सावन, भादौ, आश्विन और कार्तिक चातुर्मास के 4 महीनों में होता है शिव, गणेश, दुर्गा और विष्णु-लक्ष्मी का पूजन

Vishnu Shiva Story
Last Updated: शुक्रवार, 8 जुलाई 2022 (14:25 IST)
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Ki Puja : आषाढ़ माह में श्रीहरि के वामन रूप की पूजा होती है और इसी दौरान गुप्त नवरात्रि भी रहती है। आषाढ़ माह में देवशनी एकादशी के दिन देव सो जाते हैं और पूर्णिमा के बाद लग जाता है। इन चार माह को व्रत, पूजा और साधना का माह माना जाता है। आओ जानते हैं कि इन चार माह में किन देवों की पूजा होती है।

श्रावण माह : चातुर्मास का पहला माह सावन माह होता है। इस माह में भगवान के साथ ही माता पार्वती की पूजा भी होती है। इस माह में हरियाली तीज का पर्व भी रहता है जिसमें माता पार्वती की पूजा होती है। इस माह में नागपंचमी के दिन नागों की पूजा होती है।

भाद्रपद : इस भादौ भी कहते हैं जिसमें उत्सव के पर्व के साथ ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव भी मनाया जाता है। इसी माह में रक्षाबंधन भी रहता है। अत: इस माह भगवान गणेश, श्रीकृष्ण, श्रीराधा, रुक्मिणी और पितरों की पूजा का महत्व है। इस माह में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, श्रीकालिका, गणेशजी, माता पार्वती और शिवजी का ध्यान करना चाहिए। ऐसा करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।
krishna worship
आश्‍विन : आश्‍विन माह में शारदीय नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस माह में माता दुर्गा के नौरूपों की पूजा होती है। या श्राद्धपक्ष भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्‍विमाह की अमावस्या तक चलते हैं। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष को ही पितृपक्ष कहा जाता है। अत: इस माह में पितरों की पूजा का महत्व है।

कार्तिक : कार्तिक माह की देवउठनी एकादशी में श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा से जाग जाते हैं। इस माह में विष्णुजी के साथी ही तुलसी और शालिग्राम की पूजा होती है। इसी माह में धनतेरस, नरकचतर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाईदूज का पर्व भी रहता है। इसीलिए इस माह में सूर्यदेव, धन्वंतरि देव, माता लक्ष्मी, श्रीकृष्ण, यम और की पूजा भी होती है।

इन देवी और देवताओं की होती है चातुर्मास में पूजा :

1. श्रीहरि विष्णु
2. माता लक्ष्मी
3. भगवान शिव
4. माता पार्वती और दुर्गा
5. हनुमानजी, मंगलदेव
6. सूर्यदेव
7. गणेशजी
8. भगवान श्रीकृष्‍ण
9. श्रीराधा
10. पितृदेव
11. माता कालिका
12. जलदेव, वरुणदेव, समुद्रदेव
13. तुलसी माता (वृंदा), शालिग्राम
14. धनवं‍तरि देव
15. यमराज और चित्रगुप्तजी



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