूसरी बात यह है कि चीन की राजनीतिक व्यवस्था उदार लोकतांत्रिक नहीं है, वहां कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार है, जो बजाय आर्थिक यथार्थ को स्वीकार करने के, अब भी अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। जब चीन में शेयर बाजार गिरने लगा, तो सरकार ने शेयर बाजार में खरीद-फरोख्त पर नियंत्रण लगाकर और खुद बड़े पैमाने पर पैसा झोंककर उसे बचाने की कोशिश की, आखिर में उसे ये कोशिशें छोड़नी पड़ीं। 
 
विदित हो कि चीनी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ भी बहुत ज्यादा हो गया है। सरकार ने पैसा डालकर अर्थव्यवस्था को तेज बनाए रखने के जो उपाय किए, उससे कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 150 प्रतिशत से बढ़कर 250 प्रतिशत हो गया, लेकिन अब भी सरकार इस नीति को छोड़ नहीं रही है। यह एक कटु सत्य है कि 2015 में चीन में आर्थिक क्षेत्र को दिए गए कर्ज की मात्रा अब तक की सबसे ज्यादा रही है। चीन में तमाम औद्योगिक क्षेत्र अतिरिक्त क्षमता और कम मांग के खतरे को झेल रहे हैं। कई क्षेत्रों में उत्पादन कम करने के लिए योजनाबद्ध उपाय किए जा रहे हैं। इस वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग नहीं है और घरेलू बाजार में भी मांग बढ़ नहीं रही है। ऐसे में, चीन सरकार अपने उत्पादों को सस्ता करने के लिए लगातार अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर रही है, जिसका बुरा असर अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है।
 
चीन की अर्थव्यवस्था पर कड़े सरकारी नियंत्रण की वजह से बाजार के नियमों व पारदर्शिता का ख्याल नहीं रखा गया और इस वजह से अर्थव्यवस्था में जो संतुलन किसी सामान्य बाजार अर्थव्यवस्था में आना चाहिए था, वह नहीं आ पाया। इसका दुनिया पर इतना असर है कि कुछ जानकार यह मान रहे हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था का संकट वैश्विक मंदी ला सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था से सबसे कम प्रभावित हुई है, लेकिन अगर दुनिया की अर्थव्यवस्था को झटका लगता है, तो भारत भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।
 
चीन की आर्थिक सुस्ती से उपजा दर्द... अगले पन्ने पर...

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि चीन की आर्थिक सुस्ती से उपजा दर्द भारत का भी दर्द है। उनका यह कथन सरकार के दावे के बिल्कुल उलट है। सरकार कहती रही है कि चीन की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती का असर भारत पर नहीं पड़ेगा। लेकिन राजन ने साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट को दिए साक्षात्कार में कहा, 'चीनी अर्थव्यवस्था में छाई सुस्ती पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात है। चीन को होने वाले हमारे निर्यात में कुछ की मांग कम हुई है। लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर भी कई देश हैं जो चीन को उतना निर्यात नहीं कर पा रहे हैं, जितना वह करते रहे हैं और इसलिए वह हमसे भी खरीददारी कम कर रहे हैं।'
 
आरबीआई गवर्नर का कहना है, 'भारत उपभोक्ता जिंस का आयातक देश है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंस के दाम घटने से उसे मदद मिली है, इसलिए इस समय जितना असर हो सकता था, वह नहीं है। फिर भी कुल मिलाकर चीन की आर्थिक सुस्ती से हम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। क्योंकि चीन की सुस्ती का असर वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर पड़ा है और भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
 
हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले महीने कोलंबिया विश्वविद्यालय में जुटे छात्रों से कहा था कि भारत पर मंदी का कोई असर नहीं पड़ा है। भारत, चीन की आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि चीन की सुस्ती को देखते हुए भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 'अतिरिक्त सहारा' बन सकता है। भारत की तरफ से हाल में चीन की अर्थव्यवस्था पर की गई कुछ टिप्पणियों की चीनी मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया हुई। भारत में कहा गया कि चीन का आर्थिक दर्द भारत के लिए अवसर है।
 
गौरतलब है कि राजन पिछले दिनों हांगकांग में थे, जहां उन्हें हांगकांग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। अपने साक्षात्कार में राजन ने भारत और चीन के बीच बढ़ती आपसी निर्भरता का भी जिक्र किया था। राजन ने कहा, 'प्रधानमंत्री ने पड़ोसियों के साथ संबंध सुधारने के लिए स्पष्ट मार्ग प्रशस्त किया है। पारंपरिक तौर पर पश्चिम पर ध्यान देने की बजाय अब पूर्व की ओर ज्यादा ध्यान है। चाहे एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक हो या फिर चीन की रेशम मार्ग पहल हो, हमारी चीन और चीनी परियोजनाओं के साथ अधिक भागीदारी होगी। इससे क्षेत्र में जुड़ने और विस्तार करने में चीन का भी हित होगा।'
 
राजन ने उम्मीद जताई कि भारत आर्थिक मार्ग के बारे में चीन से सबक लेगा। हमें चीन की विनिर्माण क्षेत्र की सफलता से सीखना चाहिए। चीन ने किस प्रकार अपना ढांचागत विकास किया, किस प्रकार चीन ने ग्रामीण क्षेत्र में उद्यम को प्रोत्साहन दिया और किस प्रकार चीन ने इतनी बड़ी मात्रा में एफडीआई को व्यवस्थित किया। कई भारतीय व्यवसायी जो चीन जाते रहते हैं, वह बेहतर अनुभव के साथ लौटते हैं और बताते हैं कि किस प्रकार चीन में भारत से बेहतर काम होता है।
 
आरबीआई गवर्नर ने हालांकि यह भी कहा, हमें आंख बंद कर चीन द्वारा अपनाए गए रास्ते पर नहीं चलना चाहिए क्योंकि उसने भी कुछ शर्तों में बदलाव किया है। हमें यह देखना होगा कि किस रास्ते पर हमें चलना है, ताकि दोनों के लिए यह बेहतर हो। उदाहरण के तौर पर क्या यह ठीक रहेगा कि जिन क्षेत्रों में पहले ही चीन की विशेषज्ञता है, भारत को भी उन्हें क्षेत्रों में बढ़ना चाहिए? कुछ मामलों में दोनों के लिए गुंजाइश है, लेकिन कुछ में यह नहीं हो सकती है।
 
राजन ने इन दावों को खारिज किया कि चीन की मुद्रा युआन का अवमूल्यन कर बीजिंग ने मुद्रा के क्षेत्र में युद्ध छेड़ दिया है। उन्होंने युआन की विश्व बाजार में बड़ी भूमिका पर भी जोर दिया। अब सवाल किया जा सकता है कि चीन से कई कदम पीछे खड़ा भारत उसकी गिरती अर्थव्यवस्था के प्रभाव से खुद को बचा पाएगा? इस सवाल पर जानकारों के अलग-अलग उत्तर हैं।
 
उनका कहना है कि लगातार पांचवें महीने की गिरावट के साथ चीन में अक्टूबर महीने तक अर्थव्यवस्था 3400 अरब डॉलर तक आ पहुंची है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माने जाने वाला चीन लगातार आर्थिक नरमी से जूझ रहा है। दहाई के अंक से खिसकते-खिसकते अक्टूबर में उसकी वृद्धि दर करीब 6.9 फीसदी तक गिर चुकी थी, जबकि जानकार उसके 2016 तक 6.3 तक के आंकड़े को छूने की बात कह रहे हैं। कहा जा रहा है कि चीन की लुढ़कती अर्थव्यवस्था का सीधा असर एशियाई देशों पर पड़ेगा। चूंकि भारत उनमें अग्रिम पंक्ति में खड़ा है, इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था इसका सीधा शिकार हो सकती है।
 
वहीं दूसरी ओर आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि देश में 350 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो कि किसी भी राष्ट्र के लिए मजबूत स्थिति मानी जाती है। साथ ही पिछले दिनों गिरते शेयर बाजार ने भी अचानक तेजी पकड़ी और शुक्रवार को 27470 के अंक पर बंद हुआ। फिर इस विवाद की वजह क्या है, क्या सचमुच चीनी अर्थव्यवस्था का असर दूसरे एशियाई देशों के साथ भारत पर पड़ेगा।
 
इस मामले में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) चीन की अर्थव्यवस्था में आई तेज गिरावट का नकारात्मक असर केवल विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर ही नहीं बल्कि शेष एशिया प्रशांत क्षेत्र में भी काफी हद तक पड़ेगा। इसका मुख्य कारण सुधारों को पूर्णत: लागू करने में मिली रही असफलता या लगातार वित्तीय झटकों के कारण हो सकता है, जो घरेलू वित्तीय नुकसान के नियंत्रण से बाहर हैं।
 
लेकिन, इस सवाल पर केन्द्रीय बैंक (आरबीआई) का दावा है कि शेयरों और रुपए में भारी गिरावट के बीच भी भारत की आर्थिक स्थिति अन्य देशों की तुलना में काफी मजबूत है। ऐसे में डरने की जरूरत नहीं है। यहां की अर्थ कारक नीतियों ने अर्थव्यवस्था को बेहतर स्थिति में और सुरक्षित बनाए रखा है। इसके अलावा भारत के पास जितना विदेशी भंडार है वह एक लंबे समय तक सघर्ष से निपटने के लिए काफी है।
 
दोनों अर्थव्यवस्थाओं का अंतर... अगले पन्ने पर... 

दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में अमेरिका और यूरोप का बड़ा योगदान है। इनका ज्यादातर मैन्यूफैक्चरिंग का काम चीन और भारत के हिस्से में आता है। पिछले कुछ समय से पश्चिमी देशों ने चीन को दिए जाने वाले काम में कटौती की है। इसकी जो वजह सामने आई वह थी दोनों देशों में निर्माण को लेकर भिन्नता। चीन द्वारा निर्माण के लिए रोबोटिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है जोकि भारतीय मजदूरों की तुलना में काफी महंगा पड़ता है। यही वजह है कि भारत पर निर्माण को लेकर भरोसा दिखाया जा रहा है।
 
आंकड़े क्या कहते हैं ? : चीन का विदेशी व्यापार 9.7 फीसदी घटकर करीब 320.8 अरब डॉलर हो चुका है, इस दौरान उसके विदेशी मुद्रा भंडार में 93.9 अरब डॉलर की कमी आई। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि जहां निर्यात 6.1 फीसदी घटकर 1200 अरब युआन रहा वहीं आयात 14.3 फीसदी घटकर 836.1 अरब युआन रहा। वहीं आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक 25 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत की विदेशी मुद्रा संपत्ति में 1.98 अरब डॉलर की कमी आई है। दोनों देशों की एक सी स्थिति इस बात को बल देती है कि चीन की तरह भारत के हालात भी बद से बदतर हो सकते हैं।
 
दोनों की अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंतर : भारत की अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर की है और चीन की 9 ट्रिलियन डालर से ज्यादा की समझी जाती है। चीन उत्पादन का 50 फीसदी से ज्यादा निर्यात करता है जबकि भारत का मार्केट घरेलू (डोमेस्टिक) है। चीन के उत्पाद विदेशी मांग पर निर्भर करते हैं, वहीं भारतीय उत्पाद की ज्यादातर खपत देश में ही होती है।
 
कुछ और तथ्य, जोकि बहुत अहम हैं : 
 
* चीन की बेहतर होती आर्थिक स्थिति भारत के लिए सकारात्मक है, किंतु उसकी गिरती आर्थिक स्थिति किसी भी तरह से भारत के खिलाफ नहीं है। दरअसल भारत, चीन को ज्यादा निर्यात नहीं करता। भारत के कुल निर्यात का 10 फीसदी ही चीन को जाता है, जो कि सुखद संदेश है। दूसरे एशियाई देश ज्यादातर निर्यात के लिए चीन पर निर्भर हैं, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है।
 
* चीन की हालत देखकर विदेशी कंपनियां भारत से भी निवेश वापस ले सकती हैं या मैन्यूफैक्चरिंग बंद करवा सकती हैं। इससे शेयर बाजार लुढ़केगा और रुपए की कीमत कम होगी। लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि चीन की गिरती जीडीपी और भारत की बढ़ती जीडीपी पश्चिमी देशों में भारत के प्रति अच्छा नजरिया विकसित कर रही हैं। कोई भी देश ऐसे बाजार में निवेश करके उसका हिस्सा बनना चाहेगा, जिसका भविष्य उज्जवल नजर आ रहा हो। संभवत: इसी कारण से चीन और अमेरिका बड़े उद्यम भी भारत में निवेश करना चाहते हैं। 
 
* चीन कमोडिटी में मेटल जैसी चीजों पर वर्चस्व रखता है। अगर उसके दाम गिरेंगे तो भारत के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि भारत स्टील का बड़ा उत्पादक है और मेटल उसकी आधारभूत जरूरत है।
 
* अमेरिका-ईरान संधि के बाद कच्चे तेल के गिरते दाम चीन के लिए घाटे का सौदा है, जबकि कच्चा तेल जितना सस्ता होगा, भारत उतने फायदे में रहेगा।
 
* 2009 में आई भयावह मंदी से जहां चीन समेत दुनिया के बड़े देश बुरी तरह से प्रभावित हुए थे, वहीं भारत पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ा था। उल्टे रूस और ब्राजील में मंदी के समय भारत की आर्थिक ग्रोथ लगातार बढ़ी ही है।
 
* विश्व बैंक के मुताबिक चीन की जीडीपी 2016 में गिरकर 6.3 तक पहुंचने की उम्मीद है, जबकि भारत की बढ़कर 8.1 फीसदी रहने की निश्चितता है। इससे अमेरिका सहित दूसरे देशों में भारत के प्रति भरोसा बढ़ा है।
 
* विश्व बैंक ने भारत की अर्थव्यवस्था को अगले तीन साल तक दुनिया में सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था रहने का अनुमान लगाया है। चीन और भारत के बीच विकास दर के बीच का अंतर डेढ़ फीसदी से ज्यादा रह सकता है।
 
* विश्व बैंक ने अपनी ताजा आर्थिक संभावना रिपोर्ट में कहा है कि 2016 में भारत की विकास दर 7.8 फीसदी रहने की उम्मीद है जबकि 2017 और 2018 में भारत की विकास गति 7.9 फीसदी रह सकती है। हालांकि जून 2015 में किए गए अनुमान में सुधार करते हुए विश्व बैंक ने 2015 में भारत की विकास गति को 7.5 फीसदी से घटाकर 7.3 फीसदी कर दिया है।
 
* विश्व बैंक के मुताबिक 2015 में चीन की विकास दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि 2017 और 2018 में चीन की अर्थव्यवस्था और धीमी होकर 6.5 फीसदी की दर से विकास करेगी। ब्रिक्स देशों में चीन और भारत को छोड़कर बाकी देशों के लिए मुश्किल हालात बने हुए हैं। रूस की अर्थव्यवस्था को 0.7 फीसदी से सिकुड़ने का अनुमान जताया गया है जबकि ब्राजील की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा ढाई फीसदी की सिकुड़न का अंदाजा लगाया गया है।
 
भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती बने रहने की वजह बताते हुए विश्व बैंक ने कहा है, 'दुनिया की बाकी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में, भारत छोटी अवधि की विपरीत परिस्थितियों और वैश्विक उतार-चढ़ाव के लिए अच्छी तरह से तैयार है। बाहरी मुश्किलों से कम प्रभावित रहना और सहायक नीतिगत माहौल के साथ घरेलू कारोबार की मजबूती के चलते भारत मजबूत दिख रहा है।'