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बाल गीत : चली पुतरियां

मंगलवार,अगस्त 11, 2020
Child Poem
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दिल्ली जाकर अब हम तो, अपनी सरकार बनाएंगे। भरत देश के बालक हैं हम, भारत देश चलाएंगे।
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निर्धन कमजोरों को रोटी, रोज बांटते मियां शकील। सुबह-सुबह से खुद भिड़ जाते।
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कहा एक दिन दाल बहिन ने, छुट्टी आज मनाऊंगी। किसी थाल में चावल के संग, आज नहीं मैं जाऊंगी।
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चींटी एक आई पूरब से, एक आ गई पश्चिम से।हुई बात कानों कानों में, रुकीं जरा दोनों थम के।
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अभी डाल में फूल खिला है, इतराता है फूला फूला। उसे पता है कुछ घंटों में, बिखर जाएगा यह घरघूला।
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क्यों करते हो बाबा ऊधम, नहीं बैठते हो चुपचाप अपने कमरे में दादाजी, पेपर पढ़ते होकर मौन।
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पूरब के पर्वत से झांका, लाल-लाल सूरज का गोला। मैं बिस्तर से उठ बैठा हूं,सुबह हो गई, मुन्ना बोला।
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सुबह-सुबह से सूरज निकला, खिड़की में से भीतर आया। बोला उठो-उठो अब जल्दी,
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सूरज से किरणे उतरी हैं, बैठ धूप के घोड़ों पर। नजर लगी है शीला के घर, बनते गरम पकोड़ों पर।
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मेरी गुड़िया पाठ पढ़ेगी, नन्हें-नन्हें छोटे से। पापा लेकर आए कॉपी, मम्मी लाई पेन।
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शहर छोड़ नानी घर आए। कूद नदी में खूब नहाए। पत्थर मार आम गिराए। नानी से सब सुनी कहानी। ठंडा है मटके का पानी।
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कोल्ड ड्रिंक भले हो बिकता, भाता सबको पानी है, दादा-दादी ताऊ-ताई पानी पीती नानी है
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लस्सी-शरबत-ठंडाई,पियो खूब, गर्मी आई! सड़कों पर है सन्नाटा-मारे लू सबको चांटा- दुबके रहे घरों में यार,
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मीठा है खट्टा है, कुछ-कुछ नमकीन। पी लो तो तबियत, हो जाए रंगीन। आम का पना है यह, आम का पना।
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हम बच्चे हिन्दुस्तान के। बच्चे हम संसार के।। कल-कल बहती नदियां हों, जल में पलता जीवन हो।
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पानी बादल से आता है,पानी नल से आता है। अगर कहीं छत टूटी हो तो, छत से भी आ जाता है।
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मैं नतमस्तक हो बाबा, श्रद्धा के फूल चढ़ाऊं, जय भीमा, जय भीमा, तेरे चरणों की धूल कहाऊं!! अर्थशास्त्री, कानून के ज्ञाता, भीमाबाई धर्मज्ञा माता,
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सूरज शिक्षक सरकारों को, नहीं दया हम पर आती है। किरणों के चाबुक से हमको, भरी दुपहरिया पिटवाती है।
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कल रात सपने में आया कोरोना.... उसे देख जो मैं डरातो मुस्कुरा के बोला मुझसे डरो ना... उसने कहा- कितनी अच्छी है तुम्हारी संस्कृति। न चूमते,न गले लगाते
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