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Last Modified: शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 (19:56 IST)

भारत सुपर पॉवर नहीं, कनेक्टर पॉवर है, आखिर क्या हैं इसके मायने

India Connector Power
India Connector Power: गैल ने ऑनलाइन यूरेशियन टाइम्स में लिखा है कि युद्ध सिर्फ सीमाओं को ही नहीं बदलते, वे वैश्विक शक्ति की असली बनावट को भी सामने लाते हैं। ईरान के साथ संघर्ष ने ठीक यही किया है और जो देश सबसे साफ तौर पर उभरकर सामने आया है और वह ऐसा देश है जिसने एक भी गोली नहीं चलाई। वह भारत है। उन्होंने लिखा-  भारत दुनिया की पहली असली 'कनेक्टर पॉवर' (जोड़ने वाली शक्ति) है। 

भारत को अनदेखा करना मुश्किल 

इजराइली रणनीतिकार गैल कहते हैं कि यह कोई सिद्धांत की आड़ में अपनाई गई तटस्थता नहीं है, बल्कि यह एक पूरी 'संरचना' है। वह कहते हैं- नई दिल्ली न तो महाशक्ति बनने की इच्छा रखती है और न ही मध्यस्थ बनने की। उसने आपसी निर्भरता का एक ऐसा जटिल और बहुस्तरीय जाल बुना है कि ऊर्जा, व्यापार या सुरक्षा, किसी भी क्षेत्र में कोई भी महत्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था या समझौता उसके जरिए गुजरे बिना न तो पूरा हो सकता है और न ही अस्तित्व में आ सकता है।
 
गैल ने आगे लिखा- जहां बड़ी शक्तियां अपना दबदबा कायम करने की होड़ में लगी थीं और छोटे देश किसी एक पक्ष को चुनने या दबाव में आने की जद्दोजहद कर रहे थे, वहीं नई दिल्ली ने सभी संपर्क सूत्र खुले रखे। वॉशिंगटन, येरुसलम, रियाद, मॉस्को से लेकर तेहरान तक – उसने सभी से बात की और इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि उन सभी ने उसे जवाब भी दिया। खाड़ी देश भारत को सिर्फ एक साझीदार के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक 'इंश्योरेंस' के तौर पर भी देखते हैं। सऊदी अरब और अमीरात के लिए दिल्ली एक ही समय पर ग्राहक, आपूर्तिकर्ता, निवेशक और सुरक्षा-संबंधी भूमिका निभाने वाला देश है।

ईरान और इजराइल दोनों के साथ रिश्ते

ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह इस तर्क को पूरी स्पष्टता के साथ सामने रखता है। इसे महज एक व्यावसायिक परियोजना के तौर पर देखना, इसके असली मकसद को पूरी तरह से नज़रअंदाज करना होगा। यह भारत की इस बात की घोषणा है कि वॉशिंगटन या कोई भी अन्य देश चाहे कुछ भी मांगे, वह मध्य एशिया तक अपनी पहुंच हर हाल में बनाए रखेगा। जब तेहरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ा, तो भारत ने अपने संबंध नहीं तोड़े। उसने बस अपने जुड़ाव का तरीका बदल दिया।
 
इजराइल के साथ भारत का रिश्ता, महज तकनीक खरीदने वाले देश से आगे बढ़कर अब एक ऐसे 'अंतर्संबंध' में बदल गया है, जो तकनीक बनाने वाली व्यवस्था और उसे बड़े पैमाने पर लागू करने वाली व्यवस्था के बीच एक सेतु का काम करता है। इस तरह भारत को अपनी खुद की व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलती है।
 
विशेषज्ञों का कहना है कि एक ऐसी दुनिया में जो गुटों में बंट रही है, वहां एक 'कनेक्टर पावर' होना ही सबसे बड़ी ताकत है। ईरान संकट ने भारत को ताज नहीं पहनाया, बल्कि केवल उस सच को उजागर किया है जिसे भारत दशकों से शांति से बना रहा था।

क्या होता है कनेक्टर पॉवर?

'कनेक्टर पावर' का अर्थ है- एक ऐसी शक्ति जो दुनिया के अलग-अलग और अक्सर एक-दूसरे के विरोधी ध्रुवों (जैसे अमेरिका और रूस) को आपस में जोड़ने का काम करती है। दरअसल, एक सुपरपावर दुनिया पर अपनी इच्छा थोपती है, सैन्य हस्तक्षेप करती है और देशों को मजबूर करती है कि वे उसके गुट में शामिल हों। इसके उलट, कनेक्टर पॉवर किसी पर दबाव नहीं डालती, बल्कि खुद को इतना अनिवार्य बना लेती है कि कोई भी देश उसे नजरअंदाज नहीं कर पाता।
 
कनेक्टर पॉवर व्यापार, तकनीक और ऊर्जा के ऐसे रास्ते बनाती है जो उसके बिना अधूरे हैं। यदि अरब देशों को अपना तेल बेचना है, तो भारत सबसे बड़ा बाजार है।  इजराइल को अपनी तकनीक का विस्तार करना है, तो भारत सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है। रूस को प्रतिबंधों के बीच व्यापार करना है, तो भारत एक सुरक्षित रास्ता है। भारत अमेरिका का सामरिक मित्र बना रह सकता है। रूस से हथियार और तेल खरीद सकता है। इजराइल के साथ रक्षा सौदे कर सकता है। ईरान के चाबहार पोर्ट में निवेश कर सकता है। विरोधाभासी ताकतों के साथ एक साथ व्यवहार करना ही असली कनेक्टर पॉवर है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala  
 
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