US-Iran Talks Islamabad: अमेरिका और ईरान के बीच अब वह पाकिस्तान मुख्य मध्यस्थ बन गया है, जो स्वयं खंडित होने के कगार पर है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्धविराम की घोषणा से कुछ ही घंटे पहले, प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ ने सार्वजनिक रूप से उनसे ईरान पर हमलों को रोकने के लिए निर्धारित समय सीमा को दो सप्ताह और बढ़ाने का आग्रह किया। साथ ही ईरान से होर्मुज़ जलडमरूमध्य को जहाजों के आने-जाने के लिए खोलने की अपील भी की। ट्रंप ने इसे मान भी लिया।
शरीफ़ की यह क्षणिक सफलता विश्व मंच पर उनकी छवि को कुछ समय के लिए बढ़ा सकती है। लेकिन, यह भी एक खुला रहस्य है कि हमलों को रुकवाने में शरीफ़ की भूमिका पूर्णतः गौण है। जानकार स्रोतों के अनुसार, वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर का ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड (पसदारान) से सीधा संपर्क है और अमेरिकी राष्ट्रपति, शरीफ से अधिक मुनीर की बात सुनते हैं।
व्हाइट हाउस के अनुसार, युद्धविराम की घोषणा से पहले ट्रंप ने जिन दो लोगों से फोन पर बात की, वे इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और आसिम मुनीर थे। मुनीर, न कि प्रधानमंत्री शरीफ़, पहले से ही इस्लामाबाद में सत्ता के शीर्ष पर हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति के चहेते भी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो उन्हें 'मेरा पसंदीदा फील्ड मार्शल' तक कहा है।
जेडी वैंस के साथ रात्रिकालीन वार्ता
सोमवार 6 अप्रैल की रात से ही, मुनीर कथित तौर पर उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ युद्धविराम पर चर्चा करने के लिए 'पूरी रात' संपर्क में थे। एक स्थायी समझौते पर बातचीत के लिए पाकिस्तान वैंस को ही आमंत्रित कर रहा है; यह वार्ता शुक्रवार,10 अप्रॆल को होनी निर्धारित है।
यदि मुनीर की आशा के अनुरूप युद्ध 'इस्लामाबाद समझौते' के साथ समाप्त होता है, तो इससे उनकी निजी प्रतिष्ठा ही नहीं, राजनीतिक शक्ति भी बहुत बढ़ जायेगी। राष्ट्रपति ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद से ही, मुनीर प्राकृतिक संसाधनों, क्रिप्टोकरेंसी वाले सौदों और आतंकवाद विरोधी सहयोग के वादों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति को लुभाने के लिए व्यवस्थित रूप से काम करते रहे हैं। मुनीर ने पिछले ही साल खुद को आजीवन 'फील्ड मार्शल' के पद पर पदोन्नत करवाया था।
ऐसा करके, उन्होंने भारत के साथ 'ऑपरेशन सिंदूर' वाले सैन्य टकराव के बाद मिली झूठी जीत की बयानबाजी का इस्तेमाल अपनी सत्ता को मज़बूत करने के लिए किया। पाकिस्तानी इतिहास में केवल एक व्यक्ति ने इससे पहले 'फील्ड मार्शल' का सैन्य पद प्राप्त किया था: अयूब ख़ान ने, जिन्होंने 1958 में सैन्य-तख्तापलट द्वारा सत्ता हथिया ली थी। अपने नए पद के साथ, सेना प्रमुख मुनीर ने अपने लिए एक नया कार्याकाल भी स्थापित किया है, जिससे उन्हें आजीवन किसी क़ानूनी अभियोजन से छूट मिल गई है।
सैन्य तानाशाही की ओर अग्रसर मुनीर
उनके नेतृत्व में, कागज़ पर अभी भी लोकतांत्रिक देश पाकिस्तान, वास्तव में सैन्य तानाशाही की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। मीडिया और न्यायपालिका पर अपने नियंत्रण के बावजूद, मुनीर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की लोकप्रियता को कम करने में सफल नहीं हो पाए हैं, जिन्हें तीन साल से जेल में बंद कर रखा है। पाकिस्तान अपने कट्टर दुश्मन भारत और पड़ोसी अफगानिस्तान के साथ संघर्ष में ट्रंप के साथ अपने अच्छे संबंधों का भरपूर लाभ उठाने का प्रयास कर रहा है।
सऊदी अरब के साथ हाल ही में हुए रक्षा समझौते ने मुनीर की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है, हालांकि, इस समझौते ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा भी दिया है, क्योंकि ईरान ने सऊदी अरब पर खुलकर गोलाबारी की है। मुनीर अतीत में सऊदी अरब में एक सैनिक के रूप में तैनात रह चुके हैं। वहां उस समय उन्होंने कथित तौर पर 'कुरान को कंठस्थ किया', इसलिए वे अपने आप को 'हाफ़िज़' कहलाने का हक़दार भी समझते हैं।
बलूचिस्तान में निर्मम दमन
पाकिस्तानी सेना की मुख्य गुप्तचर सेवा इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI - Inter-Services Intelligence) के प्रमुख रह चुके आसिम मुनीर को अब अपने ही देश में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। बलूचिस्तान प्रांत में केंद्रीय सरकार के निर्मम दमन अभियानों के विरुद्ध विद्रोह तेज़ हो गया है। दिवालिया होने के कगार पर खड़ी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था ईरान के साथ अमेरिकी-इसराएली युद्ध से बुरी तरह प्रभावित है। मुनीर द्वारा अपने नियंत्रण वाली निवेश परिषद के माध्यम से विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के प्रयास अब तक नगण्य रूप से ही सफल हो पाए हैं।
इस्लामाबाद में ईरानी-अमेरिकी वार्ता के आयोजन से कोई ठोस परिणाम निकले या न निकले, मुनीर और शहबाज़ शरीफ की अंतरराष्ट्रीय प्रेस में अचानक खूब चर्चा हो रही है। इससे देश की निरीह जनता का ध्यान आर्थिक दीवालियेपन तथा बलोचिस्तान, सिंध और ख़ैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रातों में भारी जन-असंतोष और अफ़ग़ानिस्तान के साथ अनबन से -- कुछ समय के लिए ही सही -- भटकाया तो जा ही सकता है।
हो सकता है, अमेरिका की चाटुकारिता और ईरान के साथ इस्लामी भाईचारा दिखाने से, दीवालिया हो चुके पाकिस्तान को अपनी क्षणिक प्रसिद्धि के साथ कुछ दान-दक्षिणा भी मिल जाए! भारत में जो लोग मोदी की इस बात के लिए आलोचना कर रहे हैं कि उन्होंने अमेरिकी-ईरानी वार्ता भारत में करवाने की पहल क्यों नहीं की, वे भूल जाते हैं कि भारत अमेरिका का न तो चाटुकार है और न ही डॉनल्ड ट्रंप अपनी किसी बात पर टिके रहने के लिए जाने जाते हैं। वे प्रसिद्ध हैं गिरगिट की तरह रंग बदलने के लिए।