0

मुंशी प्रेमचंद की लघुकथा : दरवाजे पर मां

शनिवार,जुलाई 31, 2021
0
1
रामधन अहीर के द्वार एक साधू आकर बोला- बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधू पर श्रद्धा कर। रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- साधू द्वार पर आए हैं, उन्हें कुछ दे दे।
1
2
रिश्तों में स्पष्ट संचार और वार्तलाप बेहद आवश्यक है, मस्ती-मजाक, रूठना-मनाना भी रिश्तों को मजबूती देता है, एक-दूसरे को समय देना और एक-दूसरे की निजता का भी सम्मान करना ज़रूरी है... लेकिन क्या इसकी आड़ में हर बात पर ‘अबोला’ सही है?
2
3
जन्मदिन के एक दिन पहले, रौनक रिद्धि को डिनर पर ले गया, जहाँ वह पूरे समय अपने फ़ोन पर ही लगा रहा। खाना हो गया और दोनों घर आ गए। 12 बजे रात को बड़े बेमन से रौनक ने रिद्धि से केक कटवाया, जिससे रिद्धि उदास हो गई।
3
4
‘सादगी’ के नाम पर दिखावा करने वाले ये पढ़े-लिखे आधुनिक परिवार के लोग क्या कभी अपने खुद के बेटे की ख़ुशी की कीमत पैसे से आंकना छोड़ सकेंगे? क्या ये पढ़े-लिखे बड़े कॉलेजों से पढ़ने वाले लड़के अपने घर में अपना मुंह खोल कर बदलते हुए समाज और परिदृश्य का सच अपने ...
4
4
5
क्या कभी मर्द अपनी पत्नी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते? या प्रोत्साहित करने का दिखावा कर उन्हें घर बैठाना चाहते हैं? क्या ‘सपोर्ट’ के नाम पर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत होते देखना उनके अहम् को ठेस पहुंचाता है? ये सभी ‘कही-अनकही’ बातें हैं और इसका ...
5
6
कोई अपने परिवार के सदस्यों को खाने-पीने से कैसे रोक सकता है? इतनी घृणित मानसिकता दूध के जले लोगों की ही हो सकती है। इन ‘कही-अनकही’ बातों के दर्द से रीसते घावों को सहलाते हुए उस दिन एक साथ फिर चाय-कॉफ़ी का आनंद उठाया।
6
7
प्रेम विवाह के बाद जब पति कुछ पल भी अपनी पत्नी के साथ न बिताना चाहे, तो वहां प्रेम कैसा? खैर, ये तो ‘कही-अनकही’ बातें हैं, क्योंकि आज भी न जाने कितनी लड़कियां उम्मीदों से शादी करती हैं और फिर उन्हीं उम्मीदों का गला घोंट दिया जाता है, उन्हीं लड़कियों ...
7
8
‘आदि, क्या बना दूं खाने में?’ ‘देख लो क्या है... आलू हों तो आलू की सब्जी बना दो रस वाली...’ ‘ठीक है, तुम्हारे लिए ताज़ा बना देती हूं और मैं सुबह के दाल-चावल फ्राय कर के खा लूंगी... फालतू वेस्ट हो जाएगा वरना...’
8
8
9
एना! ये क्या कर रही हो तुम? रख दो मेरा फ़ोन... हाथ भी मत लगाना...’ ‘अरे? देख रही हूं किसका फ़ोन या मैसेज था... खुद मेरा फ़ोन चेक करते हो, मैसेज चेक करते हो... यहां तक मैं अपने घरवालों से क्या बात करती हूं, ये तक हर रोज़ चेक करते हो...’
9
10
‘फालतू बात छोड़ो... कामवाली आज नहीं आएगी, उसकी लड़की बोल के गयी है, बस वही बता रहा था... मैं तुम्हारे शाम को घर आने से पहले टूर पर निकल जाऊंगा... फ्लाइट है मेरी 4 बजे...’ ‘कौनसी फ्लाइट से जा रहे हो?’ ‘देखता हूं... तुम पैकिंग कर के तुम्हारी मम्मी के ...
10
11
हर बच्चा चाहता है कि उसके माता-पिता उसके घर में रहें और उन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो। लेकिन किस कीमत पर? अपनी पत्नी की खुशियों को उजाड़ कर? जब आप एक पौधा घर लाते हैं, तो भी उसकी परवरिश के लिए उचित खाद-पानी देते हैं, न कि उस पौधे से उम्मीद ...
11
12
आज भी कई महिलाएं हैं जो किसी न किसी प्रकार की यंत्रणा सह रही हैं, और चुप हैं। किसी न किसी प्रकार से उनपर कोई न कोई अत्याचार हो रहा है चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या आर्थिक, जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, क्योंकि शायद वह इतना 'आम' है कि उसके ...
12
13
नीना ने घर पहुंच मां से फोन पर बात की तो पता चला कि, वे काफी बीमार है, यह सुनते ही वे तुरंत मां को अपने घर ले आई। कुछ दिन में लॉकडाउन हो गया। कोरोना के बादलों के बीच में जब भी मां नीना को सेवा के बदले आशीर्वाद देती, तो लगता बादलों को चीर सूर्य, उसके ...
13
14
’दादाजी, मैं साइकिल चलाना नहीं सीखूंगी।’ दादाजी ने अखबार से चेहरा निकालते हुए पूछा, ’क्यों? गिर पड़ी क्या?’ मैंने अपने सही-सलामत कोहनी और घुटने दिखाते हुए कहा, ’नहीं तो! मैं कहां गिरी? ये देख लो।’
14
15
धमम् तपड़......धमम् तपड़.... धमम् तपड़... जसोदाबाई नीम तले ढोलक ठोक रही थी। बेसुरा, बेताल। ढोलक की दोनों चाटी पर पूरे हाथ पड़ रहे थे और बेढब आवाज़ दूर तक जा रही थी। आज से पहले जसोदाबाई को इस रूप में किसी ने नहीं देखा था। ढोलक पर सदा लटकनेवाले झालरदार ...
15
16
आज के बूफे के दौर से कुछ वर्षों पीछे जाकर यदि सोच सकें तो सहभोज की पंगत याद कर लीजिए.....।
16
17
जाह्नवी और तन्मय की नई-नई शादी हुई थी, तन्मय के ऑफ़िस जाते समय जाह्नवी उसे रोज़ छोड़ने नीचे आती थी, उसी समय प्रिया बालकनी में बैठकर अख़बार पढ़ा करती। एक दिन जाह्नवी लौट रही थी तभी प्रिया और जाह्नवी की नज़रें मिल गईं, प्रिया ने हंसकर हाथ हिला दिया। फिर तो ...
17
18

लघुकथा : हिसाब

बुधवार,दिसंबर 23, 2020
मिस शालू के ऑफिस में आते ही सबकी निगाहें उन पर टिक गई। इठलाती, झूमती, कुछ बहकी सी, आंखों में अजीब-सा लालपन लिए सभी सहकर्मियों से हंसी-मजाक करने लगी। रिसेप्शन पर बैठे अखिल से तो कहा सुनी हो गई।
18
19
यह कहानी हमने कई बार सुनी होगी। ओशो रजनीश ने भी अपने किसी प्रवचन में इस कहानी को सुनाया था। यह कहानी किसने लिखी है यह तो हम नहीं जानते परंतु यह बहुत ही प्रचलित कहानी है। इस कहानी से आपको प्रेरणा मिलेगी की जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए सबसे बड़ी ...
19