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हिन्दी कविता: पृथ्वी की पुकार

Updated: बुधवार, 22 अप्रैल 2026 (16:15 IST)
समय की अनंत धारा में
पृथ्वी
अब भी शांत नहीं है
वह बोल रही है
अपनी दरकती मिट्टी की लकीरों में
सूखते जलस्रोतों की निस्पंद आंखों में
और उन जंगलों की स्मृतियों में
जो कभी सांस लेते थे
हमने
उसे आंकड़ों में बांट दिया
विकास के ग्राफ में तौल दिया
और समझ लिया
कि प्रगति संख्याओं का उत्सव है
पर पृथ्वी गणना नहीं
अनुभूति है
हमने वर्षा को इंचों में मापा
सेंटीमीटरों में बांधा
पर कभी
एक बूंद की धड़कन नहीं सुनी
वह बूंद
जो आकाश से गिरते समय
अपने भीतर
जीवन का समूचा संगीत लेकर आती है।
 
भारत की धरती जो कभी
नदियों की चंचलता से जीवंत थी
अब
कहीं बांधों में बंधी है
कहीं रसायनों में घुली
और कहीं
स्मृतियों में सिमटती हुई,
तालाब
जो गांवों की आत्मा थे
अब मानचित्रों में खोजे जाते हैं
कुंड और पोखर
जो पीढ़ियों की प्यास बुझाते थे
अब कंक्रीट की परतों के नीचे
दम तोड़ते हैं
हमने
जंगलों को काटकर शहर उगाए
और फिर उन्हीं शहरों में
ऑक्सीजन खोजते रहे
यह कैसी विडंबना है
कि हम
अपने ही अस्तित्व के विरुद्ध
इतने सजग हो गए हैं।
पृथ्वी
कभी विरोध नहीं करती
वह केवल संकेत देती है
कभी सूखे के रूप में
कभी बाढ़ की अति में
कभी तापमान की चुप्पी में
जो धीरे धीरे
जीवन को जला देती है
यह संकट
केवल पर्यावरण का नहीं
हमारी चेतना का है
हमने
सुविधाओं के छोटे लाभ के लिए
संतुलन की विशाल व्यवस्था को
भंग कर दिया।
 
अब आवश्यकता
नए आविष्कारों की नहीं
पुराने ज्ञान के पुनर्जागरण की है
वही तालाबों का धैर्य
वही नदियों की मर्यादा
वही जंगलों की सहनशीलता
हमें पानी को
फैशन नहीं
संस्कार बनाना होगा
धरती को संपत्ति नहीं
मातृत्व की दृष्टि से देखना होगा।
आज
पृथ्वी दिवस पर
यह केवल उत्सव नहीं
एक स्वीकार है
कि हमने भूल की है
और अब सुधार का समय है
यदि हम
अब भी न चेते
तो आने वाली पीढ़ियां
पृथ्वी को नहीं
उसकी कथा को जिएंगी।
 
आओ
हम मिलकर
इस अस्मिता को पुनः रचें
धरती की धड़कनों को
फिर से सुनें
ताकि
जब अगली वर्षा हो
तो हर बूंद
हमारे भीतर
जीवन बनकर उतरे
और यह पृथ्वी
फिर से
केवल रहने की जगह नहीं
जीने का उत्सव बन सके।

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)
लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें

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