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Holi की चटपटी कहानी : पोंगा पंडित की रंग-बिरंगी होली

नरेन्द्र देवांगन
Holi Pandit Story
 


 
 
शहर में पोंगा नाम का एक पंडित था। वह अपने आपको बहुत विद्वान समझता था। वह लोगों के मन में ग्रह-नक्षत्र वगैरह के खतरे का डर बैठाकर खूब दावतें उड़ाता। इस तरह उसे मुफ्त खाने की आदत पड़ गई थी। उसे बात-बात में चुनौती देने की भी बुरी आदत थी।
 
होली का त्योहार पास में आया तो पोंगा पंडित ने मुहल्ले के लड़कों को चुनौती दी, 'मैं इस बार भी होली नहीं खेलूंगा। आज तक कोई मुझे रंग नहीं डाल सका। आगे भी किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि कोई मुझ पर रंग डाल सके। मैं हर बार अपनी बुद्धिमानी से बच जाता हूं।'
 
तभी सामने से आते हुए टीनू बोला, 'क्यों दोस्तों, इस बार होली जमकर खेलने का इरादा है न?'
 
'इरादा तो है, पर पोंगा पंडित इस बार भी होली खेलने के मूड में नहीं है। पंडित हम लोगों को चुनौती दे रहा है कि इस बार भी उसे कोई रंग नहीं लगा सकता।' राज ने कहा।
 
'तुम लोगों में से किसी ने मुझे रंग लगाकर दिखा दिया तो मैं सभी को जोरदार दावत दूंगा।' पोंगा पंडित ने कहा।
 
'दावत की बात है तो हमें आपकी चुनौती मंजूर है।' टीनू ने कहा, 'देखो, वादे से मुकर मत जाना।'
 
'नहीं, पंडित की जबान से निकली बात पत्थर की लकीर होती है।' पोंगा पंडित बोला।
 
घर लौटते ही पोंगा पंडित रंगों से बचने के उपाय सोचने लगा। आखिर उसकी इज्जत का सवाल जो था। अबकी बार सभी लड़कों ने कोई ऐसी योजना बनाने का फैसला किया जिससे कि पोंगा पंडित को रंगों से सराबोर किया जा सके। सब बैठकर कोई तरकीब सोचने लगे।
 
सबसे पहले टीनू उछल पड़ा, 'आइडिया...।'
 
सब दोस्तों ने उसे चारों ओर से घेर लिया, 'टीनू बता न।' सब ओर से आवाजें आने लगीं। सभी की निगाहें उस पर लगी हुई थीं, पर टीनू चुप रहा। सब उसकी खुशामद करेंगे, यही सोचकर उसे देरी करने में मजा आ रहा था।
 
'अभी नहीं, थोड़ी देर में बताऊंगा।' वह नाचता हुआ बोला।
 
राज बहुत ही जल्दबाज था। वह जल्दी से जल्दी टीनू से उसकी बात उगलवाना चाहता था। उसे भी एक उपाय सूझा।
 
'क्यों इसकी योजना पर भरोसा करते हो। मेरी तरकीब जरूर इससे भी अच्छी होगी। आओ, मैं बताता हूं सबको।' राज ने लड़कों से कहा।
 
राज ने एक-एक करके सबके कान में कुछ कहा। सब खुशी से नाचने लगे। सभी एकसाथ चिल्लाने लगे, 'राज की तरकीब वाकई बहुत अच्छी है। यह टीनू क्या जाने इतनी अक्ल की बात। अबकी बार तो पोंगा पंडित को खूब छकाएंगे।'
 
फिर वे नाचते हुए गाने लगे, 'राज की योजना अपनाएंगे, पोंगा पंडित को मजे चखाएंगे।' 
 
टीनू का घमंड चूर-चूर हो गया। 'अब मुझे कोई नहीं पूछेगा। राज की योजना सबको पसंद आ गई है। मैं क्यों न खुद ही इन्हें अपनी योजना बता दूं। हो सकता है मेरी योजना राज से भी अच्छी हो और सबको पसंद आए।' टीनू ने सोचा। 
 
सबके बीच पहुंचकर वह चिल्लाया, 'रुको तो सही, मैं भी अपनी योजना बता रहा हूं। शायद तुम सबको पसंद आ जाए।'
 
राज का चेहरा खुशी से चमक उठा, 'हां... हां..., जरूर बताओ, मेरी योजना तो बस यहीं तक थी और कुछ नहीं...।'
 
'क्या मतलब, मैं समझा नहीं।' टीनू बोला।
 
'पहले तुम अपनी योजना बताओ, तब मैं भी पूरी बात बताऊंगा।' राज ने कहा।
 
'हां... हां... लो सब सुनो।' टीनू ने चुपके से सबको अपनी योजना बता दी। सब उसकी सूझबूझ पर ताली बजाने लगे।
 
'वाह, भाई टीनू, वाकई तुम्हारा जवाब नहीं।' एक लड़के ने कहा।
 
'अच्छा, तो क्या मेरी योजना राज की योजना से अच्छी है?' वह मुस्कुराया।
 
'भाई टीनू, मेरी योजना तो सिर्फ इतनी ही थी कि किसी तरह जल्दी से जल्दी तुम्हारी योजना उगलवाई जाए।' राज ने बताया तो टीनू शर्मिंदा हो गया।
 
होली की सुबह पोंगा पंडित अभी सोकर उठा ही था तभी उसके कानों में कई लोगों की आवाजें पड़ीं, 'चाय मिलेगी साहब, गरमागरम चाय। हमने सुना है कि यहां आपने नया टी स्टॉल खोला है।'
 
पोंगा पंडित ने घर की खिड़की से बाहर झांका। सामने खड़े कुछ बूढ़े चाय मांग रहे थे।
 
'अरे भाई यह तो मेरा घर है। कोई टी स्टॉल नहीं, तुम शायद गलती से यहां आ गए हो।' पोंगा पंडित ने उनसे कहा।
 
बूढ़ों का भेस बदले लड़कों की टोली मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई। थोड़ी देर में फिर वही आवाज सुनाई दी, 'चाय चाहिए साहब, बड़ी ठंड लग रही है। आज आपकी चाय का स्वाद लेकर देखते हैं।'
 
पोंगा पंडित को हैरानी हुई और गुस्सा भी आया। 'आज सवेरे ही इन लोगों ने भांग पी ली है। होली है न', सोचकर वह कड़कती आवाज में बोला, 'अरे गधों, भांग पी ली है तो फिर चाय क्यों मांगते हो? देखते नहीं, यह मेरा घर है, कोई चाय की दुकान नहीं, भागो यहां से।' 
 
पोंगा पंडित की बात पर सब खिलखिला पड़े। 'फिर यह चाय की दुकान का साइन बोर्ड क्यों लगा रखा है। भांग हमने पी है या आपने?' सबने व्यंग्य किया।
 
पोंगा पंडित को गुस्सा आ गया। वह ताव खाकर बाहर निकला। 'जरा दिखाओ तो, कहां है साइन बोर्ड?' कहने के साथ ज्यों ही उसने ऊपर देखा, साइन बोर्ड दिखाई दे गया। पंडित ने आव देखा न ताव, वह एक लाठी अंदर से उठा लाया और तख्ते पर जोर से मारते हुए बोला, 'न जाने कौन गधा यह बोर्ड यहां टांग गया है।'
 
ज्यों ही लाठी तख्ते पर पड़ी, रंगों की बौछार से पंडित का पूरा शरीर भीग गया। इधर-उधर छिपे लड़कों, यहां तक कि लड़कियों ने भी रंग से भरे गुब्बारे पोंगा पंडित पर फेंके। साथ ही ताली पीट-पीटकर गाने लगे, 'होली है भई होली है, रंग-बिरंगी होली है।'
 
यह योजना टीनू की ही थी कि साइन बोर्ड के पीछे रंगों से भरे गुब्बारे टांग दिए जाएं। ज्यों ही पोंगा पंडित उस पर वार करेगा, गुब्बारे फूट पड़ेंगे।
 
'राज भैया, अब हो जाए दावत।' सीमा चहकती हुई बोली।
 
'दावत, पर तुम लड़कियों को कैसे पता चला?' पोंगा पंडित हैरान हो गया।
 
'लो कर लो बात, हम लड़कियों ने राज और टीनू भैया का साथ यों ही थोड़े दिया था।'
'बताओ, भला क्यों दिया था?' सीमा ने पूछा।
 
तो सभी लड़कियां एकसाथ चिल्लाईं, 'दावत में छककर खाने के लिए।'
 
'ठीक है, ठीक है।' पोंगा पंडित बोला, 'तुम लोग बैठो। मैं अभी मिठाई वगैरह लेकर आता हूं।' कुछ ही देर में पोंगा पंडित खीर, हलवा-पूरी और लड्डुओं का थाल लेकर पहुंच गया।
 
लड़के-लड़कियों की टोली दावत उड़ाने लगी। लोगों को बेवकूफ बनाकर हलवा-पूरी खाने वाला पोंगा पंडित आज खुद हलवा-पूरी खिला रहा था।

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