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होली पर गुलाल गोटा की परंपरा कहां से आई? मुस्लिम कारीगरों से क्या है इसका रिश्ता

Written By WD Feature Desk
Updated: शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026 (14:25 IST)
Holika Dahan 2026: जयपुर के 'गुलाल गोटे' का इतिहास और इसके पीछे की गंगा-जमुनी तहजीब वाकई में भारतीय संस्कृति का एक अनमोल उदाहरण है। होली के दिन यह परंपरा निभाई जाती है जिसके पीछे मु्स्लिमों का बड़ा योगदान रहता है।
 

1. 300 साल पुरानी परंपरा:

गुलाल गोटा बनाने की परंपरा जयपुर की स्थापना (1727) के समय से ही जुड़ी है। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के समय से ही मनिहार समुदाय के लोग इस शिल्प में पारंगत रहे हैं। यह सच है कि यह परंपरा लगभग 300 साल पुरानी है।
 

2. मुस्लिम शिल्पकारों (मनिहार परिवार) का योगदान:

जयपुर के 'मनिहारों का रास्ता' इलाके में रहने वाले मुस्लिम मनिहार परिवार ही इसे पीढ़ियों से बना रहे हैं। यह उनकी 7वीं और 8वीं पीढ़ी है जो आज भी इस नाजुक कला को जीवित रखे हुए है। यह हिंदू त्योहार और मुस्लिम कारीगरी के अद्भुत संगम का प्रतीक है।
 

3. गुलाल गोटा क्या है?

यह लाख (Lac) से बनी एक बेहद पतली और नाजुक गेंद होती है। इसका वजन मात्र 4 से 6 ग्राम के बीच होता है। इसे इस तरह बनाया जाता है कि जब यह किसी को छुए, तो वह तुरंत फूट जाए और भीतर का गुलाल व्यक्ति को सराबोर कर दे, लेकिन उसे चोट न लगे।
 

4. निर्माण प्रक्रिया:

पिघलाना: सबसे पहले लाख को पिघलाया जाता है।
फूंकनी का उपयोग: एक कांच की नली या फूंकनी के जरिए शिल्पकार इसमें फूंक मारते हैं ताकि वह गेंद की तरह फूल जाए।
रंग और सील: इसके अंदर खुशबूदार गुलाल भरा जाता है और फिर उसे कागज या आरारोट के लेप से बंद (सील) किया जाता है।
 

5. शाही परिवारों की परंपरा:

शुरुआत में गुलाल गोटा विशेष रूप से जयपुर राजघराने के लिए बनाया जाता था। होली के दिन राजा हाथी पर सवार होकर जनता पर गुलाल गोटे फेंकते थे। समय के साथ यह परंपरा आम लोगों तक पहुंची, हालांकि आज भी सिटी पैलेस (जयपुर) में इसकी विशेष मांग रहती है।
 

अतिरिक्त रोचक तथ्य:

पर्यावरण के अनुकूल: चूँकि यह शुद्ध लाख और प्राकृतिक रंगों (जैसे अरारोट मिश्रित गुलाल) से बना होता है, इसलिए यह पूरी तरह से ईको-फ्रेंडली है।
जीआई टैग (GI Tag) की मांग: इस अनूठी हस्तशिल्प कला के लिए भौगोलिक संकेत (GI Tag) की मांग भी अक्सर उठती रहती है ताकि इस विरासत को वैश्विक पहचान मिल सके।

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