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जानिए कैसे मनाएं होलाष्टक? इन 8 दिनों में न करें शुभ कार्य, वर्ना हो सकती है बड़ी हानि

Updated: सोमवार, 18 मार्च 2019 (15:42 IST)
होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक होलाष्टक दोष माना जाता है जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं। भारतीय मुहूर्त विज्ञान व ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक कार्य के लिए शुभ मुहूर्तों का शोधन कर उसे करने की अनुमति देता है। वर्ष 2019 में होलाष्टक 13 मार्च, बुधवार से शुरू होकर 20 मार्च, बुधवार तक का समय होलाष्‍टक का रहेगा। 20 मार्च को होलिका दहन के साथ इसकी समाप्ति होगी। इन दिनों में सभी तरह के शुभ कार्य वर्जित होते हैं।

 
कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। इस धर्म धुरी से भारतीय भूमि में प्रत्येक कार्य को सुसंस्कृत समय में किया जाता है, अर्थात्‌ ऐसा समय जो उस कार्य की पूर्णता के लिए उपयुक्त हो।

इस प्रकार प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है। जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन विद्यारंभ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शांति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। 
 
ज्योतिष शास्त्र का कथन है कि इस समय विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरंभ नहीं करना चाहिए अर्थात्‌ इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है तथा विवाह आदि संबंध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है। होलाष्टक दोष में, संक्राति, ग्रहण काल आदि में शुभ विवाह कार्यों को वर्जित किया गया है। 
 
इस संबंध में प्रचलित मान्यता के अनुसार शिवजी ने अपनी तपस्या भंग करने का प्रयास करने पर कामदेव को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि को भस्म कर दिया था। कामदेव प्रेम के देवता माने जाते हैं, इनके भस्म होने के कारण संसार में शोक की लहर फैल गई थी। जब कामदेव की पत्नी रति द्वारा भगवान शिव से क्षमा याचना की गई तब शिवजी ने कामदेव को पुनर्जीवन प्रदान करने का आश्वासन दिया। इसके बाद लोगों ने खुशी मनाई। होलाष्टक का अंत धुलेंडी के साथ होने के पीछे एक कारण यह माना जाता है। 
 
कैसे मनाएं होलाष्टक ? 
 
* होलिका पूजन करने हेतु होलिका दहन वाले स्थान को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है। 
 
* फिर मोहल्ले के चौराहे पर होलिका पूजन के लिए डंडा स्थापित किया जाता है। उसमें उपले, लकड़ी एवं घास डालकर ढेर लगाया जाता है।
 
 
* होलिका दहन के लिए पेड़ों से टूट कर गिरी हुई लकड़ियां उपयोग में ली जाती है तथा हर दिन इस ढेर में कुछ-कुछ लकड़ियां डाली जाती हैं।
 
* होलाष्टक के दिन होलिका दहन के लिए 2 डंडे स्थापित किए जाते हैं। जिनमें एक को होलिका तथा दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है।
 
* पौराणिक शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार जिस क्षेत्र में होलिका दहन के लिए डंडा स्थापित हो जाता है, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इन दिनों शुभ कार्य करने पर अपशकुन होता है। 
 
इस वर्ष होलाष्टक 13 मार्च से शुरू होकर 20 मार्च तक रहेगा। इस आठ दिनों के दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। इसके अंतर्गत होलिका दहन और धुलेंडी खेली जाएगी।

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