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हिन्दी दिवस पर लघुकथा : मातृभाषा या मात्र एक भाषा

रविवार,सितम्बर 13, 2020
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कहावत तो सात वार नौ त्योहार की है, पर हमारी बई के तो सात वार में नौ बरत आते थे। कभी सोमवार के साथ ग्यारस आ जाती तो कभी गुरुवार के साथ प्रदोष।
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मास्क रज्जन बी के हाथ में था ।उन्होंने ध्यान से देखा और मुराद से कहा ये नीला मास्क तो दो तीन धुलाई में फट जाएगा इसमें क्या बड़ी बात है ।ऐसा मैं तुम्हें कपड़े का बना दूँगी ।दो तीन प्लीटस ही तो डालने हैं डालने हैं । मैं इससे भी बेहतर व मज़बूत बना सकती ...
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शशि की आदत थी महीने का बजट बनाने की। उन्होंने अपनी मां को यही करते देखा था। सुमेर को कोई मतलब नहीं था क्योंकि वे एक तय राशि अपनी पत्नी को
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'तेरा पत्र जब भी आता है, उसे बार-बार छूती हूं, बार-बार पढ़ती हूं। लगता है, तुझे ही स्पर्श कर रही हूं। तेरा पत्र तेरे लिए तो अक्षरों की चंद कतारें हैं, पर मेरे सामने तो तेरे जन्म से विवाह तक की सारी यादें फोटो एलबम की तरह खुलती चली जाती हैं। मुझे इस ...
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दोनों लगभग 60-62 की उम्र के साधारण कद-काठी के थे। पर कुछ तो खास बात थी उनमें, जो उन्हें खूबसूरत बना रही थी। आपस में कानाफूसी कर रहे थे। शायद काफी देर से आए बैठे थे। बॉबकट बालों वाली पत्नीजी ने सिलेक्सनुमा पायजामा व लंबी टीशर्ट-सी कुर्ती पहन रखी थी। ...
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लघुकथा : मंथन

शुक्रवार,मार्च 13, 2020
कृति ने खाने का डिब्बा खोला ही था कि मोबॉइल घनघना उठा। स्क्रीन में जो नाम चमका उसे देख कृति का मन कसैला हो उठा। मन किया कि बजने दे
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इटली के महान मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट असोजियोली ने एक बार कहा था कि आजकल आध्‍यात्‍मिक कारणों से पैदा होने वाली उथल-पुथल बढ़ती जा रही है। क्‍योंकि ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है जो जाने-अनजाने अधिक संपूर्ण जीवन की तलाश कर रहे हैं। साथ ही आधुनिक मानव ...
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भारत के एक महान राता थे ययाति। इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्र थे- याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति। याति परमज्ञानी थे तथा राज्य, लक्ष्मी आदि से विरक्त रहते थे इसलिए राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषके कर दिया।
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एक बार की बात है। अर्जुन इंद्र की सभा में उपस्थित थे। अर्जुन का प्रभाव और रूप देखकर स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी उस पर मोहित हो गई। उर्वशी ने अर्जुन को रिझाने की कोशिश की। उसने अर्जुन से प्रणय निवेदन किया, लेकिन अर्जुन ने खुद का नैतिक पतन नहीं होने दिया ...
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एक बहुत प्रसिद्ध सूफी फकीर गुरु था। जिसका नाम इब्न-अल-हुसैन था। उसके कई शिष्य थे। उसके एक शिष्य ने उसे पूछा- दुनिया में शांति और पवित्रता कैसे आएगी?
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नारी का अभिमान, प्रेममय उसका घर है, नारी का सम्मान, जगत में उसका वर है।
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बहुत पुराने समय की बात है। छुक्वो राज्य में एक सभ्य परिवार रहता था। एक दिन घर में पूर्वजों के लिए आयोजित रीति के पश्चात घर के मुखिया ने अतिथियों से पूजा में सहयोग के लिए धन्यवाद देने के लिए उन्हें एक केतली में शराब दी। सभी अतिथि आपस में बातें करने ...
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यह कहानी कई तरह से सुनाई जाती है, लेकिन ओशो रजनीश ने बड़े ही सुंदर तरीके से इसे सुनाया है। ओशी की 'अष्टावक्र महागीता' प्रवचन माला से यह कथा साभार।
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हॉलीवुड के फिल्म निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने किसी समय किसी प्रसंग में यह बात कही थी। आपको भी इससे सीख मिल सकती है। हालांकि ऐसे बातें पूर्व में कई विद्वान लोगों ने कही है। भाषा और संदर्भ बदलते रहते हैं, लेकिन सत्य वहीं का वहीं रहता है।
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कृष्ण काल में नंदा नाम की एक गाय थी। चारा चरते हुए झुंड से बिछड़ गई और वहां पहुंच गई जहां एक बाघ बैठा था। बाघ गरजते हुए नंदा पर टूट पड़ा। नंदा की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसे अपना नन्हा बछड़ा याद आने लगा। उसके आंसुओं की धारा बह निकली।
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ओशो रजनीश के पत्रों के संकलन से एक कथा- बात उस समय की है जब लाइट नहीं थी। लोगों ने अंधकार को दूर करने के बहुत उपाय सोचे, पर असफल रहे। तब एक चिंतक ने कहा- हम अंधकार को टोकरियों में भरकर गड्ढों में डाल दें। ऐसा करने से धीरे-धीरे अंधकार समाप्त हो
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यह कहानी ओशो रजनीश ने अपने किसी प्रवचन में सुनाई थी। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि संतों के या तीर्थंकरों के प्रवचन या उनकी शिक्षाएं कितनी काम की होती है।
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विवेकानंद एक बड़े विद्वान देवसेन के साथ ठहरे थे। उनके पास एक नई प्रकाशित पुस्‍तक थी। विवेकानंद ने कहा- क्‍या मैं इसे देख सकता हूं? देवसेन ने कहा- जरूर देख सकते हो, मैंने इसे बिलकुल नहीं पढ़ा है, क्योंकि यह अभी ही प्रकाशित हुई है।
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एक बार नारदजी एक पर्वत से गुजर रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक वटवृक्ष के नीचे एक तपस्वी तप कर रहा है। नारद के दिव्य प्रभाव से वह जाग गया और उसने प्रणाम करके पूछा- हे नारद! मुझे प्रभु के दर्शन कब होंगे?
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