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आदिवासी भगोरिया उत्सव क्या है? जानिए इस रंगीन पर्व से जुड़ी 5 रोचक बातें
Tribal Bhagoria Holi Festival: मध्यप्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर और धार जिलों के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला भगोरिया उत्सव अपनी जीवंतता और अनूठी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि भील और भिलाला जनजातियों की संस्कृति का दर्पण है। यहाँ भगोरिया उत्सव की 5 सबसे रोचक बातें दी गई हैं।
1. फसल कटाई और उल्लास का संगम
भगोरिया उत्सव होली के त्योहार से 7 दिन पहले प्रारंभ होता है। यह रबी की फसल (विशेषकर चने और गेहूं) के पकने की खुशी में भी मनाया जाता है। आदिवासी समाज इस समय अपनी मेहनत का जश्न मनाता है और आने वाले त्योहार के लिए खरीदारी करता है।
2. जीवनसाथी का चुनाव (स्वयंवर की परंपरा)
भगोरिया की सबसे चर्चित विशेषता इसका 'प्रेम उत्सव' होना है। ऐतिहासिक रूप से, यह वह समय होता है जब युवा अपनी पसंद के जीवनसाथी का चुनाव करते हैं। कहा जाता है कि यदि कोई युवक किसी युवती को गुलाल लगाता है और वह बदले में भी गुलाल लगा देती है, तो इसे आपसी सहमति माना जाता है। हालांकि, आधुनिक समय में यह परंपरा अब अधिक सामाजिक मेल-जोल का रूप ले चुकी है।
3. ढोल और मांदल की थाप
इस उत्सव में संगीत और नृत्य का अद्भुत समागम होता है। गांव-गांव से आदिवासी समूह अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों, जैसे मांदल (बड़ा ढोल) और बांसुरी के साथ मेले में पहुँचते हैं। एक साथ सैकड़ों ढोल बजने की आवाज़ और उस पर होने वाला सामूहिक नृत्य आंखों को सुकून देने वाला दृश्य होता है। इस दौरान एक दूसरे को सूखा गुलाल लगाते हैं और होली मनाते हैं।
4. पारंपरिक वेशभूषा और श्रृंगार
भगोरिया में आदिवासी समुदाय अपनी सबसे सुंदर और रंगीन वेशभूषा में नजर आता है। महिलाएं चांदी के भारी गहने (जैसे हँसली और कड़े) और गहरे रंगों के घाघरे पहनती हैं, जबकि पुरुष अपनी विशेष पगड़ी और तीर-कमान के साथ ठाठ से मेले में आते हैं। मेले की चमक और रंगों का तालमेल इसे फोटोग्राफर्स के लिए स्वर्ग बना देता है।
5. ताड़ी और विशेष पकवान
मेले में खान-पान का अपना अलग ही मजा है। यहाँ ताड़ के पेड़ से निकला ताजा रस, जिसे 'ताड़ी' कहा जाता है, बेहद लोकप्रिय है। इसके अलावा मक्के की रोटी, गुड़ और चने के विभिन्न व्यंजनों का लुत्फ उठाया जाता है। मेले में ऊँचे-ऊँचे झूले और हाट-बाजार इस उत्सव की रौनक को बढ़ा देते हैं।
