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बाल गीत : पैदल मेरे साथ चलो

गुरुवार,सितम्बर 17, 2020
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कविता : कब दौड़ेगी रेलगाड़ी...

बुधवार,सितम्बर 2, 2020
कब दौ़ड़ेगी रेलगाड़ी, हाथ हिलाकर छोड़ आऊंगा..., कब दौड़ेगी रेलगाड़ी मैं खिड़की से खेतों को देखूंगा....
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ज्ञान का दीप जलाओ ऐसा, जग शिक्षक का सम्मान करे। ऐसी शिक्षा दीजिए, जिससे वे तुम पर नाज करे।
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बीच सड़क पर थूक दिया तो, नगर पालिका वाले आ गए। दादाजी को बिठा कार में, तुरत फुरत थाने पहुंचा गए।
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बैठ नाक पर चश्मा भाई, बाहें डालें कान पर। नहीं आंच आने देते हैं, आंखों के सम्मान पर।
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आज के दिन! उन शहीदों को जरा हम याद कर लें। दें उन्हें श्रद्धा-सुमन, कुछ प्रार्थना, फरियाद कर लें।
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उन वीरों को हम नमन करें। जिनने अपनी कुरबानी दी।। निज प्राणों की परवाह न कर। भारत को नई रवानी दी।।
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इस महान भारत की संस्कृति का यह गौरव गान है। न्याय-नीति का पालक अपना प्यारा हिन्दुस्तान है।। जहां सृष्टि निर्माण हुआ था वर्ष करोड़ों पहले,
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चली पुतरियां पइयां पइयां, पहुंची पीपल छैयां। लाल पुतरिया दूल्हा बनकर, ले आई बारात।
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दिल्ली जाकर अब हम तो, अपनी सरकार बनाएंगे। भरत देश के बालक हैं हम, भारत देश चलाएंगे।
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निर्धन कमजोरों को रोटी, रोज बांटते मियां शकील। सुबह-सुबह से खुद भिड़ जाते।
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कहा एक दिन दाल बहिन ने, छुट्टी आज मनाऊंगी। किसी थाल में चावल के संग, आज नहीं मैं जाऊंगी।
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चींटी एक आई पूरब से, एक आ गई पश्चिम से।हुई बात कानों कानों में, रुकीं जरा दोनों थम के।
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अभी डाल में फूल खिला है, इतराता है फूला फूला। उसे पता है कुछ घंटों में, बिखर जाएगा यह घरघूला।
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क्यों करते हो बाबा ऊधम, नहीं बैठते हो चुपचाप अपने कमरे में दादाजी, पेपर पढ़ते होकर मौन।
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पूरब के पर्वत से झांका, लाल-लाल सूरज का गोला। मैं बिस्तर से उठ बैठा हूं,सुबह हो गई, मुन्ना बोला।
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सुबह-सुबह से सूरज निकला, खिड़की में से भीतर आया। बोला उठो-उठो अब जल्दी,
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सूरज से किरणे उतरी हैं, बैठ धूप के घोड़ों पर। नजर लगी है शीला के घर, बनते गरम पकोड़ों पर।
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मेरी गुड़िया पाठ पढ़ेगी, नन्हें-नन्हें छोटे से। पापा लेकर आए कॉपी, मम्मी लाई पेन।
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शहर छोड़ नानी घर आए। कूद नदी में खूब नहाए। पत्थर मार आम गिराए। नानी से सब सुनी कहानी। ठंडा है मटके का पानी।
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