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चिट्ठी-पत्री पर फनी कविता : मां चिट्ठी कैसी होती थी

शुक्रवार,अक्टूबर 9, 2020
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हंसों मजे से, गाओ मजे से, हंसकर खाना, खाओ मजे से। बच्चों फिर दादी से बोलो, अच्छी कथा सुनाओ मजे से।
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बिट्टी पढ़ री बिट्टी पढ़,आई गांव से चिट्ठी पढ़। चिट्ठी आई पांव से, नदी पार कर नाव से।
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रानी दुर्गावती पर कविता- जब दुर्गावती रण में निकलीं हाथों में थीं तलवारें दो। धीर वीर वह नारी थी, गढ़मंडल की वह रानी थी।
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ठंड नहीं लगती क्या चंदा, नंगे घूम रहे अंबर में। नीचे उतरो घर में आओ, सेकों जरा बदन हीटर में।
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बच्चों ने डाली पर देखा तोता हरा-हरा। पत्तों के गालों पर उसने, चुंटी काटी कई-कई बार। पत्तों का भी उस तोते पर,
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बंदर बोला, मिस्टर हाथी, क्यों लंगड़ाते आप। नहीं दिया उत्तर प्रणाम का, भाग रहे चुपचाप।
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चॉकलेट यदि खाना हो तो, पैदल मेरे साथ चलो। यदि खिलौने लाना हो तो, पैदल मेरे साथ चलो।
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कविता : कब दौड़ेगी रेलगाड़ी...

बुधवार,सितम्बर 2, 2020
कब दौ़ड़ेगी रेलगाड़ी, हाथ हिलाकर छोड़ आऊंगा..., कब दौड़ेगी रेलगाड़ी मैं खिड़की से खेतों को देखूंगा....
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ज्ञान का दीप जलाओ ऐसा, जग शिक्षक का सम्मान करे। ऐसी शिक्षा दीजिए, जिससे वे तुम पर नाज करे।
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बीच सड़क पर थूक दिया तो, नगर पालिका वाले आ गए। दादाजी को बिठा कार में, तुरत फुरत थाने पहुंचा गए।
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बैठ नाक पर चश्मा भाई, बाहें डालें कान पर। नहीं आंच आने देते हैं, आंखों के सम्मान पर।
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आज के दिन! उन शहीदों को जरा हम याद कर लें। दें उन्हें श्रद्धा-सुमन, कुछ प्रार्थना, फरियाद कर लें।
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उन वीरों को हम नमन करें। जिनने अपनी कुरबानी दी।। निज प्राणों की परवाह न कर। भारत को नई रवानी दी।।
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इस महान भारत की संस्कृति का यह गौरव गान है। न्याय-नीति का पालक अपना प्यारा हिन्दुस्तान है।। जहां सृष्टि निर्माण हुआ था वर्ष करोड़ों पहले,
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चली पुतरियां पइयां पइयां, पहुंची पीपल छैयां। लाल पुतरिया दूल्हा बनकर, ले आई बारात।
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दिल्ली जाकर अब हम तो, अपनी सरकार बनाएंगे। भरत देश के बालक हैं हम, भारत देश चलाएंगे।
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निर्धन कमजोरों को रोटी, रोज बांटते मियां शकील। सुबह-सुबह से खुद भिड़ जाते।
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कहा एक दिन दाल बहिन ने, छुट्टी आज मनाऊंगी। किसी थाल में चावल के संग, आज नहीं मैं जाऊंगी।
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चींटी एक आई पूरब से, एक आ गई पश्चिम से।हुई बात कानों कानों में, रुकीं जरा दोनों थम के।
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