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23 मार्च शहीदी दिवस: इंकलाब के तीन सूरज: जब फांसी के फंदे भी चूम लिए गए

Written By WD Feature Desk
Updated: शनिवार, 21 मार्च 2026 (15:54 IST)
23 march shaheedi diwas: 95वां शहीद दिवस समारोह: भारतीय इतिहास के कैलेंडर पर 23 मार्च की तारीख केवल एक दिन नहीं, बल्कि शौर्य का वो हस्ताक्षर है जिसे मिटाना नामुमकिन है। सन् 1931 की उस शाम, लाहौर की सेंट्रल जेल ने इतिहास का सबसे साहसी मंजर देखा, जब तीन नौजवान भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु- हँसते हुए मौत को गले लगा रहे थे।
 

विचारों की गूँज: "बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है"

आजादी की लड़ाई में दो धाराएं थीं, और ये तीनों उस 'गरम दल' के योद्धा थे जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी थी। भगत सिंह का मानना था कि 'इंसान को मारा जा सकता है, उसके विचारों को नहीं। साम्राज्य ढह जाते हैं, पर विचार अमर रहते हैं।' इसी दर्शन के साथ 8 अप्रैल 1929 को उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ असेंबली में बम फेंका- किसी की जान लेने के लिए नहीं, बल्कि सोई हुई हुकूमत को जगाने के लिए।
 
क्रांति के तीन स्तंभ

1. भगत सिंह: कलम और पिस्टल के धनी

भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक प्रखर विद्वान थे। जेल की सलाखों के पीछे भी उनका अध्ययन नहीं रुका; कहते हैं फांसी के बुलावे तक वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उर्दू, अंग्रेजी, हिंदी और पंजाबी जैसी कई भाषाओं के जानकार भगत सिंह ने 'अकाली' और 'प्रताप' जैसे अखबारों के माध्यम से जनमानस में आजादी की अलख जगाई। सांडर्स हत्याकांड के बाद उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला, जिसे दुनिया 'लाहौर षड्यंत्र' के नाम से जानती है।
 

2. सुखदेव: रणनीति के चाणक्य

लायलपुर (अब पाकिस्तान) की मिट्टी में जन्मे सुखदेव, भगत सिंह के बचपन के यार और वैचारिक साथी थे। लाहौर नेशनल कॉलेज के दिनों से ही दोनों का लक्ष्य एक था। सांडर्स कांड की पूरी रूपरेखा और क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन में सुखदेव का दिमाग सबसे तेज चलता था। मित्रता ऐसी कि मौत के फंदे तक साथ नहीं छोड़ा।
 

3. राजगुरु: शिवाजी की छापामार विरासत

महाराष्ट्र के पुणे से आए शिवराम हरि राजगुरु, छत्रपति शिवाजी महाराज की छापामार युद्ध शैली के कायल थे। लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज का बदला लेने के लिए राजगुरु ने ही 19 दिसंबर 1928 को सांडर्स पर सटीक निशाना साधा था। लोकमान्य तिलक के विचारों से ओत-प्रोत राजगुरु ने निडर होकर गिरफ्तारी दी और शहादत पाई।
 

अंतिम सफर: हुसैनीवाला की अमर ज्योति

23 मार्च 1931 की शाम 7:23 बजे वक्त थम गया। तीन जिंदगियां देश के नाम कुर्बान हो गईं। पंजाब के हुसैनीवाला में आज भी इन तीनों वीरों की समाधियाँ हमें याद दिलाती हैं कि आजादी खैरात में नहीं, लहू से खरीदी गई है।
 
"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।"
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