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Eid ul Azha 2026: कब मनाई जाएगी ईद उल-अज़हा, जानें परंपरा और महत्व

Updated: गुरुवार, 28 मई 2026 (09:28 IST)
Baqrid 2026 Celebration Tips: बकरीद, जिसे ईद-उल-अजहा या ईद-ए-कुर्बान भी कहा जाता है, इस्लाम के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक है। वर्ष 2026 में यह 27 मई 2026 बुधवार या गुरुवार, 28 मई 2026 को मनाए जाने की संभावना है। यह त्योहार मुख्य रूप से 'कुर्बानी' (बलिदान) की भावना को समर्पित है। आइए यहां जानते हैं इसकी महान परंपरा और महत्व
 

1. कुर्बानी की ऐतिहासिक परंपरा

कुर्बानी की परंपरा का सीधा संबंध हजरत इब्राहिम (अ.स.) से है, जिन्हें यहूदी, ईसाई और मुस्लिम तीनों धर्मों में एक महान पैगंबर माना जाता है।
 
ईश्वरीय परीक्षा: इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने में आकर उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी। इब्राहिम साहब के लिए उनके इकलौते बेटे हजरत इस्माइल सबसे प्रिय थे।
 
अटूट विश्वास: अल्लाह के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए वह अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए। जब उन्होंने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, तो अल्लाह ने उनके जज्बे को स्वीकार किया और वहां एक 'दुंबा' (भेड़) भेज दिया। बेटे की जगह उस जानवर की कुर्बानी हुई।
 
सुन्नत-ए-इब्राहिम: इसी ऐतिहासिक घटना की याद में हर साल पूरी दुनिया के मुसलमान जानवर की कुर्बानी देते हैं, जिसे 'सुन्नत-ए-इब्राहिम' कहा जाता है।
 

2. कुर्बानी का वास्तविक महत्व 

कुर्बानी का अर्थ केवल जानवर को ज़ब़ह करना नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और नैतिक संदेश हैं:
 
समर्पण: यह संदेश देता है कि इंसान को ईश्वर की मर्जी के आगे अपनी इच्छाओं और मोह का त्याग करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
 
अहंकार का त्याग: जानवर की कुर्बानी प्रतीकात्मक है। इसका असली उद्देश्य मनुष्य के भीतर छिपे 'पशुत्व' यानी क्रोध, लालच, घृणा और अहंकार की बलि देना है।
 
सामाजिक समरसता: यह त्योहार समाज के हर तबके को साथ लेकर चलने की सीख देता है।
 

3. गोश्त (मांस) के बंटवारे का नियम

बकरीद की सबसे सुंदर बात इसका वितरण नियम है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी भूखा न रहे। कुर्बानी के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है:
 
पहला हिस्सा (गरीब और जरूरतमंद): समाज के उन लोगों के लिए जिनके पास भोजन का अभाव है।
 
दूसरा हिस्सा (रिश्तेदार और दोस्त): सामाजिक संबंधों और भाईचारे को मजबूत करने के लिए।
 
तीसरा हिस्सा (स्वयं का परिवार): अपने परिवार की खुशियों के लिए।
 

4. हज और बकरीद का संबंध

बकरीद का त्योहार 'जिलहिज्जा' के महीने में मनाया जाता है। इसी दौरान दुनिया भर के मुसलमान मक्का (सऊदी अरब) में हज के लिए एकत्रित होते हैं। हज की रस्मों का एक अनिवार्य हिस्सा कुर्बानी भी है, जो हज पूरा होने की खुशी में दी जाती है।
 

5. मुख्य नियम और शिष्टाचार

नमाज: बकरीद के दिन सुबह ईदगाह या मस्जिद में विशेष नमाज (दो रकात) अदा की जाती है।
 
पवित्रता: कुर्बानी के लिए वही जानवर चुना जाता है जो स्वस्थ हो और उसे कोई चोट न लगी हो।
 
साफ-सफाई: वर्तमान समय में धर्मगुरुओं द्वारा यह विशेष सलाह दी जाती है कि कुर्बानी सार्वजनिक स्थलों पर न करें और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें ताकि पर्यावरण और अन्य लोगों को असुविधा न हो।
 
सार: बकरीद हमें सिखाती है कि खुशियां वही हैं जो दूसरों के साथ बांटकर मनाई जाएं। यह त्योहार 'स्व' से ऊपर उठकर 'सर्व' के बारे में सोचने की प्रेरणा देता है।
 
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ऋण मोचन मंगल स्त्रोत | Rin Mochan Mangal Stotra

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