dharma sangrah

आने वाली है एक और महामंदी

Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (18:39 IST)
पिछले साल की आर्थिक मंदी ने दुनिया के सभी देशों को हिला कर रख दिया। दुनियाभर के लोगों की निगाहें एकाएक उपजे आर्थिक संकट पर लगी थी, यहाँ तक कि बरसों से गरीबी की मार झेल रहे निम्न वर्ग के लोग भी इस संकट से सहमे हुए दिखे। विश्वभर के नेता और अर्थशास्त्रियों ने तो लगातार बैठकें कर अरबों डॉलर के संभावित नुकसान से बचने के लिए दिन-रात एक कर कई आपात योजनाएँ बनाई। मगर इस आपाधापी में दशकों से चले आ रहे एक ऐसे संकट की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है, जो आने वाले कुछ सालों में इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी देशों, लोगों और यहाँ तक कि सम्पूर्ण पृथ्वी के जीवनचक्र पर पर ही प्रश्नचिह्न लगा सकता है।
PTI
FILE

पिछले कुछ सालों से लगातार आ रही चेतावनियों के अनुसार विश्व पर छाया प्राकृतिक संसाधनों का संकट वित्तीय संकट से भी बड़ा है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड ने अपनी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि करते हुए कहा है कि अगर दुनियाभर में प्राकृतिक संसाधनों का मौजूदा गति से ही इस्तेमाल जारी रहा तो अगले तीन दशकों में मनुष्य जाति को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दोगुने से ज्यादा संसाधनों की जरूरत होगी।

' द लिविंग प्लेनेट' नामक इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि प्राकृतिक संसाधनों का यह संकट 2008 के वित्तीय संकट से कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर होगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक अभी दुनिया का पूरा ध्यान आर्थिक मंदी पर लगा है मगर उससे भी बड़ी एक बुनियादी मुश्किल हमारे सामने आ रही है, वो है प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी की।

पिछले कुछ सालों के आँकड़ों के अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि पिछले साल की आर्थिक मंदी के दौर से शेयर बाजार में हुए अनुमानित 20 खरब डॉलर के नुकसान की तुलना अगर आप हर साल हो रहे 45 खरब डॉलर मूल्य के प्राकृतिक संसाधनों के नुकसान से करें तो यह आर्थिक संकट पर्यावरण हानि के आगे कहीं नहीं टिकता।

इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता इस बात की जताई गई है कि विश्व की 33 प्रतिशत आबादी पानी, हवा और मिट्टी का निर्ममता से इस्तेमाल कर रही है। इसके अलावा जंगल की तेजी से होती कटाई होने से पेड़ प्राकृतिक गति से बढ़ नहीं पा रहे हैं। पहले जरूरत की जो लकड़ियाँ एक ही पेड़ से मिल जाती थीं अब उसके लिए दो से तीन पेड़ काटे जा रहे हैं।

बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई जारी है और इसके मुकाबले पौधारोपण न के लगभग है, जिस वजह से भू-क्षरण की समस्या भी विकराल रूप लेने लगी है। वनों के कटने से वर्षा का अनुपात भी गड़बड़ा गया है, जिसके चलते कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ लगातार संसाधनों को कम कर रही हैं।

इसी तर्ज पर समुद्र में भी मछलियाँ भारी तादाद में पकड़ी जा रही हैं क्योंकि जिस गति से इनका शिकार हो रहा है उतनी तेजी से तो वे बढ़ भी नहीं पातीं। इस वजह से इनके प्रजनन पर सीधा-सीधा असर हो रहा है, नतीजतन पहले के मुकाबले अब छोटी तथा कम वजन वाली मछलियाँ मिल रही हैं।

इस रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता इस बात की जताई गई है कि विश्व की 33 प्रतिशत आबादी पानी, हवा और मिट्टी का निर्ममता से इस्तेमाल कर रही है।
ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियरों और ध्रुवों से बर्फ पिघलनी तेज हो गई है, जिस वजह से भी महासागरों के पानी का तापमान बदला है। इसके दूरगामी परिणामों में मछलियों की कई प्रजातियों के खत्म हो जाने का खतरा बना हुआ है। इसके तत्काल प्रभाव का नतीजा हाल ही में सिडनी के पास समुद्र में एकाएक उमड़ आई करोड़ों जैली फिशों के रूप में देखा गया, जिससे पार पाने में ऑस्ट्रेलियाई सरकार को करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़े।

वर्ल्ड वाइल्ड फंड के मुताबिक आर्थिक संकट के मामले में सारे नेता और कॉरपोरेट वैश्विक स्तर पर मिल-जुलकर काम करने के लिए तैयार हैं और जल्द से जल्द इस समस्या पर लगाम लगाना चाहते हैं पर पर्यावरण संबधी समस्याओं के लिए वे उतने जागरूक और सजग नहीं हैं। इस समस्या को दरअसल वित्तीय संकट से भी बड़े और दीर्घकालिक संकट के रूप में देखा जाना चाहिए व इससे निपटने के लिए व्यापक संसाधन जुटाने चाहिए। वर्ल्ड वाइल्ड फंड का कहना है कि आम लोग भी इस स्थिति में बदलाव के अभियान में भाग लेकर एक बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं।

पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की स्थिति भी यथावत है, ज्यादा बिजली और ईंधन की खपत के कारण वायु मंडल में लगातार जहर घुलता जा रहा है। जितने ज्यादा वाहन सड़कों पर दौड़ेंगे तथा जितने नए कल-कारखाने बिना पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रख खोले जाएँगे यह समस्या उतनी ही विकराल होती जाएगी।

' भविष्य की महाशक्ति' चीन भी अब यह मान चुका है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में अब वो अमेरिका के समकक्ष है। हालाँकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से अगर जोड़ा जाए तो अमेरिका अब भी शीर्ष पर है। हमेशा की तरह विकसित और अधिक जनसंख्या वाले देश जैसे अमेरिका और चीन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वाले देशों की सूची में शीर्ष पर आते हैं, जबकि अफगानिस्तान और मलावी जैसे अशिक्षित और गरीब देश इस सूची में सबसे नीचे हैं।

अगर अब भी विश्व बिरादरी इस संकट से सबक नहीं लेती तो आने वाले सालों में पृथ्वी के पर्यावरण को होने वाली हानि प्राकृतिक संसाधनों समाप्त कर देगी या फिर यह संसाधन जनसाधारण को अनुपलब्ध जरूर बना देगी, जो निकट भविष्य में ऐसे कई भयानक संकटों को जन्म देगी।

वेबदुनिया पर पढ़ें

लेखक के बारे में
संदीपसिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो: IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC,  DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक  मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से.... और पढ़ें
Show comments

iPhone 18 Pro Max लॉन्च से पहले सस्ता हुआ iPhone 17 Pro Max, मिल रहा है धमाकेदार डिस्काउंट

निशु आजाद मामला : स्वतंत्र भारद्वाज को बुलंद शहर से हिरासत में लिया, CJP ने दिया था 72 घंटे का अल्टीमेटम, क्या है पूरा मामला

Kia Sorento : भारत में लॉन्च हुई नई प्रीमियम SUV, कीमत ₹27.99 लाख से शुरू; हाइब्रिड और डीजल इंजन के साथ मिलेगी AWD की सुविधा

BLA : बलूचिस्‍तान बना पाकिस्‍तानी सेना का कब्रिस्‍तान, बीएलए ने मचाई तबाही, मुनीर के 25 सैनिकों को किया ढेर

विजय के 'पीएम दांव' पर सियासत गर्माई : DMK और कांग्रेस का तंज, क्या 2029 में विजय बनेंगे प्रधानमंत्री?

सभी देखें

केरल में दिल दहला देने वाला हादसा: खड़ी लॉरी से टकराई तेज रफ्तार कार, इंजीनियरिंग के 8 छात्रों की मौत

भारत-अमेरिका रिश्तों पर सर्जियो गोर का बड़ा बयान, बोले- PM मोदी से मिलना चाहते हैं ट्रंप

मेलोनी बनीं सबसे लंबे वक्त तक इटली की पीएम रहने वालीं नेता, मोदी ने बधाई दी

Top News 5 September: भारत-अमेरिका दोस्ती पर सर्जियो गोर का बड़ा बयान, मोदी की चेतावनी, चंपत राय पर सस्पेंस खत्म

Nepal flash floods : नेपाल-तिब्बत सीमा पर तबाही के बीच कितने भारतीय अभी भी हैं लापता, MEA ने बताया आंकड़ा